भक्तामर : अंतस्तल का स्पर्श (श्लोक 15 - अविचल वीतरागता)

भक्तामर : अंतस्तल का स्पर्श

श्लोक 15. अविचल वीतरागता

चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांग-नाभिर्

नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् ।

कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन,

किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित् ।।15।।

चित्रं किम् - आश्चर्य ही क्या है

अत्र - इस विषय में

यदि ते - यदि आपका

त्रिदशांग-नाभिः - देवांगनाओं के द्वारा

नीतम् - लाया जा सका

मनाक् अपि - थोड़ा भी

मनः न - मन नहीं

विकार-मार्गम् - विकार के मार्ग पर

कल्पान्त-काल-मरुता - प्रलयकाल की पवन के द्वारा

चलिताचलेन - पहाड़ों को हिला देने वाली

किम् - क्या

मन्दराद्रि-शिखरं - मेरु पर्वत का शिखर

चलितं कदाचित् - हिलाया गया है कभी

आचार्य मानतुंग स्तुति के क्रम में भगवान की अविचल वीतरागता और धैर्य की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि हे प्रभो! आपने राग को जीत लिया है। आप वीतरागी बन गए हो। अब कोई भी परिस्थिति आपको विचलित नहीं कर सकती। देवांगनाओं और सुरांगनाओं के द्वारा किए गए प्रयास भी आपके मन को विकृत नहीं बना सकते। राग-मुक्त होने के बाद कोई व्यक्ति विचलित नहीं हो सकता। इसमें कोई आश्चर्य या विचित्रता नहीं है।

राग को जीतकर ऋषभदेव की धृति अप्रकंप बन गई है। व्यक्ति में जितना अधिक धैर्य होगा, वह उतना ही अधिक शक्तिशाली होगा। मन का नियमन करने वाली बुद्धि का नाम है - धृति। विचलन और अविचलन के सन्दर्भ में अनेक परिस्थितियां कारण बनती हैं।

एक स्थिति तो यह है कि विकार का कारण उपस्थित हुआ और मनुष्य का मन विकृत हो गया। दूसरी स्थिति यह है कि विकार का कारण नहीं मिला और मनुष्य का मन विकृत नहीं हुआ। तीसरी स्थिति यह है कि विकार का कारण उपस्थित हुआ और फिर भी मनुष्य का मन विकृत नहीं हुआ। पहली दोनों स्थितियां सामान्य कही जा सकती हैं। तीसरी स्थिति में अविचल रहने वाले व्यक्ति विशेष होते हैं।

भगवान ऋषभदेव इससे भी ऊपर चौथी अवस्था में स्थित हैं। वे न केवल अविचल हैं अपितु अपनी आत्म-साधना में लीन भी हैं। उन्हें अविचल रहने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ रहा। क्योंकि उन्होंने राग का उन्मूलन कर दिया है।

उन्मूलन का अर्थ है कि राग को मूल (जड़) से ही नष्ट कर दिया है। भगवान की इस विशेषता को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हुए आचार्य कहते हैं कि हे प्रभो! हवा चाहे तेज गति से चले या धीमी गति से, आदमी को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती। धीमी गति से चलने वाली हवा प्राण-वायु का काम करती है। पर तेज, तूफानी हवा अविचल खड़े रहने वाले पेड़ों को भी जड़ से उखाड़ फेंकने की ताकत रखती है। उस तूफान से सारी पृथ्वी अस्त-व्यस्त हो जाती है। प्रलयंकारी हवा से छोटे-मोटे पर्वत भी प्रकम्पित हो जाते हैं और पृथ्वी में भी भूचाल आ जाता है। लेकिन क्या यह प्रलयंकारी तूफान मंदराचल पर्वत को कभी विचलित कर सकता है?

नही! कभी नहीं!! आपका आत्म-बल और वीतरागता मंदराचल पर्वत के समान अडिग और निष्कम्प है। अतः राग का कोई भी निमित्त आपको विचलित नहीं कर सकता। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

।।ओऽम् श्री आदिनाथाय नमः।।

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