Posts

Showing posts from December, 2025

भगवान शांतिनाथ (2)

Image
  भगवान शांतिनाथ की कथा (2) (पूर्व भव में राजा मेघनाथ का वर्णन) शांतिनाथ प्रतिभा के पुरुष : भगवान शांतिनाथ अपने बाल्य काल से ही बहुत गुणशील, धर्मात्मा और अप्रतिम प्रतिभा के धनी थे। उनकी आयु के 7 वर्ष पूरे हो चुकने पर एक दिन उनके माता-पिता के मन में उन्हें पाठशाला में प्रवेश करवा देने का विचार उठा, परंतु उसी क्षण अपने कार्यों से उन्होंने उपस्थित जन समुदाय को प्रत्यक्ष दिखा दिया कि उस समय के बड़े से बड़े दिग्गज विद्वान भी मिलकर उनके ज्ञान की समता करने में असमर्थ हैं। तीर्थंकर भगवान जन्म से ही मति, श्रुत, अवधि ज्ञान के धारी होते हैं। उनके पूर्व जन्म के संस्कारों से वह सभी प्रकार की विधाओं और कलाओं में पहले से ही पूर्ण कुशल थे।  विवाह : काल व्यतीत होने पर वे युवा हुए, तब यशोमती नामक एक सर्वांग सुंदरी एवं सर्वगुण संपन्न कन्या से इनका विवाह हुआ। चक्रवर्ती के रूप में : आपको अपने राज्य में 14 रत्नों और नौ निधियों की प्राप्ति हुई, जिनके प्रभाव से आपने 6 खंड पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित किया।  यशोमती का स्वप्न : यूं कई दिन सुख पूर्वक बीत गए। एक दिन इनकी महारानी यशोमती को अपने मुख में...

भगवान शांतिनाथ की कथा(1)

Image
  भगवान शांतिनाथ की कथा (1) (पूर्व भव में राजा मेघनाथ का वर्णन) ‘शांति कथा’ का महत्त्व  भगवान शांतिनाथ की प्रस्तुत कथा परम पावनी और भुवन भावनी है। इस कथा की महिमा महान है, अलौकिक है और अनुपम है। यह प्रीति और वात्सल्य में वृद्धि करती है। जीवन के पाप-ताप-संताप का शमन होता है। दैन्य और दुर्भाग्य का दमन होता है। नैराश्य का नमन और गर्व का गमन होता है। उमंग, उत्साह और उल्लास का उत्सव होता है। यह अहु (अन्न) का वरण, इच्छाओं का कल्पतरु और कामधेनु है। इसके द्वारा मनोवांछाओं की पूर्ति, ओजस्विता का आकर्षण और विजय का विचरण सहज ही संभव हो जाता है। इससे समृद्धि और शांति का संगम निश दिन बना रहता है। ‘शांति कथा’ सभी सिद्धियों को देने वाली है और सर्व विघ्नों का विनाश करने वाली है। जीवन के प्रत्येक पल में होने वाली कठिन से कठिन उलझनों या समस्याओं का सुगम और संतोष पूर्ण समाधान पलक झपकते एक समय के अंदर ही हो जाता है। शुभ और सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने का यह चमत्कारिक और प्रभावित रूप से एक मात्र उपाय है। इसकी आराधना से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक या अन्य किसी प्रकार के सभी कार्यों की सम्प...

भगवान महावीर स्वामी (13)

Image
  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (13) त्रिपृष्ठ मरकर सातवें नरक में; विजय बलभद्र मोक्ष में (दो भाई - एक मोक्ष में, दूसरा नरक में)  अपने चरित्रनायक महावीर के जीव त्रिपृष्ठ कुमार ने विजय बलभद्र सहित त्रिखण्ड के राज्य का दीर्घकाल तक उपभोग किया। योग्य समय पर उनके पिता प्रजापति ने दीक्षा ग्रहण की और केवलज्ञान प्राप्त करके निर्वाण प्राप्त किया। दूसरी ओर इष्ट एवं मनोज्ञ (वास्तव में अनिष्ट एवं बुरे) विषयों में ही जिसका चित्त लीन है, ऐसा वह त्रिपृष्ठ कुमार निदान बंध के कारण विषयों के रौद्रध्यान सहित निद्रावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ और जिसका असंख्यात वर्षों का घोरातिशय दुःख, चिन्तन में भी नहीं आ सकता, ऐसे सातवें नरक में जा गिरा। अरे रे! एक-एक क्षण तीव्र विषयासक्ति के पापफल में वह जीव असंख्य वर्षों के महा भयानक दुःखों को प्राप्त हुआ।  ऐसे घोर दुःखफल वाले विषयसुखों को कौन सुख कहेगा? उन नरक के दुःखों का वर्णन भी जिज्ञासु को संसार से भयभीत कर देता है। अरे, ऐसे दुःख? उनसे बचना हो तो अज्ञान को छोड़कर आत्मज्ञान करना चाहिए, विषयों के प्रति वैराग्य करना चाहिए। यह महावीर का जीव पूर्वकाल...

भगवान महावीर स्वामी (5)

Image
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (5) अग्निमित्र ब्राह्मण और चौथे स्वर्ग में देव दूसरे स्वर्ग से निकल कर मरीचि का जीव भरतक्षेत्र की मन्दिर नगरी में एक ब्राह्मण के घर अग्निमित्र नाम का पुत्र हुआ। उसके काले केश, जो अन्तर की मिथ्यात्व रूपी कालिमा को सूचित कर रहे थे, उसी प्रकार फरफर होते थे। युवावस्था में गृहवास छोड़कर वह पुनः संन्यासी होकर तीव्र तप करते हुए मिथ्यामार्ग का उपदेश देने लगा। दीर्घकाल तक कुपथ का प्रवर्तन करके अन्त में मिथ्यादर्शनपूर्वक मरकर वह चौथे माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। असंख्य वर्षों तक स्वर्गलोक की विभूतियों को पुण्यफल में भोगा, परन्तु अन्त में जिस प्रकार सूखा पत्ता डाल से गिर पड़ता है, तदनुसार पुण्य सूख जाने पर वह स्वर्गलोक से मनुष्यलोक में गिर पड़ा।  भारद्वाज ब्राह्मण और पुनः चौथे स्वर्ग में  चौथे स्वर्ग से च्युत होकर वह जीव स्वस्तिमती नगरी में भारद्वाज नाम का ब्राह्मण हुआ और पुनः गतजन्म की भाँति संन्यासी होकर कुपथ में जीवन गँवाकर चौथे स्वर्ग में गया।  स्वर्गलोक की अनेक ऋद्धियाँ तथा देवांगनाओं आदि के वैभव में आसक्तिपूर्वक असंख्य वर्षों का जीवन बिता दिया,...

मेरी भावना (47) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से

Image
  मेरी भावना (47) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं बोलिए मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की जय!!! प्रश्न (दीप शिखा जी जैन, जींद, हरियाणा) - नमोस्तु महाराज श्री! वायरस तो चीन से आया उनके पाप कर्म से, लेकिन उसका भुगतान सारी दुनिया कर रही है। तो मेरी जिज्ञासा है कि क्या उनके पाप का समर्थन हमने भी किया था?  उत्तर - अवश्य किया था। 100% किया था और आज भी कर रहे हैं। जो लोग Globalization का समर्थन करते हैं, वैश्विक व्यापार का, जिसमें खाना पीना, कहीं भी किसी देश का आ रहा है, किसी भी देश का कहीं जा रहा है, तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान तो हमारा होता है। क्यों होता है? हम अपना शुद्ध भोजन वहां पहुंचाते हैं। उनके यहां कहीं पर भी गेहूं, चावल आदि नहीं होते हैं। हम दूसरे देशों में गेहूं, चावल, दालें पहुंचा रहे हैं और वहां का जो मांसाहार है, उसको हम अपने देश में ला रहे हैं। इस Globalization से सबसे बड़ा नुकसान अपन लोगों को होता है। तो हम भी उसके भागीदार हैं। तभी त...

मेरी भावना (46) सब दुःख संकट सहने की कला

Image
  मेरी भावना (46) सब दुःख संकट सहने की कला (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं अंत में एक और भावना की गई है -  फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे। अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहीं, कोई मुख से कहा करे।।  बन कर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नतिरत रहा करे। वस्तु स्वरूप विचार ख़ुशी से, सब दुःख संकट सहा करे।। इस ‘मेरी भावना’ को बनाने वाले जो कवि हैं, वे केवल कवि ही नहीं, एक अच्छे साहित्यकार थे और जैन दर्शन के प्रति और सभी दर्शनों के प्रति उदार भावना रखने वाले अच्छे व्यक्ति थे। उनके आगे उपाधि लगती थी ‘युगवीर’ की। तो यही उन्होंने इसमें ‘युगवीर’ लिखा है कि आप अपने इस समय के युग के वीर बन कर देश की उन्नति के काम करो, जिससे देश में उन्नति हो। लेकिन पहले यह भावना रखो कि देशोन्नतिरत तो रहा करें, लेकिन सबसे पहले सबके मन में प्रेम भाव रहे। प्रेम भाव होते हुए भी मोह नहीं होना चाहिए। प्रेम में और मोह में अंतर होता है।  जैसे मान लो कि हमारे सामने यह Book रखी हुई है। प्रेम का मतलब यह है कि इस Book क...

मेरी भावना (45) सर्वहित की भावना

Image
  मेरी भावना (45) सर्वहित की भावना (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाए ये मेरी भावना की लगभग अंतिम लाइनें हैं। आप यही भावना भाएं। ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे। धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।। रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे। परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे।। वृष्टि का अर्थ है - वर्षा। वर्षा समय पर होने का नाम सुभिक्ष कहलाता है और वर्षा समय पर न हो, असमय में हो तो दुर्भिक्ष कहलाता है। ज्यादा हो जाए तो उसको बोलते हैं अतिवृष्टि और बिल्कुल न हो तो उसको बोलते हैं अनावृष्टि। ये दोनों ही प्रकार की वृष्टियां अकाल का सूचक हैं, अच्छे समय का सूचक नहीं है। अकाल का मतलब है कि बुरा समय चल रहा है, समय खराब आ गया है। तो आप देखते हैं कि कहीं पर वृष्टि इतनी हो रही है कि लोग डूब रहे हैं, मकान के मकान डूब रहे हैं, दुकान की दुकान नष्ट हो रही हैं। लोग मर भी रहे हैं। वहाँ इतने पानी की ज़रूरत नहीं है, फिर भी वर्षा हो रही है। इसको बोलते हैं अतिवृष्टि।...

मेरी भावना (44) ईति की भीति और कारोना महामारी का कारण

Image
    मेरी भावना (44) ईति की भीति और कारोना महामारी का कारण (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं परम पूज्य महामुनिराज श्री 108 विद्यासागर महाराज की जय!!  अर्हम योग प्रणेता परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज की जय!!  आज हमारे प्रबल पुण्य का उदय है कि इस युग में हमें महावीर सम गुरुवर मिले। बड़े-बड़े ग्रंथों को अत्यंत सरल शब्दों में समझाने वाले, हम सभी के आराध्य पूज्य गुरुवर ने आत्मानुशासन, समाधि तंत्र, पुरुषार्थसिद्धिउपाय आदि बड़े-बड़े ग्रंथों की संस्कृत टीका करके जैन आगम को और सुदृढ़ बनाया है। पूज्य गुरुदेव ने प्राकृत भाषा को घर-घर तक पहुंचाया और जैन आचार्यों की भाषा से हमें अवगत कराया। ऐसी पूज्य गुरुवर की मंगल देशना से हम सभी ‘मेरी भावना’ का रसपान कर रहे हैं फेसबुक के माध्यम से, तो सभी गुरुदेव के चरणों में हाथ जोड़कर नमोस्तु निवेदित करते हुए गुरुदेव से प्रार्थना करेंगे कि आप अपनी मंगलमय वाणी से हम सभी का मोक्ष मार्ग प्रकाशित करें। हे गुरुदेव नमोस्तु! नमोस्तु! नमोस्तु!  ‘मेर...

मेरी भावना (42) हर घर में धर्म की चर्चा

Image
  मेरी भावना (42) हर घर में धर्म की चर्चा (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं घर-घर चर्चा रहे धर्म की।   हर घर में यही चर्चा हो। बस! ऐसे ही मेरी भावना की, प्रवचन सार की, द्रव्य संग्रह की, पार्श्व कथा की, रत्नकरण्डश्रावकाचार की ही चर्चा हो।। घर-घर में ऐसा ही मंगल वातावरण हो, धर्म की चर्चा हो और - दुष्कृत दुष्कर हो जावे।   दुष्कृत का मतलब है - पाप। पाप करना तो दुष्कर ही हो जाए अर्थात् कठिन हो जाए, देखने को भी न मिले कि कहीं कोई पाप हो रहा है। आप भावना तो कर सकते हो, पूरे विश्व के लिए, ऐसी मंगलमय भावना! आपकी भावनाओं की तरंगें ही इकट्ठी होकर इस विश्व के अंदर कोई मंगलमय वातावरण तैयार कर सकती हैं। लेकिन हम कोई भावना करने के लिए अपना Mood बनाते ही नहीं।  बच्चे और बड़े सभी टी.वी. देखते रहेंगे, मोबाइल पर घंटों लगे रहेंगे, लेकिन कोई अच्छा भाव करने के लिए मोबाइल छोड़कर 5 मिनट बैठेंगे नहीं। बस! इसी में हम अपना Time Waste तो करते रहेंगे, लेकिन Time को जहां Invest करना चाहिए, वह Invest करने वाली ज...