मेरी भावना (28) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से
मेरी भावना (28) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
प्रश्न (अपूर्व जैन जी, USA) - नमोस्तु महाराज श्री! देशभक्ति और मैत्री भाव के बीच सामंजस्य कैसे बिठाया जाए?
उत्तर - देश भक्ति और मैत्री भाव के बीच में सामंजस्य बिठाने के लिए आपको अपने देश में घटित होने वाली घटनाओं के प्रति ध्यान देना होगा। देश में क्या ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके कारण हमारे देश का नाम गौरवान्वित होता है? देश की कौन-सी ऐसी संस्कृति है, कौन-सा ऐसा इतिहास है, जिससे हमारा देश गौरवान्वित होता है? अगर हम उस इतिहास को, उस संस्कृति को ध्यान में रखेंगे और उसी के अनुसार हम अपने अंदर Thinking रखेंगे, तो वह देशभक्ति कहलाएगी। केवल मैच या टूर्नामेंट में बस ताली बजाना और भारत या पाकिस्तान का पक्ष लेना, यह देशभक्ति नहीं है। मैत्री भाव भी रखा जाता है और देशभक्ति की भावना भी रखी जाती है। दोनों साथ-साथ रखते हैं। यदि कोई उसके देश का oppose करने लग जाए या उसके देश पर कोई आपदा आने लग जाए, देश का कोई भी अपमान करने लग जाए, तो वह अपने स्वाभिमान को जागृत करके उसका भी जवाब देता है। फिर भी वह सामने वाले के प्रति मैत्री भाव बनाए रखेगा, क्योंकि मैत्री भाव का मतलब है कि मैं अपनी तरफ से कभी तुम्हारे लिए पीड़ा नहीं पहुंचाऊंगा। लेकिन जब आप हमारे लिए कोई पीड़ा पहुंचाते हैं, तो हम अपनी रक्षा करेंगे और आपको भी सबक सिखाएंगे।
ऐसे देशभक्ति भी होती है और मैत्री भाव भी रखा जाता है। मतलब यह है कि जब तक हमारे साथ हमारी देशभक्ति की भावना का कोई Oppose नहीं हो रहा है, हमारे ऊपर कोई Attack नहीं हो रहा है, तब तक हम उसके प्रति मैत्री भाव में हैं, लेकिन यदि वह किसी भी तरीके का हमारे विरुद्ध ऐसा कुछ भी Action लेता है, तो फिर हम अपने देशभक्ति के भाव में आ जाएंगे। मैत्री भाव एक सामान्य भाव है। इसीलिए तो ये भावनाएं हैं कि हमें अपनी रक्षा कैसे करनी है? उसके लिए पहले भी बताया जा चुका है। तो देश भक्ति और मैत्री भाव दोनों इस तरह से बने रहते हैं और रह सकते हैं।
महाराज श्री! अपूर्व जैन जी ‘द्रव्यसंग्रह’ ग्रंथ का स्वाध्याय भी कर रहे हैं।
प्रश्न ( पूर्णिमा जी जैन, सूर्य नगर, गाजियाबाद) - यदि किसी में अहम की भावना आ जाए और वह सोचने लगे कि जो मैं हूं, वह ही हूं, तो इस स्थिति में कैसे सामंजस्य बिठाया जाए?
उत्तर - अहम की भावना आ जाए, ऐसा तो सोचना ही नहीं चाहिए। अहम की भावना तो सब में रहती ही है और वह हर समय आती रहती है। इसके अंदर भी मैं जो हूं, सो हूं, इसमें जो ‘हूँकी’ भरते हैं कि मैं जो हूं, वैसा कोई नहीं है, तो इस तरीके की ‘हूँकी’ भरने से यह अहम हमारा थोड़ा बढ़ता तो है, लेकिन आपके द्वारा उस अहम के माध्यम से यदि किसी दूसरे को गिराया जा रहा है या दबाया जा रहा है, तो वह ‘हूँकी’ आपके लिए दुःखदायी है। वह आपके लिए पाप का कारण है। कभी-कभी जब आदमी डिपरेस होता है, तो उसे इस प्रकार की ‘हूँकी’ लेनी पड़ती है कि मैं बहुत अच्छा हूं। तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है। एक ही बात के कई तरीके होते हैं। एक ही बात गलत भी हो सकती है, सही भी हो सकती है। वह Depend करता है कि हम उसको किस तरह अपने उपयोग में ला रहे हैं।
अहम भाव आता भी है और अहम भाव को जो जानेगा, तो वह उससे बचने की भी कोशिश करेगा। जो जानता ही नहीं कि अहम भाव क्या होता है, वह नहीं बच पाएगा। इसलिए अहम भाव को जानो और उसको समझो। जब-जब अहम भाव आए और यदि आप को महसूस होता है कि मैं इस तरह से अहम कर रहा हूं, तो कहीं न कहीं आप अपने आपको अहम से बचाने की भी कोशिश में लगे हुए हो, यह Ultimately सिद्ध हो जाता है।
प्रश्न (श्रद्धा जी जैन, दिल्ली ) - नमोस्तु महाराज श्री! कोई भी धर्म की परीक्षा देने से पहले इतना डर क्यों लगता है और डर न लगे उसके लिए क्या उपाय है?
उत्तर - धर्म की परीक्षा से ही डर नहीं लगता है, परीक्षा से ही डर लगता है। धर्म क्यों जोड़ दिया उसमें? कोई भी व्यक्ति कितना भी Master क्यों न हो, जब वह आदमी परीक्षा देने जाता है, तो उस समय वह थोड़ा-बहुत Conscious और Serious हो ही जाता है। यदि आपके लिए धर्म की भी परीक्षा है, तो आपकी वह पुरानी आदत पड़ी हुई है। इसका मतलब यह है कि पहले भी आप परीक्षा से डरते ही होंगे। लेकिन यदि आप यह सोचो कि यह तो हमारे घर बैठे ऑनलाइन होने वाली परीक्षा है और इस परीक्षा में यदि हमारे लिए कुछ कम भी हुआ तो कोई बात नहीं है। हमें कम से कम इतना सौभाग्य मिल रहा है कि हम धर्म की परीक्षा देने की योग्य हैं। ऐसा सोचना चाहिए तो आपका डर भी दूर हो जाएगा।
प्रश्न (विभा जी जैन, दिल्ली ) - नमोस्तु महाराज श्री! आजकल हर क्षेत्र में परीक्षा में Percentage का जमाना है, तो इस Competition के Time में हम कैसे मैत्री का भाव बिठाएं?
उत्तर - कैसे बिठाएं? भाव तो भाव करने से ही बिठाया जाएगा। जब आप शांति से बैठ जाएंगे, तो आप भाव करेंगे कि देखो! उसका भाग्य कितना अच्छा है! उसका ज्ञान कितना अच्छा है! उसकी Knowledge कितनी Strong है कि उसने जो कम भी पढ़ाई की है, तो भी उसके अच्छे Marks आए हैं, अच्छी Percentage आई है। ऐसा भी होता है। इसलिए हमें भी कुछ उसी तरह का पुण्य अर्जित करना चाहिए, अच्छे भाव करने चाहिए, जैसे उसके पास में हैं। ऐसा सोचना चाहिए। ऐसा अगर आप सोचेंगे, तो जरूर आप उसके प्रति परेशान नहीं होंगे और उससे आपका मैत्री भाव बना रहेगा। तो मैत्री भाव बनाए रखने के लिए सामने वाले को सही ढंग से सोचने की, समझने की कोशिश करो कि अगर कोई सफल भी है, तो क्यों है?
प्रश्न (रीता जी जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! करुणा भाव और प्रेम के अंतर के बीच कैसे पहचान करें?
उत्तर - वैसे तो प्रेम एक सार्वभौमिक भाव है, जैसे मैत्री भाव है। करुणा भाव प्रेम भाव में नहीं आता है। आज जो प्रेम भाव की चर्चा कई दार्शनिकों के माध्यम से चलती है, वह प्रेम भाव इसी मैत्री भाव का ही Synonyms समझना चाहिए। वह भी एक व्यापक भाव होता है। प्रेम का मतलब ही होता है, सबके प्रति प्रेम भाव रखना। सबको अपना समझना। किसी को दुःख न देना। तो यह करुणा भाव में नहीं आता। यह उससे भी बढ़कर मैत्री भाव के ही Parallel में है।
प्रश्न (नेहा जी जैन प्राकृत, रेवाड़ी ) - नमोस्तु महाराज श्री! गुरुदेव! यदि हम किसी के प्रति मैत्री का भाव रखकर शांत रहते हैं और वह हमारे इस शांत स्वभाव का गलत उपयोग करे, तो ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए, जिससे हमारे अंदर समता बनी रहे?
उत्तर - बहुत अच्छी बात है। ऐसा होता ही है और होना भी चाहिए और यदि ऐसा नहीं होता है तो आपको पता कैसे चलेगा कि आपका शांत स्वभाव है? जब आपके शांत स्वभाव का कोई गलत फायदा उठाए और आपसे कुछ गलत कहे, तो आपको अपनी थोड़ी-सी शक्ति और बढ़ा कर अपने उस शांत भाव की शक्ति को और बढ़ाना चाहिए। क्या सोचना चाहिए कि हमें इस समय पर अपना शांत भाव अब और बढ़ाना है, क्योंकि यही हमारी आंतरिक शक्ति है। अगर कोई सामने वाला आपके लिए गलत करेगा, तो उसका फल वह भोगेगा। आप अगर उसके लिए कोई फल देने की चेष्टा करेंगे कि इसका कुछ गलत हो जाए, तो इतना गलत नहीं होगा। वह अपने आप हो जाएगा।
कभी-कभी कहा जाता है कि जैसे कोई आदमी नदी में जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है; तो उसको चले जाने दो। रोकोगे तो वह रुकेगा नहीं। एक बार गिर पड़ेगा न! तो वह अपने आप उस स्थान से डरने लग जाएगा। कोई भी आदमी जब गलत कर रहा है और आप अगर उसके लिए कुछ नहीं कर पा रहे हो, तो आप अपने भाव मत बिगाड़ो। उसको गलत करने दो, छोड़ दो उसके हाल पर। जहां वह Defeat खाएगा, वहीं से वह कुछ समझेगा और वही संभलेगा। तुम नहीं समझा पाओगे उसको। आप क्या करो? आप तो अपने समता भाव को, अपनी शांति को और बढ़ाने की कोशिश करो।
प्रश्न (संजय जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! सुनने में सरल तो लगता है, लेकिन करने में कठिन होता है। परिवार के बीच हम समभाव सामंजस्य कैसे बिठा पाएं?
उत्तर - सरल तो कुछ भी नहीं होता है। सब कुछ कठिन ही होता है। परिवार चलाना भी कठिन होता है। फिर परिवार में सामंजस्य बिठाना भी कठिन होता है। फिर परिवार में धर्म के साथ रहना तो और कठिन होता है। कठिनता का जीवन जीने का मतलब है कि हम अपनी योग्यता बढ़ा रहे हैं और यह योग्यता एकदम से नहीं आ जाती। सुनने से भी नहीं आ जाती। इसको धीरे-धीरे हम अपने भावों में लाएं, Regular Practice रखें तो हम कहीं तक Successful हो सकते हैं।
प्रश्न (राखी जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! लोग सुनते हैं कि सब का मत क्या होता है? पर बाहर से तो सुनते हैं लेकिन अंतरंग में उस चीज को नहीं उतारते हैं। इसके लिए हम क्या करें?
उत्तर - देखो! लोगों की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए। मेरी भावना का मतलब है - My Feelings. Me, My, I. इसके अलावा We, Our, Us पर जाना ही नहीं है। आप क्या कर रहे हो, आप क्यों नहीं सुन रहे हो, आप क्यों नहीं ऐसा सुनकर समझ रहे हो। अब दूसरों की चिंता छोड़ो। हम सबसे बड़ी गलती यही करते हैं। दूसरों को तो यह समझते हैं कि दूसरा तो कुछ कर ही नहीं रहा है। मंदिर जा रहा है तो दूसरे के अंदर कोई धर्म नहीं आ रहा। ज्ञान अर्जन कर रहा है तो दूसरे की कुछ समझ में नहीं आ रहा, केवल सुन ही रहा है। तो यह भी जो हमारी Thinking होती है, यह भी कहीं न कहीं गलत होती है। हम यह सोचें कि जिसका जितना भवितव्य होगा, वह उतना ही ग्रहण करेगा। हमारा अगर भवितव्य अच्छा है, हम अगर कुछ अपने अंदर सही भाव रख रहे हैं, तो हम ग्रहण करें। हम अच्छे बनते चले जाएं, यही पर्याप्त है।
प्रश्न (त्रिलोक जी जैन, तेंदुखेड़ा) - नमोस्तु महाराज श्री! क्रोध न करें, यह तो समझ में आता है लेकिन जब बच्चे ऐसा कुछ गलत काम करते हैं तो बिना क्रोध के काम नहीं चलता। इसके लिए हम क्या करें?
उत्तर - क्रोध करना भी जरूरी होता है लेकिन समझदारी से। Anger with understanding.
प्रश्न (अंजलि जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! अगर हम मैत्री भाव का अर्थ यह लगा लेते हैं कि लोग हमसे डरने लगे हैं, इसलिए मैत्री भाव बना रहे हैं, तो इसका क्या समाधान है?
उत्तर - लोग कुछ भी सोचें, आपको अपनी Feeling Strong रखनी है। आप लोगों की तरफ क्यों देखते हैं? महिलाओं की यह बहुत बड़ी कमजोरी होती है। दूसरों की ओर ज़्यादा देखना। इसी Feeling के कारण हम आगे नहीं बढ़ पाते हैं। आप तो अपना सोचो। लोग क्या सोच रहे हैं, उनकी चिंता मत करो। लोग तो दुनिया में हमेशा रहेंगे, हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहेंगे, हमेशा कुछ न कुछ करते रहेंगे। आप क्या कर रहे हो, अपना Decision लो और अपने अनुसार चलने की कोशिश करो। फिर अगर कोई आपके लिए कुछ सोचता भी है, तो भी आप उसके दबाव में न आ कर आगे बढ़ाने की कोशिश करो है। लोगों की चिंता करके कभी कोई धर्म नहीं किया जा सकता है।
नोटः आज के प्रश्न यहीं समाप्त होते हैं। आशा करते हैं कि इस तरह आप निरंतर हमारे साथ जुड़े रहेंगे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करेंगे कि वह भी इस अर्हम गुरुकुलम के माध्यम से महारा श्री के मुख से मंगलवाणी का लाभ प्राप्त कर सकें।
जयजिनेन्द्र!
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
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