मेरी भावना (24) प्रश्न आपके, उत्तर मुनि श्री के मुख से
मेरी भावना (24) प्रश्न आपके, उत्तर मुनि श्री के मुख से
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
प्रश्न (विभा जैन, रामप्रस्थ, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! स्त्रियों का तो स्वभाव ही होता है - ईर्ष्या करना, तो हम ऐसा क्या करें कि अपनी ईर्ष्या को नियंत्रित कर सकें?
उत्तर - यह एक नीति वाक्य है कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही ईर्ष्या से सहित होती हैं। पर ऐसा नहीं है कि ईर्ष्या उनका स्वभाव बन गया है। यह भी नहीं कह सकते कि यह स्वभाव पुरुषों में नहीं होता है। यह नीति इसलिए बनी है कि पहले बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं की कई-कई स्त्रियाँ हुआ करती थीं। जब एक से ज्यादा स्त्रियाँ घर में रहती हैं, तो उनमें आपस में बन नहीं सकती और उनमें स्वभावतः ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती होगी। ये नीति वाक्य उस समय के बने हुए हैं। अब तो ऐसी कोई स्थिति नहीं है। तो यह मत सोचो कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही ईर्ष्या से सहित होती हैं। पुरुषों में भी, जो बड़ी बड़ी कंपनियों के Director होते हैं, वे अपनी कम्पनियों को चलाने के लिए न जाने क्या-क्या करते रहते हैं। तो हम यह नहीं कह सकते कि यह स्वभाव पुरुषों में नहीं होता है। स्त्रियाँ यह न सोचें कि ईर्ष्या करना उनका स्वभाव बन गया है। हम अर्हम ध्यान करके अपने अहम भाव को छोड़ कर अपने को ईर्ष्या से बचाएँ। स्त्री भी सबकी उन्नति देख सकती है, उनकी प्रशंसा भी कर सकती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी किसी की प्रशंसा नहीं कर सकता है। अगर आपको अपना ईर्ष्या भाव कम करना है, तो हमेशा दूसरों की प्रशंसा करो। आपके अन्दर कभी Inferiority नहीं आएगी। इसे Law Of Appreciation भी कहा जाता है।
प्रश्न (अजय जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! हमारे मन में जब कभी ईर्ष्या का भाव आता है, तो उसको तत्काल दूर करने के लिए हम क्या उपाय कर सकते हैं?
उत्तर - सबसे अच्छा उपाय तो यह सोचना है कि हर जीव अपने अपने कर्मों का फल ख़ुद भोगता है। हर जीव का अपना-अपना भवितव्य होता है कि किसको क्या बनना है। कोई किसी को रोक नहीं सकता है। तो जब मन में ईर्ष्या का भाव आए तो हमें यह सोचना चाहिए कि इसकी होनहार ऐसी ही है और हमारी होनहार ऐसी ही है। अगर हम इस तरह का भाव करेंगे, तो हमारे अन्दर ईर्ष्या का भाव कम हो जाएगा।
प्रश्न (शैलेष जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! हम अपने गुरु को ही सर्वस्व मानते हैं और उनके अलावा कहीं जाने का मन नहीं होता। तो लोग ऐसे में हम को अहंकारी बोलें, तो हम क्या कर सकते हैं?
उत्तर - यह आपकी व्यक्तिगत श्रद्धा की बात है। हर व्यक्ति के अन्दर किसी के प्रति पूज्यता और श्रद्धा के भाव आ जाते हैं, तो वे किसी के प्रति भी आ सकते हैं। जो व्यक्ति अपने आप में दृढ़ होता है, स्थिर होता है, तो वह दूसरों की चिन्ता नहीं करता। अगर आपको लगता है कि आप सही हैं, तो दूसरा चाहे कुछ भी कहे, आपको यह स्वीकारना ही नहीं है कि आप ग़लत हैं। तब तो आप सही हो और अगर आप दूसरों के कहने से यह सोचने लग गए कि पता नहीं, आप सही हैं या ग़लत, तो आप सही नहीं हो। इतना Confidence अपने अन्दर होना चाहिए, तभी हम सही बात को स्वीकार कर पाएंगे।
प्रश्न (अनिता जैन, जबलपुर) - नमोस्तु महाराज श्री! अशुभ उपयोगी भगवान का दर्शन, पूजन, व्रत, उपवास सब कुछ करता है, तो भी उसे अशुभ उपयोगी क्यों कहा जाता है?
उत्तर - भगवान का दर्शन, पूजन, व्रत, उपवास दो तरीके से किया जाता है। एक तो अपने भीतर के अभिप्राय को, अपने Attitude को सही करके, अपना लक्ष्य सही बना कर किया जाता है और दूसरा तरीका है कि हम दूसरों की देखादेखी करते हैं कि वह भी कर रहा है, तो हमें भी करना है। तो इससे न तो हमारा Attitude Change हुआ और न हमने अपना कोई Goal बनाया। जब हमारे सामने ये दोनों बातें नहीं होती हैं, तो हमारा उपयोग अशुभ उपयोग ही बना रहता है। हमारा अशुभ उपयोग तब बदलेगा, जब हम उसके साथ अपना Attitude भी बदलेंगे। हमें मालूम होना चाहिए कि हम दर्शन, पूजन, व्रत, उपवास क्यों कर रहे हैं? हमारा लक्ष्य क्या है? जब ये दोनों बातें हमारे सामने सही होंगी, तो हमारा उपयोग भी शुभ उपयोग बन जाएगा।
प्रश्न (भवनीश जैन, C A Student, मुम्बई) - नमोस्तु महाराज श्री! दान करने से तो धन की प्राप्ति होती है, लेकिन जब हमारे मन में दान देने से अच्छे फल की प्राप्ति का लालच आ जाए, तो इसका क्या फल मिलेगा?
उत्तर - देखो! शुरूआत में हम अपने मन को इतना Perfect नहीं बना पाते हैं कि हम किसी काम के Profit को समझे बिना उसमें अपना धन Invest कर सकें। यह हमारी Nature में है। जब हमने ऐसा करना शुरू कर दिया तो धीरे-धीरे हमें अपने आप Realize होने लग जाता है कि ऐसा Profit लेकर भी हम क्या करेंगे। वह सोचने लग जाता है कि मैं जो दान दे रहा हूँ, यह मेरा धर्म है। मुझे यह सोचने की ज़रूरत नहीं है कि इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा। शुरूआत में तो Profit के बारे में सोचने की बात क्षम्य होती है, लेकिन Mature होने के बाद वह अपनी भावनाओं पर Control करता चला जाता है। तो अगर आप Mature हो गए हैं, तो धीरे-धीरे अपने इस लालच को भी Control कर सकते हैं। आप इस Feeling में आ सकते हो कि हम इस तरह के Profit को चाहते हुए कब तक दान करेंगे? हमें तो केवल दान देने से मतलब है कि दान सही जगह पर जाए। हमें इसके बदले में कुछ भी नहीं चाहिए। यह धीरे-धीरे संभव है।
प्रश्न (संकेत जैन, नागपुर) - नमोस्तु महाराज श्री! हम क्रोध नहीं करना चाहते, लेकिन ऑफिस में Juniors पर क्रोध करना पड़ता है। इसके बिना काम नहीं होता। तो इसके लिए क्या उपाय करना चाहिए?
उत्तर - यह तो आप लोगों का सोचना ही ग़लत है कि क्रोध तो करना ही नहीं चाहिए। मैं तो यह कहता हूँ कि क्रोध भी करना चाहिए, लेकिन समझदारी से। ऐसा किसी गृहस्थ के लिए, Office में काम करने वाले या किसी भी Community से जुड़े हुए व्यक्ति के लिए कठिन होता है कि वह अपने आस-पास काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रति कभी क्रोध न करे। न करना पड़े, तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन करना भी पड़े, तो समझदारी से करना है। कई बार थोड़ा-सा क्रोध करने से भी कई काम बन जाते हैं। कुछ लोग ऐसी Nature के होते हैं, जो सीधे ढंग से नहीं समझते। उनके लिए कई बार हमें दिखावे के लिए क्रोध करना पड़ता है ताकि उनको समझ में आ जाए। कभी-कभी माता-पिता को बच्चों पर क्रोध दिखाना पड़ता है, तो उसे क्रोध नहीं माना जाता। अगर अध्यापक बच्चों पर कभी क्रोध ही न करें, तो बच्चे तो कभी Homework कर के ही न लाएं। यह ज़रूरी होता है। इसी तरह से अगर आपके कोई Juniors हैं, तो यह सोच कर क्रोध न करो कि ये आपके Juniors हैं, इनको दबा कर रखना है। उनकी किसी कमज़ोरी का फायदा न उठाओ। लेकिन जब आपको लगता है कि अगर हम इन पर थोड़ा-सा क्रोध कर दें तो ये और भी अच्छा काम कर सकते हैं, तो मैं कह सकता हूँ कि आप क्रोध कर सकते हो। आप एकदम से साधुवृत्ति के नहीं बन सकते।
प्रश्न (धैर्य जैन, रोहिणी) - नमोस्तु महाराज श्री! आजकल हम लोग गुस्से में ज्यादा रहते हैं और ख़ुश कम रहते हैं। इसका क्या कारण है?
उत्तर - कारण तो वही है, जो अब तक बताया जा रहा था। The main root cause of anger is Proud. अगर हम ख़ुश रहना चाहते हैं तो अपने अन्दर के Proud को समाप्त करें और ख़ुश रहने की दर को बढ़ाएँ। मान लो आप को लगता है कि मैं दिन भर में एक या दो बार ही हंसता हूँ या ख़ुश रहता हूँ, तो आप उसकी दर को बढ़ाओ कि हमें दिन में चार बार या दस बार हंसना है, तो आप का गुस्सा धीरे-धीरे कम हो जाएगा। आप एक अच्छे ख़ुशमिजाज आदमी कहलाओगे।
प्रश्न (ऋषभ जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! यदि किसी के प्रति क्रोध है और वह धीरे-धीरे वैर में परिवर्तित हो जाए, तो उसके लिए क्या समाधान है?
उत्तर - समाधान सब अपने अन्दर ही होते हैं। क्रोध वैर में तभी परिवर्तित होगा, जब हम उस क्रोध पर Control नहीं कर पाते। यह कोई ज़रूरी नहीं है कि हर क्रोध वैर में Convert हो, लेकिन यदि हम थोड़ी-सी सावधानी रखें कि वैर क्रोध में Convert न हो और यह हमारे लिए शत्रुता का कारण न बने, तो क्रोध पर Control करें। यह कार्य Control of mind से ही होता है। जब हम समत्व के भाव बार-बार अपने Mind में लाएंगे, दूसरों के प्रति ज़यादा ईर्ष्या और अहंकार के भाव अपने मन-मस्तिष्क में नहीं लाएंगे, तो हमारे अन्दर का वैर भी छूटेगा, तो आप भावना करें और उसका अभ्यास करें।
प्रश्न (संजय जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! अगर हम अपनी आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं, तो यह भी हमारा अहंकार होगा क्या?
उत्तर - आत्मसम्मान एक अलग बात होती है। जब हम आत्मसम्मान की रक्षा की बात पर आते हैं, तो आत्म सम्मान की रक्षा करने के लिए हम कभी भी दूसरे के लिए कोई दुःख नहीं पहुंचाते हैं। उसमें हम अपनी रक्षा करने के लिए कुछ करते हैं, तो वह हमारे लिए Proud की बात होती है। यह भी आत्मसम्मान ही कहलाता है कि जैसे हमने आपको अभी डॉक्टर का उदाहरण दिया। अपने किसी Friend का उदाहरण दिया। उसने कहा कि आप के लिए ऐसे ऐसे मीट के प्रोडक्ट हैं। इनको खाया करो। अब आपका यह आत्मसम्मान उस समय पर क्या कहेगा? उस समय आपके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी। मैं इतने शुद्ध कुल में उत्पन्न हुआ हूं, इतने धार्मिक कुल में उत्पन्न हुआ हूं। मुझे गर्व है कि मैं जैन हूं और यह मुझसे कह रहा है कि मैं मांस खाऊं! तो वह उसको चार बातें सुना ही देगा, रहेगा नहीं और सुनाना भी चाहिए। तो आत्म सम्मान इसको बोलते हैं। आत्मसम्मान की रक्षा करने के लिए आपको गुस्सा करना पड़ता है, तो वह भी दूसरों को शिक्षा देने वाला होता है।
प्रश्न (रमाकांत जैन, मेरठ) - नमोस्तु महाराज श्री! हमेशा हम समभाव में रहें, इसके लिए हम अर्हम ध्यान के अलावा और भी कुछ कर सकते हैं क्या?
उत्तर - अरे! यह तो तब पूछना चाहिए, जब तुमने अर्हम ध्यान पूरा कर लिया हो और कुछ बचा न हो। जब तुमने अर्हम ध्यान करके सब कुछ Achieve कर लिया हो, तब यह Question आए तो ठीक है। दूसरे Option तो सब उसी के आसपास ही घूमते हैं। ध्यान है, चिंतन है, मनन है। ध्यान के अलावा ज्ञान है। आप ज्ञान का अभ्यास करो। जहाँ से ज्ञान मिलता है, उन Classes को Attend करो। ध्यान के अलावा ज्ञान ही दूसरा Option है।
प्रश्न (धनेश जैन, कानपुर ) - नमोस्तु महाराज श्री! यह जो मद है, वह मनुष्य में किस कारण से होता है?
उत्तर - यह तो अपने कर्मों के कारण से होता है। जो कर्म हमारे अंदर हैं, वे कषाय रूप कर्म होते हैं और वे कषाय हमारे अंदर अनादि काल से हैं। उन्हीं के कारण से, यह कर्मों के फल से हमारे अंदर अहंकार उत्पन्न होता है। ये कषाय चार प्रकार की हैं - क्रोध, मान, माया और लोभ। तो यह मद मान कषाय के कारण है। अहम का अर्थ है - मान कषाय, जिसके कारण हमारे अंदर यह मद का भाव उत्पन्न होता है। तो यह सब के अंदर रहता है। उसको Control करना ही व्यक्ति की साधना कहलाता है।
प्रश्न (रुचिका जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! हम अपना किसी से कोई Compare करते हैं, तो हमारे अंदर गलत भाव नहीं होता। लेकिन हमारे अंदर यह भाव होता है कि हम उससे Better Performance कर पाएँ। तो यह भी गलत है क्या?
उत्तर - Better Performance करने के लिए तो हमेशा हर किसी को बिल्कुल Ready होना ही चाहिए। लेकिन उसको Defeat दे कर नहीं। हम दूसरों की Performance देखकर भी अपने अंदर भाव कर सकते हैं कि हमें भी इसी की तरह करना है या इससे भी अच्छा करना है। लेकिन उसको किसी भी तरीके से नुकसान पहुंचा कर नहीं। बस! इतना ध्यान रखो।
आज का Session यहीं समाप्त होता है। आशा करते हैं कि इसी तरह निरंतर आप हमारे साथ जुड़े रहेंगे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करेंगे कि वह भी इस अर्हम गुरुकुलम के माध्यम से महाराज श्री के मुख से मंगल वाणी का लाभ प्राप्त कर सकें।
नमोस्तु गुरुवर! नमोस्तु गुरुवर!! नमोस्तु गुरुवर!!!
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद

Comments
Post a Comment