मेरी भावना (27) दुर्जन के प्रति क्षुब्ध नहीं होना

  मेरी भावना (27) दुर्जन के प्रति क्षुब्ध नहीं होना

(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)

आदिनाथ भगवान की जय 

मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं

दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।

साम्य भाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे।। 

अगर आप धीरे-धीरे अपने आप को ‘मेरी भावनाओं’ में ढालोगे, तो आपकी भावनाएं आपके भीतर से ही बनेंगी और फिर हमें कहना नहीं पड़ेगा कि आप पतंग उड़ाना छोड़ो या चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग करना छोड़ो। आप ख़ुद सोचोगे कि हमें अपनी भावनाओं को अच्छा (सम्यक्) बनाना है या नहीं बनाना है। कुछ ऐसे भी दुष्ट प्रवृत्ति के लोग होते हैं, जो हर बात का उल्टा मतलब निकालते हैं। वे दुर्जन होते हैं, Cruel होते हैं। उन्हें ऐसे बुरे कामों में बहुत मज़ा आता है। वे कहते हैं कि एक तो मार दिया, अब मैं दो को और मारूंगा। 

जैसे मैं अपनी बात बता रहा था कि भाई! साँप को मत मारो, मत मारो। जब मैंने कहा कि मत मारो, तो दुर्जन कहता है कि अब तो ज़रूर मारूंगा, क्योंकि वह क्रूर स्वभाव का है। ऐसे दुर्जन के प्रति अब कैसा भाव रखना है? मैत्री भाव तो चलो common हो गया, दया भाव करने लायक वे हैं नहीं। अब इनके प्रति हम कैसा व्यवहार करें? यह ‘मेरी भावना’ में बताया गया है। आप अहिंसक पद्धति को अपना रहे हो। आप अपने आप को बिल्कुल शाकाहारी बना रहे हो। अपने आप को अच्छी भावनाओं से ओतप्रोत बना रहे हो और आप कोई भी बाजार की वस्तु पिज्जा, बर्गर, चाऊमीन आदि कोई भी चीज नहीं खा रहे हो, तो बाकी सब आपका oppose करने लग जाते हैं। कुछ ऐसे भी दुष्ट लोग हैं कि अगर आप नहीं खाओगे, तो वे आपको दिखा-दिखा कर और आपके सामने ही आमलेट खाएंगे। ऐसे लोगों के प्रति कैसा सोच रखना चाहिए? वह भी यहां पर लिखा हुआ है - 

दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे। 

साम्य भाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे।। 

दुनिया में ऐसे दुर्जन, क्रूर व कुमार्ग में लीन लोग भी हैं। मैंने तो यहां तक भी देखा है कि महाराष्ट्र में एक बार संथारा का केस चला था। लोग समाधिमरण का विरोध कर रहे थे। उस समय ऐसे भी ग्रुप थे, कुछ ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने शाकाहारी लोगों के घर के सामने ही मुर्गा काटा। ऐसे भी लोग होते हैं कि हम वही काम करेंगे, जिस काम का तुम विरोध करोगे। हम कहेंगे कि मांसाहार नहीं करना चाहिए, तो मांसाहारी लोग आपका विरोध करने लग जाएंगे। वे आपके घर के सामने अंडे फेंकेंगे, आपके घर के सामने ही मुर्गा काटेंगे। इनको बोलेंगे - दुर्जन, क्रूर और कुमार्ग पर चलने वाले लोग। ऐसे लोगों के प्रति क्या भाव रखना चाहिए? इन से क्षुब्ध नहीं होना। 

जो धर्म का विरोध करने वाले लोग होते हैं, उनसे भी क्षुब्ध नहीं होना। क्षुब्ध न होने का मतलब है कि अपने आप को Disturb नहीं करना और उनके प्रति साम्य भाव रखना। यह तीसरी भावना है। इसको बोलते हैं - माध्यस्थ भाव।  

आपने आज कितने भाव पढ़ लिए? एक हो गया मैत्री भाव, दूसरा हो गया करुणा भाव और तीसरा हो गया माध्यस्थ भाव। इन तीनों भावों का मनन करना और चिंतन करना। फिर अगली बार आपको आगे बताया जाएगा। 

 क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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