मेरी भावना (45) सर्वहित की भावना
मेरी भावना (45) सर्वहित की भावना
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाए
ये मेरी भावना की लगभग अंतिम लाइनें हैं। आप यही भावना भाएं।
ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।।
रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे।
परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे।।
वृष्टि का अर्थ है - वर्षा। वर्षा समय पर होने का नाम सुभिक्ष कहलाता है और वर्षा समय पर न हो, असमय में हो तो दुर्भिक्ष कहलाता है। ज्यादा हो जाए तो उसको बोलते हैं अतिवृष्टि और बिल्कुल न हो तो उसको बोलते हैं अनावृष्टि। ये दोनों ही प्रकार की वृष्टियां अकाल का सूचक हैं, अच्छे समय का सूचक नहीं है। अकाल का मतलब है कि बुरा समय चल रहा है, समय खराब आ गया है। तो आप देखते हैं कि कहीं पर वृष्टि इतनी हो रही है कि लोग डूब रहे हैं, मकान के मकान डूब रहे हैं, दुकान की दुकान नष्ट हो रही हैं। लोग मर भी रहे हैं। वहाँ इतने पानी की ज़रूरत नहीं है, फिर भी वर्षा हो रही है। इसको बोलते हैं अतिवृष्टि।
कुछ ऐसे इलाके हैं, जहाँ बिल्कुल भी वर्षा नहीं होती। पूरा सूखा पड़ा है। कोई फसल नहीं हो रही। पानी नहीं है। बहुत गहराई तक खोदने पर भी पानी नहीं निकलता। वहाँ के लोग पानी के लिए परेशान हैं। कहीं दूर किलोमीटरों तक जाकर दो घड़े पानी लेकर आते हैं, तब अपना काम चलाते हैं। ये अनावृष्टि के स्थान हैं, जहाँ लोग पानी के लिए तरस रहे हैं।
भगवान से यह प्रार्थना मत किया करो कि भगवान वर्षा दे दो, पानी बरसा दो। भगवान की प्रार्थना से न बारिश होती है, न बारिश रुकती है। बारिश का होना और नहीं होना, यह उस स्थान के जीवों के पुण्य और पाप पर निर्भर करता है। जिस स्थान पर रहने वाले लोग धार्मिक होंगे, सद् प्रवृत्ति के होंगे, वहां पर सहज में, सही वर्षा सही समय पर होती है और जहां पर लोग तरह-तरह के असंयम, मांसाहार, दुराचार में लिप्त होते हैं, वहां पर ये वर्षाएं समय पर होती ही नहीं। तो यह सब स्थानीय लोगों के पुण्य और पाप कर्म का ही फल जानना चाहिए।
इसलिए हमेशा संयम भाव को, धर्म भाव को मानना चाहिए और संयम के माध्यम से अपने अंदर इस धर्म की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाना चाहिए, तभी आप दूसरों के लिए, राष्ट्र और पूरे विश्व के लिए कोई अच्छी भावना कर सकोगे। तो यह भावना क्या है कि कभी भी इस संसार में ऐसी अनावृष्टि न हो और अति वृष्टि न हो। कहीं पर दुर्भिक्ष न पड़े, कहीं पर अकाल न हो, कहीं पर ईति की भीति न हो, कहीं पर मारी आदि ये रोग न फैलें। जैसे हैजा, प्लेग, चिकिनगुनिया आदि ऐसी महामारियाँ होती हैं, जो किसी को भी लग सकती हैं। ये सब इसी तरीके के आतंकों में, आपदाओं में आती हैं और ये समय-समय पर आती ही रहती हैं।
हर साल आप देखते ही हो, नए-नए तूफानों के नाम सुनने को मिल जाते हैं। सुनामी तो बहुत पुरानी हो गई, अब तो कोई चीन से आ रहा है और कोई अफगानिस्तान से आ रहा है। हर साल दो-तीन नए नाम मिल ही जाते हैं। ये सब आपदाएं हैं और इन आपदाओं का सबसे बड़ा कारण है हमारे अच्छे भावों की कमी होना। जहाँ पर लोग बहुतायत में अच्छे भाव रखेंगे, वहाँ पर इन आपदाओं से बचा जा सकता है।
लोग पूछते रहते हैं कि महाराज! कारोना कब जाएगा? क्या करें इसके लिए? तो आप जहां भी हैं, सबके लिए भावना अच्छी करें। मेरी भावना की तरह भावना करें। ये जो आज लाइनें आई हैं, ये एक तरह से इस मेरी भावना की अंतिम लाइनें हैं कि
ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।।
धरती भी अच्छी बनी रहे और प्रजा का पालन करने वाला राजा भी धर्मनिष्ठ बना रहे। आजकल लोकतंत्र तो चल रहा है लेकिन इस लोकतंत्र में भी देखा जाए, तो प्रधानमंत्री को ही देश का राजा कहा जाता है। एक लोकतंत्र होता है और एक राजतंत्र होता है। राजतंत्र में तो राजा का शासन होता ही है पर लोकतंत्र में भी जिसको हमने वोट देकर प्रधानमंत्री बना दिया है, दिल्ली की राजधानी में सिंहासन पर बैठा दिया है, वही हमारा राजा है। अगर वे अच्छा निर्णय लेंगे, तो प्रजा का हित होगा और वे कहीं न कहीं किसी भी तरीके का स्वार्थ रखेंगे, तो प्रजा का अहित होगा। इसलिए यह भी भावना की जाती है कि राजा हमेशा धर्मनिष्ठ रहे। धर्मनिष्ठ का मतलब है कि वह न्याय और नीति से चलने वाला हो। पाप और अनीति के कार्यों पर रोक लगाने वाला हो। उनको बढ़ावा देने वाला न हो। बहुत से राजा ऐसे भी होते हैं जो इन पाप के कार्यों को बढ़ावा देते हैं और किन्हीं किन्हीं के शासनकाल में ये पाप कार्य रुक जाते हैं, कम हो जाते हैं। इसी को बोलते हैं धर्मनिष्ठ राजा। धर्म का मतलब यहां पर इतना ही है कि जो नीति न्याय से चले, सदाचार की वृद्धि करे, दुराचार को रोके; वही नीति न्याय से युक्त धर्म निष्ठ राजा है।
लोग बताते हैं यहां पर कि यह मुजफ्फरनगर बहुत बड़ी क्राइम सिटी के रूप में पहले जाना जाता था। बड़ी-बड़ी फिल्में बन चुकी मुजफ्फरनगर के डाकुओं के ऊपर। कितने ऐसे डाकू हैं, कितने दहशतगर्द लोग हैं, जो रोजाना 1-2-4 तो कहीं न कहीं एनकाउंटर में मारे ही जाते हैं और कुछ आत्मसमर्पण भी कर रहे हैं, पकड़े जा रहे हैं लेकिन फिर भी इस दहशतगर्दी की कमी नहीं है। तो यह धर्म निष्ठ राजा के बस की ही बात होती है। इसलिए एक धार्मिक व्यक्ति भी हमेशा यही भावना करता है कि यहां का राजा धार्मिक हो, धर्मनिष्ठ हो। यह भावना जरूर करनी चाहिए। धर्म निष्ठ का मतलब मंदिर जाने वाला हो, ऐसा नहीं है, लेकिन मंदिर जाने पर रोक लगाने वाला भी न हो। ऐसा धर्म निष्ठ राजा होना चाहिए। भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वाला नहीं होना चाहिए। जब राजा के अंदर इस प्रकार की भावना होगी, तभी प्रजा चैन के साथ, सदाचार के साथ अपना जीवन निर्वाह कर सकेगी। आज हमारा सबसे बड़ा राजा प्रधानमंत्री है और सब यह भावना करो कि
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।।
राजा कभी अन्याय न करे। राजा जैसे अभी धर्मनिष्ठ दिखाई दे रहा है, वैसा ही रहे। धर्मनिष्ठ बना रहेगा तो कुर्सी बनी रहेगी और जब धर्मनिष्ठपना छूट जाता है, तो कुर्सी भी छूट जाती है। अगर व्यक्ति न्याय-नीति के साथ चलता है, तो उसे बार-बार मौके भी मिलते रहते हैं। एक बार राजा बनने का मौका केवल 5 साल के लिए ही होता है। यदि इस प्रकार न्याय-नीति की भावना बढ़ रही है, तो उसे बार-बार मौके भी मिलते रहते हैं। प्रजा तो यही चाहती है कि इनके शासनकाल में अपने को सुख-सुकून था, तो आगे भी बना रहे। जहाँ अराजकता, आतंक और दुराचार फैलने लगे, तो प्रजा भी उससे त्रस्त हो जाती है और उन राजाओं का भी बहिष्कार कर देती है। इसलिए यह भी भावना करो कि राजा हमेशा धर्मनिष्ठ रहे। दुर्भिक्ष आदि कभी न फैलें। इसी का नाम है - अहिंसा धर्म।
परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे।।
जब परम ‘अहिंसा धर्म’ जगत में फैलेगा, तो सर्वहित अर्थात् सब का हित भी होगा।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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