भगवान महावीर स्वामी (5)
अग्निमित्र ब्राह्मण और चौथे स्वर्ग में देव
दूसरे स्वर्ग से निकल कर मरीचि का जीव भरतक्षेत्र की मन्दिर नगरी में एक ब्राह्मण के घर अग्निमित्र नाम का पुत्र हुआ। उसके काले केश, जो अन्तर की मिथ्यात्व रूपी कालिमा को सूचित कर रहे थे, उसी प्रकार फरफर होते थे। युवावस्था में गृहवास छोड़कर वह पुनः संन्यासी होकर तीव्र तप करते हुए मिथ्यामार्ग का उपदेश देने लगा।
दीर्घकाल तक कुपथ का प्रवर्तन करके अन्त में मिथ्यादर्शनपूर्वक मरकर वह चौथे माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। असंख्य वर्षों तक स्वर्गलोक की विभूतियों को पुण्यफल में भोगा, परन्तु अन्त में जिस प्रकार सूखा पत्ता डाल से गिर पड़ता है, तदनुसार पुण्य सूख जाने पर वह स्वर्गलोक से मनुष्यलोक में गिर पड़ा।
भारद्वाज ब्राह्मण और पुनः चौथे स्वर्ग में
चौथे स्वर्ग से च्युत होकर वह जीव स्वस्तिमती नगरी में भारद्वाज नाम का ब्राह्मण हुआ और पुनः गतजन्म की भाँति संन्यासी होकर कुपथ में जीवन गँवाकर चौथे स्वर्ग में गया।
स्वर्गलोक की अनेक ऋद्धियाँ तथा देवांगनाओं आदि के वैभव में आसक्तिपूर्वक असंख्य वर्षों का जीवन बिता दिया, और जब आयु पूर्ण होने आई, तब उसके कल्पवृक्ष काँपने लगे, उसकी मन्दरमालाएँ मुरझाने लगीं, उसकी दृष्टि भ्रान्त होने लगी, शरीर की कान्ति निस्तेज होने लगी।
ऐसे चिह्नों से उसे विचार आने लगा कि अब स्वर्ग की यह सब विभूति छोड़कर मुझे यहाँ से जाना पड़ेगा। देवियों के विरह से वह विलाप करने लगा ।
‘अरे रे! देखो तो सही! जिसने बाह्य वस्तुओं में सुख माना, वह उनके वियोग में कैसा विह्वल होता है। अरे मूढ़! विचार कर कि असंख्य वर्षों तक जिन बाह्य विषयों के बीच रहकर उनका उपयोग करने पर भी तुझे शान्ति या तृप्ति नहीं हुई, उनमें सुख कैसा? सुख हो तो मिले न! आकुलित होकर मिथ्या प्रयत्न किसलिए करता है? अनन्तकाल तक झूरने पर भी विषयों में से कदापि सुख प्राप्त नहीं हो सकता।
जिसका आशाचक्र टूट गया है, जिसका पुण्यदीप बुझ जाने की तैयारी में है और जिसके मानसिक संताप का कोई पार नहीं है, ऐसा वह देव, मरण को निकट देखकर अत्यन्त भयभीत हुआ और हताशापूर्वक भोगों की चिन्ता में आर्त्तध्यान करने लगा कि
‘अरे रे! मैं असहाय रूप से यह सब छोड़कर मर जाऊँगा? मैं अब किसकी शरण लूँ? कहाँ जाऊँ? किस प्रकार इन भोगों की रक्षा करूँ? कौन उपाय करके मृत्यु को रोकूँ? यहाँ से मरकर मैं न जाने किस गति में जाऊँगा?..... वहाँ मेरा क्या होगा?..... कौन साथ देगा? वास्तव में पुण्य समाप्त होने पर कोई साथ नहीं देता। देवांगनाएँ देखती रहीं और देव के प्राण छूट गये......।
इस प्रकार विलाप करता हुआ वह देव क्षीण पुण्य से मृत्यु लोक में आ पड़ा और अनेक भवों में भटकता फिरा।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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