मेरी भावना (31) कृतज्ञ बनो, कृतघ्न नहीं
मेरी भावना (31) कृतज्ञ बनो, कृतघ्न नहीं
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।
बने जहां तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।।
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे।।
हमें गुणी जनों के प्रति हमेशा आदर का भाव रखना है। इस तरह से यदि हमारी मानसिकता बनने लग जाती है, तो हमारे अंदर गुणों को ग्रहण करने का भाव आता है। यह सबसे जरूरी चीज है कि हम गुणवान बनें। दोष तो आपको जगह-जगह पर मिल जाएंगे, लेकिन गुणी बनना, यह बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।
बने जहां तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।।
अब यह उससे भी बढ़ कर बात हो गई। प्रसन्न होने के बाद अगर गुणी जन हमें कभी मिल जाए, उनसे हमारा परिचय हो जाए, हमें उनकी निकटता मिल जाए, हम उनकी सेवा कर पाएं, किसी भी तरीके की सेवा और उनकी सेवा से भले ही हमें पसीना आ रहा हो, लेकिन मन खुश होना चाहिए। पसीना तो शरीर की चीज है। यह तो निकलता ही रहेगा और कोई भी सेवा करोगे तो पसीना भी आ सकता है। कोई दिक्कत नहीं। निकलता है तो क्या बात हो गई? एक गिलास पानी और पी लेंगे। इसमें क्या हो रहा है? कोई अमृत तो निकल नहीं रहा है।
सबसे बड़ी बात है कि अगर हमें सेवा करते हुए कभी कोई कष्ट मी महसूस हो कि आज हमें बड़ा कष्ट हो गया। मतलब यह कि मुझे बहुत ही मेहनत करनी पड़ी या मैं आज सेवा में थोड़ा-सा ज़्यादा थक गया, Exhaust हो गया; तो भी आपके मन में प्रसन्नता का भाव रहे। देखो! मुझे इस सेवा का जो सुख मिला है, यह बड़ी बात है। सेवा हर किसी को नहीं मिलती है। आप कभी भी किसी की सेवा करोगे, थोड़ा तो कष्ट होगा ही, लेकिन उस कष्ट में आपको शारीरिक कष्ट नहीं देखना। क्या देखना है? मन को आज बड़ी प्रसन्नता हुई। मन खुश हुआ और अगर आप हमेशा इस तरह का भाव करोगे कि मन खुश हुआ, तो आप शारीरिक कष्ट को कष्ट मानोगे ही नहीं। इस भावना का सबसे बड़ा फायदा यही होगा।
क्या आपको अपने माता-पिता गुणी नहीं लगते? वे भी तो गुणवान हो सकते हैं। बच्चे कहते हैं कि नहीं! माता-पिता कहाँ गुणवान हो सकते हैं? ऐसा नहीं है। उनमें भी कुछ गुण हो सकते हैं। आपको दिखता नहीं। उनमें सज्जनता है, सरलता है, तुम्हारा ख्याल रखने का भाव है। वे कितना तुम्हें बार-बार वह पुचकारते हैं, कितना तुम्हें बार-बार समझाते हैं और कितना तुम्हारा ध्यान रखने के लिए कितनी तरह से तुम्हारी Care करते हैं? यह आप कभी ढंग से, गौर से देखना और सोचना। हम सोचते कहां है? और इसीलिए हमारे अंदर एक बहुत बड़ा दुर्गुण पैदा होता चला जाता है।
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
यह बहुत अच्छी बात है। एक कृतज्ञता होती है और एक कृतघ्नता होती है। जिन्होंने हमारे साथ अच्छा किया, उनकी उस अच्छाई को, उनके उस उपकार को भी भूल जाना, याद ही नहीं करना और उल्टा उनसे ही दुश्मनी साध लेना या उल्टा उनके बारे में बुरा सोचना; इससे बढ़कर कृतघ्नता नहीं हो सकती। आज के बच्चे ज़रा सोचें कि आज हमें अपने माता-पिता में कोई गुण दिखाई नहीं देते हैं, कोई क्वालिटी नज़र नहीं आती है, तो क्या हम उनके प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं? फिर तो हम उनके प्रति कृतघ्न ही होंगे, कृतज्ञ नहीं।
कृतज्ञ का मतलब है कि जिसने हमारे ऊपर उपकार किया है, उसके उपकार को मानना, स्वीकार करना, याद करना कि इनका हमारे ऊपर बहुत बड़ा उपकार है।
Attitude Of Gratitude.
आचार्य पूज्यपाद महाराज ने सर्वार्थ सिद्धि में लिखा है कि यह बहुत दुर्लभ गुण है। अगर आप कभी पढ़ो तो आपको पता लगेगा कि जैसे स्थावर से त्रस पर्याय प्राप्त करना दुर्लभ है, उसी प्रकार गुणों में कृतज्ञता का गुण प्राप्त करना दुर्लभ है। व्यक्ति कृतघ्न तो बहुत जल्दी हो जाता है, पर कृतज्ञ नहीं हो पाता। व्यक्ति छोटी-सी बात पर अपने माता-पिता से, गुरुजनों से रुष्ट हो जाएगा। कृतज्ञता का गुण अपने आप में इतना बड़ा गुण है कि इसके लिए आचार्य ने कहा कि अगर यह गुण मिल जाए तो समझो कि बहुत बड़ी दुर्लभता की प्राप्ति आपको हो गई और यह गुण ही तो हमारी उन्नति का कारण होता है।
आज के बच्चे माता-पिता को कुछ गिनते कहां हैं? जब छोटे रहते हैं, तब माता-पिता कितनी उनकी Care करते हैं, कितनी उनकी सेवा करते हैं और कितना उन्हें छोटे से बड़ा बनाने के लिए परिश्रम करते हैं। दिन भर उन्हें हाथ में लिए डोलते रहते हैं, उनका मन बहलाने के लिए उनके साथ खेलते रहते हैं। दादा अलग खेलेंगे, जब पापा आ जाएंगे तो वह अलग खेलेंगे, बेटा बेटा करके। अगर कोई छोटा बच्चा है तो घर में जितने भी होंगे, चाचा-चाची, मम्मी, मामा-मामी सब उस का मन बहलाने के लिए उसके साथ खेलते रहेंगे, अपना सारा समय उस पर लगाते हैं और बड़ा होने के बाद वह बच्चा अपने ही माता-पिता को कुछ नहीं समझता, अपने ही परिजनों को कुछ नहीं समझता। उन्हीं का अपमान करता है, उनकी बात नहीं मानता है। तो यह सब क्या है? यह कृतज्ञता है या कृतघ्नता है। और कभी-कभी तो यह भी कह जाते हैं बच्चे कि आपने किया क्या है मेरे लिए? वह जो मेरा Friend था, उसके माता-पिता ने तो देखो क्या कर रखा है उसके लिए! कहां से कहां पहुंचा दिया उसको!
यह एक बहुत बड़ी समस्या है। माता-पिता अच्छे से अच्छे स्कूल में पढा़ते हैं, बड़ी से बड़ी कोचिंग दिलाते हैं, सब कुछ खर्च करते हैं, सब कुछ मेहनत करते हैं और उसके बावजूद भी जब बच्चे से ऐसा सुनने को मिलता है तो खुद समझो कि हमने उनके लिए गुणों के रूप में क्या दिया? ये सब बातें क्यों शुरू हो गईं क्योंकि हमने कभी यह समझा ही नहीं कि Quality होती क्या है? हम Merit में तो आते गए, लेकिन हमें पता नहीं है कि Merit का मतलब होता क्या है? यही स्थिति है आजकल सबकी।
पहले कहते थे कि इसके अगर नंबर ज्यादा आए हैं, तो इसका मतलब है कि इसमें बहुत गुण हैं, यह बहुत अच्छा है। और आजकल गुण तो दिखते ही नहीं हैं। अहम बढ़ जाता है, ईर्ष्या बढ़ जाती है तो Quality कहां बढ़ रही है? बढ़ना क्या चाहिए? Quality बढ़नी चाहिए। तो Quality कैसे बढ़ेगी? जब आप गुणी जनों के प्रति अपनी कृतज्ञता को अभिव्यक्त करोगे, तभी आप अपने लिए गुणी होते चले जाओगे और तब कहलाएगा कि वास्तव में आपकी Merits बढ़ रही हैं। इसलिए यह बहुत अच्छी पंक्ति है -
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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