भगवान शांतिनाथ (2)

  भगवान शांतिनाथ की कथा (2)

(पूर्व भव में राजा मेघनाथ का वर्णन)

शांतिनाथ प्रतिभा के पुरुष :

भगवान शांतिनाथ अपने बाल्य काल से ही बहुत गुणशील, धर्मात्मा और अप्रतिम प्रतिभा के धनी थे। उनकी आयु के 7 वर्ष पूरे हो चुकने पर एक दिन उनके माता-पिता के मन में उन्हें पाठशाला में प्रवेश करवा देने का विचार उठा, परंतु उसी क्षण अपने कार्यों से उन्होंने उपस्थित जन समुदाय को प्रत्यक्ष दिखा दिया कि उस समय के बड़े से बड़े दिग्गज विद्वान भी मिलकर उनके ज्ञान की समता करने में असमर्थ हैं। तीर्थंकर भगवान जन्म से ही मति, श्रुत, अवधि ज्ञान के धारी होते हैं। उनके पूर्व जन्म के संस्कारों से वह सभी प्रकार की विधाओं और कलाओं में पहले से ही पूर्ण कुशल थे। 

विवाह :

काल व्यतीत होने पर वे युवा हुए, तब यशोमती नामक एक सर्वांग सुंदरी एवं सर्वगुण संपन्न कन्या से इनका विवाह हुआ।

चक्रवर्ती के रूप में :

आपको अपने राज्य में 14 रत्नों और नौ निधियों की प्राप्ति हुई, जिनके प्रभाव से आपने 6 खंड पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित किया। 

यशोमती का स्वप्न :

यूं कई दिन सुख पूर्वक बीत गए। एक दिन इनकी महारानी यशोमती को अपने मुख में चक्र उतर आने का सपना दिखा। इसका सारा वर्णन उसने महाराज के सामने प्रकट किया और स्वप्न का अर्थ पूछा। 

प्रभु द्वारा पूर्वभव-कथन :

महाराज ज्ञान निधान थे। कुछ क्षणों तक वे अपने ज्ञान बल से उस पर विचार करते रहे। तब वह यशोमती से बोले -

प्रिये! पूर्वभव में ‘दृढ़रथ’ नामक मेरा भाई था। इस समय वह जीव सर्वार्थ सिद्धि नामक विमान में है। वहां से अब चलकर वह अपने घर पुत्र के रूप में आ रहा है। उस समय मैं ‘विदेह क्षेत्र’ की पुण्डरीकिणी नगरी में ‘मेघरथ’ नाम का राजा था।

राजा मेघरथ की इन्द्र द्वारा प्रशंसा :

एक बार शकेन्द्र नामक इन्द्र ने मेरे सत्य की प्रशंसा अपनी देवसभा में की, किंतु सभी स्थलों में और सब कालों में एक जैसे लोग विद्यमान नहीं रहते। इस न्याय से वहां भी उस समय दो देव ऐसे निकल आए, जिन्हें मेरी प्रशंसा खूब अखरी। उन्होंने उसे कपोल कल्पित कल्पना ही समझा।

दो देवों का दर्प : मेघरथ की महानता :

उसी समय उन्होंने मेरे सत्य की परीक्षा का विचार अपने मन में ठाना। तब उनमें से एक ने कबूतर का और दूसरे ने बाज का रूप धारण किया और वे मेरे निकट आए। पहले कबूतर मेरी गोद में आकर बैठ गया। उसके कुछ क्षण बाद वह बाज रूपधारी देव भी लपकता हुआ वहां आ पहुंचा। उस कबूतर को मेरी गोद में बैठा देखकर उस बाज ने मुझसे कहा - राजन्! तुम्हें यह अधिकार किसने दिया कि मेरे भोजन को छुपा कर और चुरा कर तुम अपनी गोद में रख लो। चलो! उसे छोड़ो और तुरंत वापस करो। 

‘अब तो वह छोड़ा भी कैसे जा सकता था? शरण में आए हुए को यों अनाथ बनाकर मौत के पंजे में छोड़ देना तो बुजदिलों का काम है। राजपूतों का धर्म और कर्तव्य तो यह है कि अपने तन में प्राण रहते वह अपनी शरण में आए हुए की रक्षा करें। उन्हें अभयदान दें। अतः भाई! मेरे दम में दम रहते हुए मैं तुम्हें इसे कैसे दे सकता हूं?’, मैंने सीधा सा उत्तर दिया।

‘अच्छा! छोड़ो इस बात को। यह नहीं देना तो न सही। इसके बदले कम से कम तुम मुझे अपने शरीर का मांस देकर मेरी भूख मिटा दो। मैं इतने में ही संतोष मान लूंगा’

‘हां! यह उपाय तो ठीक सुझाया। तुम्हारी यह बात मुझे खूब पसंद आई। तुम ऐसा करके खुशी-खुशी अपनी भूख मिटा सकते हो।’

‘अच्छा! तो चलो। तराजू और बाट लाओ। तराजू के एक पलड़े में कबूतर को उठाकर रख दो और दूसरे में अपने ही हाथ से काट-काट कर कबूतर के बराबर अपना मांस मुझे तोल कर दो।’ 

राजा मेघरथ का देहदान : परीक्षा की पराकाष्ठा 

बाज की इस बात से प्रसन्नता के मारे मेरी नस-नस फड़क उठी। परंतु मेरा यह निर्णय मेरे दीवान, महारानी व अन्य कुटुंबियों और राज कर्मचारियों को रत्ती भर भी न रुचा। वे सब के सब मुझे अपने इस निर्णय से विरत करने की चेष्टा करने लगे। तब मैं ही अपने निश्चय से क्यों डिगने लगता? मैं टस से मस भी नहीं हुआ। 

अंत में तराजू और छुरी मंगवाई। उनके आते ही मैंने अपनी जांघ का मांस काट कर तराजू के एक पलड़े में रखा। दूसरे में उस कबूतर को बैठाया गया। काटते-काटते मैंने अपने शरीर का काफी भाग काट कर चढ़ा दिया, तब भी कबूतर के बराबर न होते हुए देखकर मैं स्वयं ही तराजू के पलड़े में जा बैठा।

दोनों देवों द्वारा प्रशस्ति :

यह देखकर तो वह बाज रूपधारी देव अपने असली रूप को और अधिक समय तक छुपा कर न रख सका। अपना असली रूप प्रकट करके वह प्रसन्नता पूर्वक उछल पड़ा और बोला - 

‘राजन्! मैं तुम्हारी शरणागत की रक्षा करने की प्रशंसा करता हूं और तुम्हारी सत्यशीलता पर बार-बार बलिहारी जाता हूं। यह सारी माया मैंने और इस कबूतर रूपी देव ने तुम्हारी सत्यवादिता की केवल परीक्षा करने के लिए रची थी। उस परीक्षा में तुम 52 तोला और पाव रत्ती पूरे उतरे। मुझे अभी कुछ नहीं चाहिए।’

यूं कहते हुए उन्होंने मेरे शरीर को पहले जैसा ही सुंदर बना दिया। तब वे दोनों देव अपने परिंदों के रूप में वहां से कूच कर गए। 

‘महारानी! यही मेरे पूर्व भव का वृतान्त है। मेरी उस सत्य वादिता और दया के प्रचण्ड प्रताप से हमें इस भव में ऐसी उच्च स्थिति प्राप्त हुई है।’ 

यूँ अनेक वर्षों तक धर्मपूर्वक न्याय और नीति के साथ राज्य करते हुए ‘मेघरथ’ के जीव ने तीर्थंकर पद प्राप्ति का पुण्यार्जन किया और सर्वार्थ सिद्धि नामक विमान में उत्पन्न हुआ। अब वहां से वही ‘मेघरथ’ का जीव यहां शांतिनाथ भगवान के रूप में आया है। 

तीर्थंकर के रूप में : 

इन्हीं शांतिनाथ ने लोक कल्याण के लिए 6 खण्ड के राज्य का परित्याग करके दीक्षा धारण की। दीक्षा के कुछ ही काल के पश्चात् उनके चारों घातिया कर्मों का पूरा-पूरा नाश हो गया और केवल ज्ञान की प्राप्ति हो गई। विहार के दिनों में जहां भी आप कहीं विचरण करते तथा विराजते, उस स्थान के आसपास के कई कोसों के गांवों में एकछत्र के रूप से अखंड शांति की व्याप्ति हो जाती।

अंत में एक दिन अपने संपूर्ण कर्मों का जड़ मूल से उच्छेदन करके भगवान शांति नाथ जी मोक्ष धाम को पधार गए। इनका नाम सचमुच बहुत ही उत्तम, हृदयग्राही और मांगलिक है। प्रातः कालीन भजन-स्मरण में उनके नाम का जाप वास्तविक रूप में बहुत हितप्रद, शांति दायक और मनोकामना को पूर्ण करने वाला है। भगवान शांति नाथ की इस पावन कथा को पढ़ने-पढ़ाने से संपूर्ण प्रकार के दैहिक, दैविक, और भौतिक ताप का सर्वनाश होकर इस जीवन में अक्षय चिरशांति प्राप्त होती है। 

दो प्राणीमात्र को शांति, तभी तुम भी शांति को पाओगे।

जगजीव तुम्हें अपनाएंगे, जब जग को तुम अपनाओगे।।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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