मेरी भावना (46) सब दुःख संकट सहने की कला

  मेरी भावना (46) सब दुःख संकट सहने की कला

(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)

आदिनाथ भगवान की जय 

मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं

अंत में एक और भावना की गई है - 

फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।

अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहीं, कोई मुख से कहा करे।। 

बन कर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नतिरत रहा करे।

वस्तु स्वरूप विचार ख़ुशी से, सब दुःख संकट सहा करे।।

इस ‘मेरी भावना’ को बनाने वाले जो कवि हैं, वे केवल कवि ही नहीं, एक अच्छे साहित्यकार थे और जैन दर्शन के प्रति और सभी दर्शनों के प्रति उदार भावना रखने वाले अच्छे व्यक्ति थे। उनके आगे उपाधि लगती थी ‘युगवीर’ की। तो यही उन्होंने इसमें ‘युगवीर’ लिखा है कि आप अपने इस समय के युग के वीर बन कर देश की उन्नति के काम करो, जिससे देश में उन्नति हो। लेकिन पहले यह भावना रखो कि देशोन्नतिरत तो रहा करें, लेकिन सबसे पहले सबके मन में प्रेम भाव रहे। प्रेम भाव होते हुए भी मोह नहीं होना चाहिए। प्रेम में और मोह में अंतर होता है। 

जैसे मान लो कि हमारे सामने यह Book रखी हुई है। प्रेम का मतलब यह है कि इस Book को संभाल कर रखो, आदर से उठाओ, आदर से व्यवस्थित करके रखो। यह खराब नहीं होनी चाहिए। यह हो गया प्रेम भाव और मोह भाव क्या हो गया कि इसे मेरे अलावा कोई छू नहीं सकता। अगर यह मिलेगी तो ही जीवित रहूंगा, नहीं तो मर जाऊंगा। यह मोह भाव हो गया। प्रेम भाव का मतलब है कि सब जीएं और सबको जीने दें। इसका नाम है प्रेम भाव। सब जियो और सब खुश रहो। तुम भी खुश रहो और हम भी ख़ुश रहें। मोह भाव क्या हो गया? नहीं! हम तो तुम्हारे ही साथ खुश रहेंगे। 

हमें सबके साथ खुश  रहना है। एक के साथ तो मोह होता है और सबके साथ प्रेम होता है। यह प्रेम की और मोह की सबसे अच्छी Definition है। अपने मन में सब के लिए यही भावना रखो कि हमारा सबसे प्रेम भाव है, लेकिन किसी से कोई मोह भाव नहीं है। मोह का मतलब है कि मोहित हो जाना। न तो किसी को मोहित करें और न किसी के ऊपर मोहित हों, लेकिन फिर भी सबके प्रति प्रेम भाव रखें। सब सुखी रहें, सब खुश रहें, सबका जीवन आनंदमय हो और हमारा भी हो। सब जीवों पर परस्पर प्रेम भाव रहे और 

अप्रिय कटुक कठोर शब्द, नहीं कोई मुख से कहा करे।

बस! यह बात सबसे कठिन है। आज के बच्चे अगर इस बात पर अमल कर लें, तो बहुत सा लड़ाई झगड़ा बच जाए। अप्रिय वचन बोलना, दूसरे के साथ गाली गलोज करना, कठोर वचन बोलना; यह सब आज के बच्चों का फैशन बन गया है। अब आजकल बोलना तो होता नहीं है। Message के Through ही Chatting होती है। इस Chatting के Through भी हम बहुत कठोर वचन, कड़वी बातें, अपशब्द, निंदा की बातें, गलत बातें आगे बढ़ाते रहते हैं, तो यह भी हमारा इसी भावना में आने वाला है कि जो हम बोल रहे हैं या हम उसको आगे Forward कर रहे हैं, वे सब भी अप्रिय, कटुक, कठोर शब्द हैं। अगर कोई ऐसी अप्रिय बात है जो दूसरों को अच्छी नहीं लग रही है, तो हमें उसको वहीं पर Stop करना है। अगर हमारे पास कहीं से Message आया भी है, तो हमें उसको आगे Forward नहीं करना है। इस तरह की प्रवृत्तियाँ हमारे लिए भी सुखकारी होती हैं और दूसरों के लिए भी हितकारी होती हैं। यह किसी को परेशान करने का बहुत गंदा तरीका चल पड़ा है। एक Message छोड़ दो और वह Message छोटे से तिल का ताड़ बना देता है।

एक Message एक ग्रुप में जाता है तो एक व्यक्ति के पास तो जाता नहीं। एक Second में हज़ारों लोगों के पास एक Message पहुँच जाता है। अगर अच्छे के लिए Use करो, तो यह बात अच्छी भी है, लेकिन गंदी इसलिए है कि अगर हमें किसी को परेशान करना है तो आजकल लोग इसी तरह से लोगों को छोटी-छोटी बातों पर परेशान कर देते हैं। आजकल बच्चे इन कामों से भी सावधान रहें। 

अगर हम देश की, समाज की, धर्म की उन्नति में अपना मन लगा कर आगे बढ़ेंगे, तो हमारी भी उन्नति होगी और तभी हम ‘युगवीर’ बनेंगे। यह उपाधि पंडित जुगलकिशोर शास्त्री जी को मिली थी, क्योंकि उन्होंने धर्म को, समाज को आगे बढ़ाने के लिए अच्छे-अच्छे कार्य किए थे। इसलिए ‘मेरी भावना’ की यह अंतिम लाइन बहुत अच्छी है -  

वस्तु स्वरूप विचार ख़ुशी से, सब दुःख संकट सहा करे।।

वस्तु स्वरूप का मतलब है कि जिसको जैसा दुःख-सुख मिल रहा है, वह उसको उसके अपने कर्म के फल से मिल रहा है। इसको बोलते हैं- वस्तु स्वरूप। किसी के पास कुछ है, किसी के पास कुछ नहीं है, किसी को किसी का अभाव खटकता है, किसी को किसी की कमी खटकती है। अगर हम वस्तु स्वरूप को जानते हैं, तो यह समझ में आ जाएगा कि ये सभी पूर्व जन्म के कर्म हैं, जिनके कारण से हमें कुछ मिला और कुछ नहीं मिला। हर किसी के जीवन में एक न एक कमी तो मिलेगी ही। उस कमी की पूर्ति कभी नहीं हो सकती क्योंकि हर व्यक्ति कोई न कोई कमी लेकर ही पैदा होता है। यही हर वस्तु का, इस संसार का स्वरूप है।

हमें सारे सुख नहीं मिलेंगे। अगर कोई दुःख भी मिलता है, तो हम जान लेंगे कि यह भी वस्तु का स्वरूप है। इसलिए सुख-दुःख में अपने कर्मों के फल को ध्यान में रखते हुए खुषी से, सब दुःख संकट सहा करे।

आपको लगेगा कि इनसे कोई हमारा दूर-दूर तक भी लेना देना नहीं था, फिर भी इनके कारण हम परेशान हो रहे हैं। अगर दुःखी होने की कोई वजह है, तो वह हमारे अपने ही कर्मों का फल है। इसलिए वस्तु स्वरूप का विचार करो और सब दुःख, संकट सहन करने के लिए अपना मन हमेशा बना कर रखो और इस ‘मेरी भावना’ को अपनी भावना बनाओ। 

यह अपनी भावना कब बनेगी? यह पढ़ने या सुनने से या समझने से नहीं बनेगी। कोशिश तो कर रहे हो, लेकिन यह मेरी भावना भी अपनी भावना तब बनेगी, जब आप इसको अर्हम ध्यान योग के साथ जोड़ोगे। 

सबसे पहले तो तन-मन स्थिर करने के लिए पांच मुद्राओं को आलंबन लो। शांत होकर बैठो और आँख बंद करके कम से कम तीन बार ‘ओऽम् अर्हम नमः’ का दीर्घ जाप करो। आज जो पढ़ा है, उसका अपने मन में स्मरण करो और अपनी भावनात्मक तरंगों को विश्व में फैलाने की कोशिश करो।

हे भगवन्! इस संसार में कहीं पर भी दुर्भिक्ष न हो, अकाल न हो, महामारी न हो। कोई भी इस महामारी से पीड़ित न हो, राजा धार्मिक हो, कहीं भी किसी भी तरह का आतंक न हो। सर्वत्र सुख हो। सबका आपस में प्रेम भाव हो। वैर, पाप, अभिमान कहीं पर भी न हो। सभी जीव वस्तु स्वरूप का विचार करते हुए, सभी प्रकार की आपत्तियाँ व संकट, दुख सब कुछ सहन कर सकें। ऐसी सबको शक्ति दो... शक्ति दो... शक्ति दो...। 

दोनों हथेलियां घिसो और अपनी आंखों पर रखो।

ओऽम् अर्हम परम शांतिः! परम शांतिः!! परम शांतिः!!!

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद


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