मेरी भावना (47) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से
मेरी भावना (47) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
बोलिए मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की जय!!!
प्रश्न (दीप शिखा जी जैन, जींद, हरियाणा) - नमोस्तु महाराज श्री! वायरस तो चीन से आया उनके पाप कर्म से, लेकिन उसका भुगतान सारी दुनिया कर रही है। तो मेरी जिज्ञासा है कि क्या उनके पाप का समर्थन हमने भी किया था?
उत्तर - अवश्य किया था। 100% किया था और आज भी कर रहे हैं। जो लोग Globalization का समर्थन करते हैं, वैश्विक व्यापार का, जिसमें खाना पीना, कहीं भी किसी देश का आ रहा है, किसी भी देश का कहीं जा रहा है, तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान तो हमारा होता है। क्यों होता है? हम अपना शुद्ध भोजन वहां पहुंचाते हैं। उनके यहां कहीं पर भी गेहूं, चावल आदि नहीं होते हैं। हम दूसरे देशों में गेहूं, चावल, दालें पहुंचा रहे हैं और वहां का जो मांसाहार है, उसको हम अपने देश में ला रहे हैं। इस Globalization से सबसे बड़ा नुकसान अपन लोगों को होता है। तो हम भी उसके भागीदार हैं। तभी तो यह चाइनीज़ फूड, दुनिया के व्यंजन, ये सब इस दुनिया में चल रहे हैं और हर जगह पर जगह-जगह उनकी दुकान खुली हुई हैं। तो जब हम इन सब चीजों को खरीद रहे हैं, खा रहे हैं तो हम सब भी इसमें भागीदार हैं और उसी का फल आज हम लोग भी भोग रहे हैं।
प्रश्न (विजेता जी जैन, कियावत, मंदसौर) - नमोस्तु महाराज श्री! आपके श्रीमुख के वचन हमारे जीवन प्रेरक होते हैं, किंतु ये जब विचार हम अपने मित्रों को एवं समाज को अवगत कराते हैं, तो वे सहमत नहीं होते तो इसके लिए क्या करें?
उत्तर - कोई बात नहीं। किसी का सहमत हो जाना इस बात के लिए जरूरी नहीं है कि आप भी उसको सहमत कर रहे हो। सबसे ज़रूरी चीज है कि अगर हम सहमत हो रहे हैं तो वह हमारे लिए हितकारी है। जो सहमत नहीं हो रहा है, तो कोई बात नहीं और दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ, ऐसे कोई उपदेश नहीं हुए, जिनसे दुनिया के सब लोग एक साथ सहमत हो जाएं। दुनिया की सहमति की चिंता अपने को न थी, न है और न आपको करनी चाहिए। आप तो बस! अपनी सहमति बनाओ कि हम अगर इस बात से सहमत हैं तो इस सहमति को दूसरों को बताएं और बताने के बाद भी ज़रूरी नहीं कि वे सब सहमत हो जाएं। जितने हो जाए वह आपके लिए अच्छा है। नहीं हो जाएं, तो आपको बिल्कुल भी क्लेश उठाने की कोई जरूरत नहीं है। दूसरों की असहमति की बात तो दूर है, अपने ही घर का आदमी अपने से सहमत नहीं होता। अपना बेटा ही अपने से सहमत नहीं होता। अपने ही सहमत नहीं होते तो हम दूसरों को क्या सहमत करने जाएंगे? यह तो कोई आज का Matter है ही नहीं। किसी का दिमाग किस तरीके से चलता है, कोई किस तरीके के परिवेश में पलता है? किसी की किस तरीके से शिक्षा हुई है? यह सब बातों पर Depend करता है कि वह किस तरीके का Attitude बना कर रखता है? तो सहमति सबकी हो पाना कभी भी नहीं होता। हम अगर 10 लोगों में से एक या दो लोगों को भी सहमत कर पाए, तो हमें इस Proportion में भी अपने को Satisfied रखना चाहिए।
प्रश्न (चेलना जी जैन, हजारीबाग) - नमोस्तु महाराज श्री! मदर टैरेसा का जो सेवा भाव था, क्या वह सम्यक् दर्शन के वात्सल्य अंग की कोटि में आएगा?
उत्तर - ऐसा है कि सम्यक् दर्शन अलग चीज है और सेवा भाव अलग चीज है। हम यह समझें कि एक तो वृक्ष है और एक उसकी कुछ शाखाएं हैं। अब हमने क्या किया कि वृक्ष को तो उत्पन्न किया नहीं, हम केवल उसकी शाखा के एक-एक किसी न किसी फल से हम अपने आप को लाभान्वित किए हैं। तो उसी तरीके से सम्यक् दर्शन एक बहुत बड़ी चीज है। उसकी कई शाखाएं हैं। वात्सल्य है, सेवा है, निःशंकित है, निकांक्षित है। उनमें से हमने एक क्वालिटी पकड़ ली तो क्या हो गया? कोई सेवा को धर्म मानने लगा, किसी ने प्रेम... प्रेम... प्रेम... को बढ़ावा दिया। जैसे ओशो प्रेम... प्रेम.. में ही लगा रहता है और प्रेम को ही धर्म मानने लगा। अब यह मदर टैरेसा है, जो सेवा सेवा में लगी रहती है। तो ये सब सम्यक् दर्शन के Components हैं। लेकिन ये कहीं पर भी Complete लोग नहीं हैं। क्योंकि इन्हें आठों अंगों का ज्ञान नहीं है, केवल एक ही अंग का ज्ञान है। तो एक अंग से ही जब इतना अच्छी तरह भला कर सकते हैं, तो आप समझो कि आठों अंगों का पालन करोगे, तो आप उनसे कितनों का और कितना भला कर सकोगे। यह सोचने की ज़रूरत है तो इसलिए उस मदर टैरेसा के काम को हम अच्छा तो कहेंगे, मगर उसको हम सम्यक् दर्शन से नहीं जोड़ सकते। सम्यक् दर्शन अलग चीज है और यह सेवा भाव उसके अच्छे कार्य हैं, इतना कहा जा सकेगा।
प्रश्न (अजय जी जैन, एडवोकेट दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! कर्म के उदय से ही विपरीत परिस्थिति आती है, तो उस परिस्थिति में ज्यादातर लोग उलझ जाते हैं और कर्म सिद्धांत को भूल जाते हैं। तो ऐसा हम क्या करें कि विपरीत स्थिति में भी हम वह सिद्धांत याद रखें।
उत्तर - सब से अच्छा यह होता है कि जब भी आप के लिए कोई कर्मों की विपरीत स्थितियों का फल देखने को मिले, आप अपने मन को कहीं न कहीं समभाव के साथ जोड़ने की कोशिश करें और समभाव के साथ जोडते हुए आप किन्हीं भी तीर्थंकर की भक्ति में अपना मन लगाएं। अगर आप भक्ति में मन लगाएंगे, तो भक्ति से हमारे अंदर उस कर्म को जल्दी से समाप्त करने की शक्ति आ जाती है। अगर हमने भक्ति में अपना मन लगाया तो! तो जिस समय पर विपरीत परिस्थिति आए, उस समय पर हम अपना मन भगवान की भक्ति में लगाएं और भगवान की भक्ति में मन लगा करके उस कर्म के फल से अपने आप को निवारने के लिए पूरा का पूरा सामर्थ्य पैदा करें। यही एक उपाय रहता है।
प्रश्न (विभा जी जैन, रामप्रस्थ, गाजियाबाद ) - नमोस्तु महाराज श्री! अगर हम हर समय इसी डर में रहेंगे कि अकाल न पड़ जाए, तो फिर एक संचय की प्रवृत्ति हमारे अंदर बन जाएगी। परिग्रह जोड़ने में हम सभी लग जाएंगे तो इसे कैसे संतुलित करें?
उत्तर - अकाल तो सामूहिक पाप कर्म के उदय से होने वाली आपदा है। संचय उतना ही करना चाहिए कि जिससे हमारा समय पर उपयोग होता रहे, काम चलता रहे। हम कितना भी संचय करेंगे तो भी अगर कभी अकाल की स्थिति आएगी, तो संचय तो कभी काम नहीं आएगा। आपके पास कोई भी संचय होगा, तो वह एक या दो वर्ष से ज्यादा चलने वाला नहीं है। इतने बड़े तो घर ही नहीं होते कि इससे ज़्यादा आप संचय कर सको। यह संचय तो काम चलाने वाला ही कहलाता है। जो आजकल लोग वर्ष में एक बार अनाज का संचय करते हैं, ये सब तो अपनी ज़रूरत की चीज़ें हैं। इसे हम परिग्रह नहीं कह सकते हैं। परिग्रह तो वह होता है कि जो अनावश्यक है और उसका कोई उपयोग भी नहीं है। जहां पर लोगों के कारखाने भरे पड़े हैं और उसके बाहर लोग भूख और ठंड से मर रहे हैं। उसी कारखाने में अनाज सड़ रहा है। इसको बोलते हैं संचय या परिग्रह। यह पाप होता है। इस तरह की स्थिति न बने, ऐसा ध्यान में रखना चाहिए।
प्रश्न (अनीता जैन, जबलपुर) - नमोस्तु महाराज श्री! हमारा अगला भव भी संयम के साथ रहे, इसके लिए हमें कैसी भावना भानी चाहिए?
उत्तर - जिस तरह की भावना हम वर्तमान में करते हैं और उसी तरह की भावना करते करते हम मृत्यु के समय पर भी दृढ़ता ले आते हैं, उसी भावना के फल से मृत्यु के उपरांत हमारी उस भावना की पूर्ति होती है। यह नियम है। अगर आपमें संयम की भावना है, तो संयम की भावना अभी भी करो, जिस समय पर कोई दुःख या संकट आए, उस समय पर भी संयम की भावना करो और इस तरह करते करते जब हमारे जीवन का अंत समय आए, तब भी हम यह भावना रखें कि हमारे अन्दर संयम के भाव अंत समय पर बना रहे। अगर हम इतना कर पाए, तो अगले जन्म में भी हमें संयम बहुत आसानी से मिलेगा।
प्रश्न (शैलेन्द्र शाह, उज्जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! अगर राजा धर्मनिष्ठ होकर भी प्रजा के साथ न्याय नहीं कर पाए, तो क्या करें?
उत्तर - नहीं! दोनों चीज़ें विपरीत कैसे होंगी? धर्मनिष्ठ होगा, तो न्याय करेगा। इसीलिए तो बताया है कि जो धर्मनिष्ठ होगा, वह न्याय नीति से चलने वाला होगा। ऐसा तो नहीं है कि वह केवल मंदिर जा रहा हो, पूजा-पाठ में ही लगा रहता हो। इसका नाम धर्मनिष्ठ नहीं है। धर्मनिष्ठ का मतलब ही यही है कि जो न्याय नीति से प्रजा का पालन करने वाला हो।
प्रश्न (संजय जैन, गोटेगांव) - नमोस्तु महाराज श्री! कल की चिंता में हम आज का आनन्द नहीं ले पाते। इससे बचने के लिए हम क्या करें? हम जानते तो हैं, पर जब समय आता है, तो हम भूल जाते हैं।
उत्तर - इसीलिए समय समय पर इस तरह के उपदेशों को सुनते रहना चाहिए। हम जानते तो हैं, पर हमें भी एक Reminder चाहिए होता है। ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जो हमारे Mind में न हो, लेकिन फिर भी वह Mind में Remind होती नहीं है। तो हमारे सामने एक न एक कोई Tool ऐसा होना चाहिए जो हमें Remind कराता रहे। ये वही बातें हैं, जो समय समय पर आपको संतों के उपदेश मिलते हैं, समय समय पर आपको अलग तरीके की Classes मिलती हैं, अगर इनमें कोई भी चीज आपको अच्छी लगे, तो आप उसे अपने जीवन का एक हिस्सा बनाएं और उसे अपनी आदत में ढालें कि अगर हमारे सामने ऐसा होता है तो हम उसकी पहले से Planning करें कि आज अगर हमने कोई भी चीज की गलती की है, तो अगर हम कल पछता रहे हैं, तो आगे हम ध्यान रखें कि आगे हम इस तरीके की गलती नहीं करेंगे। उससे पहले ही हम इस तरह के उपदेशों को सुनेंगे। अपने mind को Reminder बनाकर के इस तरह से उपयोग में लेंगे और हम कोई भी गलती करने से पहले अपने आप को सचेत रखेंगे। यह हमारे मन के अंदर का संकल्प होना चाहिए और इस तरह के उपदेश या कोई भी ऐसी Books जो आपको Motivation देती हो, वह आपको हमेशा अपने पास में रखना चाहिए और उसका बार-बार उपयोग करना चाहिए।
प्रश्न (काव्या जैन, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! क्या तीर्थंकर दीक्षा के बाद केवल एक ही बार आहार लेते थे?
उत्तर - ऐसा तो नहीं है। तीर्थंकर दीक्षा के बाद कई बार भी आहार लेते हैं और एक जीता जागता उदाहरण तो आपको वर्धमान तीर्थंकर का मिल ही सकता है, क्योंकि जिन वर्धमान भगवान की पहली पारणा तो पहले सेठ जी या राजा के यहां हुई होगी और फिर एक बार चंदन बाला के यहां तो हुई ही है। तो दो बार हुई है। कम से कम इतना उदाहरण तो अपने पास है ही। इसलिए इतना तो नहीं कह सकते कि तीर्थंकर एक ही बार आहार लेते हैं। इतना प्रमाण तो अपने पास है ही।
प्रश्न (स्मृति जैन जी, लखनादौन) - नमोस्तु महाराज श्री! परंपरा और संस्कृति में क्या अंतर है?
उत्तर - संस्कृति एक ऐसी चीज है, जो हमारे जीवन के उत्थान में काम आने वाली चीज है। संस्कृति के अनुसार यदि हम चलते हैं तो हम लंबे समय तक अपना जीवन उन्नत बनाए रख सकते हैं। परंपराएं तो किसी भी तरह की हो सकती हैं। अच्छी भी परंपराएं हो सकती हैं और बुरी भी परंपराएं हो सकती हैं। तो परंपराओं में धर्म नहीं होता। परंपराओं में कोई ज्यादा हमारी उन्नति नहीं होती। उन्नति होती है संस्कृति के अनुसार चलने से क्योंकि संस्कृति का मतलब ही है कि यह हमारे लिए बहुत ही आवश्यक घटक है, जिसका पालन करने पर हमें बहुत प्रकार की आपत्तियों से बचाव हो जाता है। उसका नाम संस्कृति है और परंपराएं वे होती हैं जिनसे हमें फायदा कम होता है। केवल उन्हें ढोना पड़ता है कि भाई! पहले से होता आया है, इसलिए हमें करना है। अगर हम उससे पूछें कि हमें इससे फायदा क्या मिल रहा है, तो फायदा कुछ नहीं दिखाई देता। उसको हम बोलते हैं - परम्परा। लेकिन संस्कुति की कोई भी चीज़ होगी तो उससे आपको फायदा ज़रूर दिखाई देगा। यह हमारे लिए संस्कृति कहलाती है। तो परंपरा और संस्कृति में यह बहुत बड़ा अंतर समझ कर रखना चाहिए।
प्रश्न (संकेत जी, नागपुर) - नमोस्तु महाराज श्री! ऑफिस में कटु वचन बोलने पड़ते हैं। इससे कैसे बच सकते हैं?
उत्तर - देखो! अगर आपको यह पता है कि बोलने पड़ते हैं, तो इसका मतलब है कि आप बोलना नहीं चाहते हैं लेकिन आपको बोलना पड़ता है। बहुत से लोग तो ऐसे हैं कि उनके बोलने में कटु वचन ही आते हैं। और कुछ बोलने में आता ही नहीं है। सोचता तो उनको है। चिंता का विषय तो उनके लिए है। जिन लोगों को यह पता है कि कटु वचन हमें बोलने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि वे समझदारी से काम ले रहे हैं और वे यह सोच रहे हैं कि अगर हम इस तरह का कटु वचन बोलेंगे, तो हमारा काम बन जाएगा, तो इसका मतलब यह भी है कि सामने वाले के हित के लिए भी कटु वचन बोला जा सकता है, अगर आप यह सोच करके बोल रहे हो। जैसे माता-पिता अपने बेटे से कटु वचन बोल सकता है कभी भी, क्योंकि एक बार अगर उसको कटु वचन बोलेंगे, उसे डाटेंगे तो वह हमेशा के लिए वैसा गलत काम करना बंद कर देगा, जैसा उसने पहले किया था। यह उसका हित कहलाया। अगर उस कटु वचन में हित हो रहा हो, तो वह कटु वचन भी जायज है। बशर्ते कि यह हमारी आदत नहीं होनी चाहिए कि ऑफिस में जब भी बोलें तो लोग कहें कि यह बॉस तो जब भी बोलता है, कटु वचन ही बोलता है। कभी-कभी बोलोगे, तो लोग कहेंगे कि आज तो बॉस ने बहुत दिनों के बाद गुस्से में बोला है। हमें देखना तो चाहिए कि आज ऐसा क्या हो गया? तो आदमी उस बात पर ध्यान देता है। अगर आप उसको अपनी नेचर में ले आते हो, तो वह बहुत डेंजरस हो जाता है। वह बात ध्यान में रखने की है।
प्रश्न (सीमा जैन) - नमोस्तु महाराज श्री! अति वर्षा और कम वर्षा से पूरा गांव प्रभावित होता है, तो क्या सबका पुण्य पाप एक साथ होता है?
उत्तर - होता है। बिना पुण्य पाप के कभी भी हमें इन आपदाओं से मिलने वाला जो दुःख या सुख है, वह नहीं मिल सकता। अगर किसी गाँव में कोई भी अतिवृष्टि या अनावृष्टि हुई है तो उस गाँव में जितने भी लोग हैं, तो आप यह मत समझना कि उस गाँव के सभी लोग तहस नहस हो जाते हैं। सारा गाँव कभी नष्ट नहीं होता। उसमें से भी कुछ लोग बच जाते हैं। कुछ उन का पिछला किया हुआ पुण्य कर्म आगे आ गया और वे बच गए। बाकी लोगों के पास ऐसा कोई पुण्य कर्म नहीं था, इसलिए वे उसमें बह गए। तो हमेशा यह ध्यान रखना कि व्यक्ति को अपने पुण्य या पाप कर्म ही इस तरह से किए हुए होते हैं, जो इस तरह की आपदाओं में दुःख या सुख का सामना करना पड़ता है।
परम पूज्य मूनिवर श्री प्रणम्य सागर महाराज की जय!!
आज ‘मेरी भावना’ का विषय पूरा हुआ। हमने मेरी भावना को अपनी भावना बनाने का पाठ सीखा।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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विनम्र निवेदन
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