भगवान महावीर स्वामी (13)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (13)

त्रिपृष्ठ मरकर सातवें नरक में; विजय बलभद्र मोक्ष में

(दो भाई - एक मोक्ष में, दूसरा नरक में) 

अपने चरित्रनायक महावीर के जीव त्रिपृष्ठ कुमार ने विजय बलभद्र सहित त्रिखण्ड के राज्य का दीर्घकाल तक उपभोग किया। योग्य समय पर उनके पिता प्रजापति ने दीक्षा ग्रहण की और केवलज्ञान प्राप्त करके निर्वाण प्राप्त किया। दूसरी ओर इष्ट एवं मनोज्ञ (वास्तव में अनिष्ट एवं बुरे) विषयों में ही जिसका चित्त लीन है, ऐसा वह त्रिपृष्ठ कुमार निदान बंध के कारण विषयों के रौद्रध्यान सहित निद्रावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ और जिसका असंख्यात वर्षों का घोरातिशय दुःख, चिन्तन में भी नहीं आ सकता, ऐसे सातवें नरक में जा गिरा। अरे रे! एक-एक क्षण तीव्र विषयासक्ति के पापफल में वह जीव असंख्य वर्षों के महा भयानक दुःखों को प्राप्त हुआ। 

ऐसे घोर दुःखफल वाले विषयसुखों को कौन सुख कहेगा? उन नरक के दुःखों का वर्णन भी जिज्ञासु को संसार से भयभीत कर देता है। अरे, ऐसे दुःख? उनसे बचना हो तो अज्ञान को छोड़कर आत्मज्ञान करना चाहिए, विषयों के प्रति वैराग्य करना चाहिए। यह महावीर का जीव पूर्वकाल में अज्ञानदशा से भवभ्रमण करता हुआ त्रिपृष्ठ वासुदेव जैसा महान अवतार प्राप्त करके भी विषय-कषायों में लीनता वश सातवें नरक में गया। उससे ज्ञात होता है कि अरे जीव! अज्ञानी जन जिसमें सुख मान रहे हैं, उन्हें तू नरक समान दुःख दाता जान और उनसे विमुख होकर चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख को सच्चा सुख जान कर उसकी अनुभूति में संलग्न हो। विषय कषाय का कण भी दुःख ही होता है और चैतन्यानुभूति के कण में भी महान सुख है।

कहाँ अर्ध चक्रवर्ती के तीन खण्ड के राजवैभव की अनुकूलता और कहाँ यह सातवें नरक की प्रतिकूलता।

अपने भाई त्रिपृष्ठ की मृत्यु होने पर विजय बलभद्र छह मास तक उद्वेग में रहे; पश्चात् वैराग्य प्राप्त करके जिनदीक्षा धारण की, और रत्नत्रय रूपी अमोघ अहिंसक अस्त्र द्वारा समस्त कर्मों का क्षय करके मोक्ष प्राप्त किया।

अरे! सदा साथ रहने वाले दो भाई.... इनमें से एक ने तो वीतराग चारित्र द्वारा मोक्ष प्राप्त किया, और दूसरे ने विषय-कषायवश सातवें नरक में घोर दुःख पाए। यह जानकर हे भव्य जीव! तुम विषय-कषाय से विरक्त होकर वैराग्य मार्ग की आराधना करो। 

अरे! जीव के परिणामों की विचित्रता तो देखो, कि वही जीव पुनः नरक से निकलकर वर्तमान में मोक्ष में विराजमान है, और हम उसे ‘भगवान महावीर’ रूप में पूजते हैं।

पूर्वभव : सिंह होकर नरक में और पुनः सिंह

सातवें नरक में, एक नारकी ने आकर भाले से उसकी आँखें फोड़ डालीं; वह दुःख से चीत्कार करता, उससे पूर्व ही अन्य नारकियों ने उसके शरीर में भाले घोंप दिये; वह गिरा कि उसे उठाकर उबलते हुए लाल रस में डालकर गला दिया। अरे! उसके करोड़ों दुःखों का कौन वर्णन कर सकता है?

बड़ी कठिनाई से छूटकर (भावी तीर्थंकर) वह नारकी जीव शान्ति की इच्छा से एक वृक्ष (सेमर वृक्ष) के नीचे गया, किन्तु तुरन्त ही ऊपर से तीक्ष्ण असिधारा पत्ते उस पर पड़ने लगे, और उसके हाथ-पैर आदि सर्व अंग कटकर छिन्न-भिन्न होकर इधर-उधर बिखर गये। 

अरे रे! मर जाऊँ तो यहाँ से छूटूँ, ऐसा उसे लगा; किन्तु नरक में मृत्यु भी माँगने से नहीं मिलती। 

अरे रे! पापी को शान्ति कैसी? एक क्षण मात्र कहीं चैन नहीं है। इस प्रकार भयंकर मरण वेदनाएँ सहते-सहते उस जीव ने असंख्य वर्ष बिताए। 

ऐसे नरक के तीव्र दुःख भोगकर वह अर्धचक्री का जीव इस भरतक्षेत्र के विपुलसिंह नामक पर्वत पर क्रूर परिणामी सिंह हुआ; अनन्तानुबन्धी कषायसहित रौद्रध्यान से रंजित उसका मन शान्ति रहित था। भूखा न हो, तब भी बिना कारण वह अनेक निर्दोष जीवों का घात कर देता था। इस प्रकार जिसके रौद्र भावों का प्रवाह कभी रुका नहीं है, ऐसा वह निर्दय सिंह वहाँ से मरकर पुनः नरक में गया और फिर असंख्य वर्षों तक वहाँ के तीव्र-असह्य दुःख उसने भोगे। उन दुःखों का कथन कैसे हो? और कैसे सहा जाए? वह तो भोगनेवाला ही भोगे और भगवान ही जाने।

ऐसे मिथ्यात्व-कषाय के दुःखों से अब बस होओ!.... बस होओ!...... जिनका वेदन अब इस जीव को तो कभी नहीं करना है, परन्तु जिन दुःखों का वर्णन पढ़ते-लिखते हुए भी कंपकंपी आ जाती है। वे दुःख महावीर के जीव ने अज्ञानवश अन्तिम बार भोग लिये। बस! अब फिर कभी वह जीव ऐसे दुःख में नहीं पड़ेगा। नरक तो यह उसकी अन्तिम पर्याय है; अब नरक को तिलांजलि देकर वहाँ से बाहर निकल कर वह पुनः सिंह हुआ। उसकी यह सिंह पर्याय (और तिर्यंच पर्याय भी) अन्तिम है; अब फिर वह जीव कभी तिर्यंचगति में भी अवतारित नहीं होगा।

इस प्रकार महावीर के जीव ने नरक और तिर्यंच इन दोनों गतियों में परिभ्रमण करने का अन्त तो किया। अब शेष रहे देव और मनुष्य पर्यायों का भी अन्त करके वह जीव अपूर्व सिद्धपद की साधना किस प्रकार करता है - उसकी सरस आनन्ददायक कथा अब प्रारम्भ होगी। अभी तक तो वह जीव अज्ञान एवं कषायवश संसार में कहाँ-कहाँ भटका और कैसे-कैसे दुःख भोगे, उसकी कथा थी - बंधन की कथा थी, परन्तु अब वह जीव किस प्रकार धर्म प्राप्त करता है, आराधक बनकर सुन्दर आनन्ददायक धर्मकथा पढ़कर हमें भी प्रसन्नता होगी। दुःख में तो ग्लानि होती ही है, परन्तु दुःख की कथा पढ़कर भी जीव थक जाता है। महावीर के जीव की दुःखद कथा का अन्त हुआ; अब उसकी सुखद कथा का प्रारम्भ करते हैं।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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