मेरी भावना (44) ईति की भीति और कारोना महामारी का कारण

 

 मेरी भावना (44) ईति की भीति और कारोना महामारी का कारण

(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)

आदिनाथ भगवान की जय 

मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं

परम पूज्य महामुनिराज श्री 108 विद्यासागर महाराज की जय!! 

अर्हम योग प्रणेता परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज की जय!! 

आज हमारे प्रबल पुण्य का उदय है कि इस युग में हमें महावीर सम गुरुवर मिले। बड़े-बड़े ग्रंथों को अत्यंत सरल शब्दों में समझाने वाले, हम सभी के आराध्य पूज्य गुरुवर ने आत्मानुशासन, समाधि तंत्र, पुरुषार्थसिद्धिउपाय आदि बड़े-बड़े ग्रंथों की संस्कृत टीका करके जैन आगम को और सुदृढ़ बनाया है। पूज्य गुरुदेव ने प्राकृत भाषा को घर-घर तक पहुंचाया और जैन आचार्यों की भाषा से हमें अवगत कराया। ऐसी पूज्य गुरुवर की मंगल देशना से हम सभी ‘मेरी भावना’ का रसपान कर रहे हैं फेसबुक के माध्यम से, तो सभी गुरुदेव के चरणों में हाथ जोड़कर नमोस्तु निवेदित करते हुए गुरुदेव से प्रार्थना करेंगे कि आप अपनी मंगलमय वाणी से हम सभी का मोक्ष मार्ग प्रकाशित करें। हे गुरुदेव नमोस्तु! नमोस्तु! नमोस्तु! 

‘मेरी भावना’ के इस सत्र में आज हमें फिर से यह मौका मिला है कि हम मेरी भावनाओं में लिखित जो भावनाएं हैं, उन्हें अपनी भावना बनाएं और जो भावनाएं हमें भाने में शेष रह गई हैं, उन भावनाओं को भी हम पढ़कर अपनी भावना बनाने की कोशिश करें। इसी क्रम में आज यह छंद पढ़ते हैं- 

ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।

धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।।

रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे।

परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे।।

आज हम देखते हैं कि सारे जगत में कुछ ऐसी बीमारियां फैलती हैं, जिन बीमारियों को महामारी के नाम से जाना जाता है। ये बीमारियां पहले भी हुआ करती थीं। उन बीमारियों को पहले के समय में ईति, भीति, रोग, मरी, दुर्भिक्ष आदि इन नामों से जाना जाता था। यानी उन बीमारियों में पूरी की पूरी प्रजा में, पूरे के पूरे राष्ट्र में, पूरे के पूरे देश में उस बीमारी का ऐसा आतंक फैल जाता है कि सारी प्रजा उससे पीड़ित होने लग जाती है। इस तरह की जो परेशानियां, आपदाएं आती हैं, ये पहले भी आया करती थीं और पहले इस रूप में रहा करती थीं कि लोगों के लिए अगर ये आपदाएं आ गई हैं, तो उन्हें उसका बहुत नुकसान भुगतना पड़ता था। ये वे बीमारियां कहलाती हैं जैसे - ईति, भीति। ईति का मतलब होता है कि जैसे आजकल आपने एक और आपदा सुनी होगी- टिड्डियों का आतंक। यह ईति कहलाती है। आपके लिए ये चीजें बड़ी नहीं हैं। लेकिन ये बहुत बड़ी-बड़ी आपत्तियां हैं, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और अगर कृषि पर ही किसी भी प्रकार की आपदा आ जाती है, कृषि पर ही किसी भी प्रकार के जीव जंतुओं के माध्यम से कोई आतंक होने लग जाता है, तो सारी की सारी फसल नष्ट हो जाती है और जब फसल नष्ट हो जाएगी, तो आप लोगों को खाने-पीने को उचित ढंग से नहीं मिल पाएगा। ऐसा जब होता था, तब उसको ईति कहा जाता था। 

ईति भीति व्यापे नहीं जग में,

यह भावना की जाती है कि इस जगत में, इस संसार में कभी भी यह ईति की भीति व्याप्त न हो। भीति का अर्थ होता है- भय। यानी इस तरह के टिड्डियों आदि के जो आतंक होते हैं, इनका भय कभी भी संसार में व्याप्त न हो। इस तरह की भावना भी की जाती है, ताकि किसी को इस तरह की आपदाओं से गुजरना न पड़े। तो यह जो ईति है, यह भी एक बड़ी बीमारी पहले हुआ करती थी और यह आज भी देखने में आ रही है। जिस समय पर यह कोरोना का आतंक फैला, उसी समय पर यह टिड्डियों का भी आतंक आया था। कहां से आया था? पाकिस्तान से आया था! तो ऐसा आतंक तो कहीं से भी आ सकता है। ऐसी कोई बात नहीं है। पाकिस्तान में खुद भी यह आतंक फैल सकता है और अन्य देशों में भी आतंक फैल सकता है। 

अब आप लोग इस आतंक को बहुत बड़ा नहीं समझते हो, इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते हैं लोग, जबकि यह बहुत बड़ा आतंक है। क्योंकि जहां से इन जंतुओं का, इन जीवों का यह दल निकलता है, यह दल का दल, समूह का समूह बहुत बड़ा रहता है और जिस खेत से निकल जाता है, वहां की जितनी भी फसल होती है, सबको नष्ट कर देता है। इससे बहुत बड़ा नुकसान होता है। जब किलोमीटरों तक की फसलें इनके माध्यम से नष्ट हो जाएंगी, तो अपने आप एक दुर्भिक्ष का वातावरण तैयार हो जाएगा। दुर्भिक्ष क्या होता है? खाने-पीने के लिए उचित समय पर, उचित सामग्री न मिले, इसका नाम है दुर्भिक्ष। यह भी एक बहुत बड़ी आपदा होती है, जो समय-समय पर आया करती है। 

आचार्य भद्रबाहु महाराज के समय पर यह दुर्भिक्ष की आपदा आई थी, जो 12 वर्ष तक रही। उस समय में नई फसलें उत्पन्न नहीं होती। जो पहले से आपने अपने पास रखा हुआ है, उसी को आप खाते रहो। उसी को आप अपने काम में लेते रहो और वह सब पुराना जो रखा हुआ है, वह धीरे-धीरे जब समाप्त होने लग जाता है, तो लोग खाने-पीने के लिए बहुत परेशान हो जाते हैं। तब यह दुर्भिक्ष का वातावरण बन जाता है। बहुत भयंकर वातावरण बनता है यह। अगर आप कभी शास्त्रों में पढ़ोगे उस 12 वर्ष के दुर्भिक्ष का वर्णन, तो आप सोचोगे कि क्या ऐसा संभव है? मतलब यह है कि इतना बड़ा दुर्भिक्ष का वातावरण कि लोगों के पास कुछ भी खाने को नहीं रहता और लोग इतने ज्यादा भूख से तड़पने लग जाते हैं कि अगर कोई व्यक्ति कहीं से आता हुआ दिखाई दे रहा हो और उसे पता हो कि यह कहीं से खाकर आ रहा है तो उसका पेट तक फाड़ देते लोग। 

इसको बोलते हैं कि भूखा क्या नहीं करता? भूखा व्यक्ति सब कुछ कर सकता है। भूख एक बहुत बड़ी आपत्ति है। इसीलिए जैन दर्शन में क्षुधा को एक वेदना कहा जाता है, इसे भी एक रोग का रूप कहा जाता है। समय पर इसका शमन करते रहते हैं, समय पर इस गड्ढे में सामग्री भरते रहते हैं, तब तक तो हम ठंडे रहते हैं और जिस दिन समय पर वह वस्तु नहीं मिलती है, तो हमारे Temper बहुत High हो जाते हैं। इसलिए यह समझो कि जब व्यक्ति को दो दिन, चार दिन, आठ दिन खाने को न मिले, तो एक-एक कण की कीमत उस समय पर समझ में आती है और उस व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा भी कुछ खाने को या इतना-सा भी पीने को मिल गया, तो वह सोचता है कि चलो, इतना बहुत हो गया। ऐसा सोच करके भी लोग दिन निकालने लग जाते हैं। इतनी बुरी स्थिति आ जाती है। जो बड़े-बड़े सेठ या राजा लोग होते हैं, ये सब भी जो अपने पास भंडारा रखते हैं, वह भी देने के बाद सब खाली हो जाता है। 

12 वर्ष तक कितना बड़ा भंडारा चलेगा? जब इनपुट हो न और सब कुछ जा रहा हो, तो भंडारा कितना चलेगा? तभी तो स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि दुर्भिक्ष के समय को अकाल बोलते हैं कि अकाल पड़ रहा है। एक बार और ऐसा अकाल पड़ा था, अभी अपने स्वतंत्रता  के समय पर बताया जाता है, जब पूर्व राष्ट्रपति हुए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी। तो उस समय पर भी ऐसा अकाल पड़ा। कुछ कम समय के लिए पड़ा। लेकिन उन अकाल के दिनों में भी उन्होंने उस अकाल को जीतने की या इस स्थिति से निपटने की एक योजना उस समय पर बताई थी, जो बहुत कम लोगों को मालूम होगी। उन्होंने कहा कि अब हम सब लोगों को इस अकाल से निपटने के लिए, इस परिस्थिति से निपटने के लिए एक संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल दिन में एक बार भोजन करें। मुनि महाराज तो एक बार भोजन करते ही हैं, पर श्रावक दो बार भी भोजन करता है, तो वह भी एक बार करे और खुद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी ने भी इस नियम को अपनाया था। क्योंकि यदि हम एक बार खाएंगे, तो बार-बार खाने से जो भोजन केवल हमारे लिए लगना है, वह दूसरों के काम में आएगा। अकाल के समय इतनी स्थिति बिगड़ जाती है। भोजन को सबके पास तक लंबे समय तक पहुंचाने के लिए इस तरह के भी नियम लागू करने पड़ते हैं, तब अकाल की स्थितियों से ऊपर उठ पाते हैं।

आप के लिए तो आज का समय बहुत सुख का समय है। भारतीय व्यंजन तो आपके लिए होते ही हैं, दुनिया के जितने भी और देशों के व्यंजन हैं, उनको भी आप खाने-पीने में कमी नहीं रखते हो। चाइनीज फूड हो, चाहे और किसी U.S. U.K. के कोई भी व्यंजन हों, सब कुछ आपको खाना है। अपना भी खाना है और उनका भी खाना है। भारत के लोग यह भी नहीं सोचते हैं कि हम केवल अपने ही देश में उत्पन्न हुआ भोजन करें, दूसरे देशों का भोजन हमें करने की क्या जरूरत है? उन देशों के लोगों के लिए उन देशों का भोजन है। उसकी पूर्ति वे अपने देश में ही नहीं कर पा रहे हैं, तो हम क्यों उस भोजन को करें? पहले वे अपने देशों की पूर्ति तो कर लें, अपने देश के लोगों को पर्याप्त भोजन सामग्री प्रदान कर लें, इतना ही बहुत है। 

आज मैं समझता हूं कि अगर हम इतना भी कर पाते हैं, तो भी इन मेरी भावनाओं को पढ़ते हुए, वह हमारे लिए कुछ न कुछ तो नियमित, कुछ न कुछ तो हमें संयमित होने का कारण बनेंगी। जो अकाल पड़ने का कारण है, वह व्यक्ति का जरूरत से ज्यादा भोजन करना भी है। नहीं भी जरूरत होती है, तो भी भोजन किए जाओ, किए जाओ। तरह-तरह के मिष्ठान्न, तरह-तरह के व्यंजन बनाते जाओ, खिलाते जाओ, खाते जाओ। यह आदमी के लिए एक शौक बन गया है, लेकिन शौक बनने के साथ-साथ इसको अगर हम उस अकाल की स्थिति से नापें, कौन सी अकाल की स्थिति? जब उन पूर्व राष्ट्रपति ने घोषणा की थी कि भाई! एक बार भोजन खाओ, तो इसका मतलब है कि बार-बार भी अगर हम अधिक भोजन को अपने उपयोग में लाते हैं, तो कहीं न कहीं हम खाद्य व्यवस्था के लिए संकट का काम तो कर रहे हैं। इसको बोलते हैं खाद्यान्न पर संकट आना। इसे खाद्य संकट बोलते हैं। 

हर व्यक्ति को अगर नियमित रूप से अपने जीवनचर्या को चलाना हो, तो कम से कम इतना सोचना चाहिए कि तीर्थंकर महावीर भगवान ने हम गृहस्थ श्रावकों के लिए यह बताया है कि वे दिन में केवल दो बार ही भोजन करें। सुबह और शाम को और सुबह भी भोजन कब करें? सूर्य उदय होने के बाद 48 मिनट तक तो कुछ भी न खाएं। कम से कम इतना नियम होना चाहिए। उसके बाद ही खाना पीना शुरू करें और शाम को भी सूर्य अस्त होने के 48 मिनट पहले अपना सब खाना पीना पूरा करके Free हो जाएं। अगर श्रावक ऐसा करेगा, तो बहुत कुछ सुभिक्ष का वातावरण बना रहेगा। खाद्यान्न का संकट देश पर नहीं आएगा और हमारा जीवन भी संयमित होकर बहुत कुछ धार्मिक बना रहेगा।।

सबसे बड़ी बात यह है कि ज्यादा खाने से होने वाले रोगों से भी हम बचे रहेंगे। ज्यादा खाने से भी Immunity System Weak हो जाता है। यह बात ध्यान में रखना। आज बहुत तेजी से यह हवा फैल रही है कि Immunity बढ़ाओ, Immunity बढ़ाओ। Immunity बढ़ाने के लिए क्या करो? खाओ तो, लेकिन ज्यादा खाओगे तो इम्यूनिटी कम हो जाएगी। खाना भी Limit में खाया जाता है। डॉक्टर भी कहते हैं कि ज्यादा खाओगे और ज्यादा बार खाओगे, तो भी बीमार पड़ जाओगे। इसलिए ये जो संकट आते हैं, ये हमारे असंयम से आते हैं। आज भी अगर कोई संकट है, जिसे हम कोरोना महामारी के रूप में जान रहे हैं, यह भी हमारे असंयम का ही परिणाम है और सबसे ज्यादा अगर यह संकट हमारे पास तक आ रहा है, फैल रहा है, तो यह उन देशों के लोगों और उन देशों की वस्तुओं के संपर्क में आने से फैल रहा है, जहाँ पर इन देशों ने यह संकट अपने लिए खड़ा किया था और वह संकट फिर उन्होंने दुनिया में फैला रखा है। क्यों फैल गया? 

देखो, सोचो, आप लोग तरक्की, तरक्की, तरक्की, बहुत सोचते हो। अगर आज इस तरह का जमाना न होता है कि Aeroplan न होते, तो दुनिया के दूसरे देशों के लोग वहां से यहां तक जब पहुँचते, तो कम से कम 15 दिन लग जाते उनको। Ship वगैरह से आते, तो उन्हें बहुत Time लग जाता। तो 15 दिन अगर किसी को वहां से यहां आने में लग रहे हैं, एक देश से दूसरे देश में जाने में लग रहे हैं, तो काफी कुछ तो क्वारंटीन वह अपने आप ही हो जाता। अब आपने इतने बड़े-बड़े हवाईजहाज़ों की व्यवस्था कर ली कि सुबह वहाँ थे और शाम का यहाँ पहुँच गए, तो बस! कोरोना भी सुबह वहाँ था और शाम का यहाँ पहुँच गया।

आपकी जो तरक्की है न, उसी के कारण से ये बीमारियां अपने देश में थी नहीं, वहाँ से आई हैं और यह जो बीमारी आई है, यह उनके संपर्क से आई है। उन लोगों के माध्यम से आई है, जो विदेशों से उसे अपने देश के भीतर लाए हैं। जब यह बीमारी फैलने लगी, तो सब लोगों ने अपने बच्चों को घर में बुला लिया। उस समय तो इतनी Awareness थी नहीं कि भाई! आपको क्वारंटीन होना है या आपको अपने हाथ-पैर Sterilize करना है, या यह करना है, वह करना है। सब जल्दी-जल्दी अपने घरों में आकर बैठ गए और जितनी उड़ानों से उड़ कर जितनी जल्दी-जल्दी विदेश में रहने वाले अपने लोग यहाँ आए, उन्हीं से कोरोना यहाँ फैला, या सीमा पर ड्यूटी देने वाले लोग, जो सीमा पार के देश से आदान-प्रदान करते रहे, उनके द्वारा ये बीमारियाँ फैलती हैं।

महामारियाँ हमेशा एक दूसरे के सम्पर्क से ही फैलती हैं और दूसरी बात यह है कि  सब लोग चायना का फूड खाने में तो मस्त ही है। जितने भी चायनीज़ आइटम हैं, अभी भी आपको उन्हें खाने में कोई तकलीफ तो हो ही नहीं रही है। भले ही कोरोना जिसको हो रहा है, होने दो। जब अपने को होगा, तो देखा जाएगा। अभी भी आपने चायनीज़ आइटम का बहिष्कार करना तो दूर की बात है, त्याग भी नहीं किया है। 

ये बातें हमें बताती हैं कि हम अपने असंयम के कारण ही इस तरह की बीमारियों को निमंत्रण देते हैं। इसलिए यहां जो कहा जा रहा है कि यह बहुत अच्छी भावना है। आप आज के समय में इस भावना को भाओ -

ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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