श्रुत पंचमी (ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी) के पावन अवसर पर

श्रुत पंचमी (ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी) के पावन अवसर पर

‘ज्ञान दीप तप तेल भर, घर शोधै भ्रम छोर।

या विधि बिन निकसै नहीं, पैठे पूरब चोर।।’

आज ज्ञान का पर्व है। ज्ञान के प्रकाश को दीपक के समान अंधकार के विनाश का माध्यम बताया गया है।

किसी ने दीपक से पूछा कि तुम क्यों जलते हो?

उसने कितना सुन्दर जवाब दिया -

‘किसी कदम को लगे न ठोकर, इसीलिए हम जलते हैं।

निश्छल हो, निश्चल मन होकर, मोक्ष मार्ग पर चलते हैं।

जिसके जीवन में अंधियारा हो, वहाँ प्रकाश तुम भर देना।

जहाँ दिखाई पड़े अमावस, वहाँ पूर्णिमा कर देना।’

जब अमावस की रात्रि का अंधकार चारों ओर फैल जाता है तो चोर चोरी करने के लिए निकलते हैं। सोए हुए आदमी के घर में सेंध लगाते हैं और चोरी के इरादे से उसके घर में प्रविष्ट हो जाते हैं। जो आदमी सचेत हो, उसके घर में चोरों का प्रवेश असम्भव है।

घर में घुसते ही वे पहले उस कक्ष की ओर जाते हैं, जहाँ मूल्यवान वस्तुएँ मिलने की संभावना होती है। तुरंत अपना काम किया और निकल लिए। फिर तो नींद से जागने के बाद ही पता चलता है कि मेरी सबसे मूल्यवान वस्तु चोरी हो गई। पश्चाताप भी होता है कि यदि मैंने समय रहते चोरों को भगा दिया होता तो मुझे अपने रत्नों से हाथ न धोना पड़ता।

क्या यही अवस्था आज हमारी नहीं है?

भूधरदास जी भी हमें यही समझाना चाहते हैं -

‘मोह नींद के जोर जगवासी घूमै सदा।’

हम मोह-निद्रा में लीन हैं। हमें पता ही नहीं कि कर्म-चोर हमारे सबसे मूल्यवान रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र) को चुरा रहे हैं और हमें मालूम ही नहीं है।

आज के दिन जिनवाणी माता सद्गुरु के माध्यम से हमें जगा रही है कि

‘गाफिल क्यों पड़ा सोता, भरोसा है न इक पल का’

दुनिया में सब कुछ आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, केवल मोक्ष मार्ग का ज्ञान ही दुर्लभ है।

हम पूजा पाठ भी करते हैं तो सांसारिक भोगों के लिए, पर धर्म के ज्ञान में हमें समस्त सुख देने की सामर्थ्य है और वह भी बिना मांगे।

इसलिए ज्ञान के दीपक में तप का तेल भरो। यह तुम्हारे भ्रम के अंधकार को दूर कर देगा।

अमावस्या के गहन अंधकार के स्थान पर पूर्णमासी का उजाला हो जाएगा। जिनवाणी माँ कहती हैं कि यही विधि है जिससे आत्मा के साथ लगे हुए कर्मां के चोरों को निकाला जा सकता है। वरना वे तुम्हारी बहुमूल्य निधि को चुरा कर ले जाएंगे और तुम जन्म-मरण के चक्कर में फँसते चले जाओगे।

आज प्रतिदिन कुछ समय निकाल कर जिनवाणी के स्वाध्याय का नियम लो और अपने जीवन को ज्ञान के दीपक से प्रकाशित करो।

भक्तामर जी के 16 वें श्लोक में कहा भी गया है -

निर्धूमवर्तिरपवर्जिततैलपूरः

कृत्सनं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि ।

गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां

दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः ॥16

हे विश्व प्रकाशक! आप समस्त संसार को प्रकाशित करने वाले अनोखे दीपक हैं क्योंकि अन्य दीपकों में से तो धुआं निकलता है परन्तु आपकी वर्ति (मार्ग) अर्थात् बाती निर्धूम है, पाप रहित है।

अन्य दीपक तेल की सहायता से प्रकाश (ज्ञान) फैलाते हैं पर आप ने अपने दीपक में तप का तेल भरा है जो कभी समाप्त नहीं होता। अन्य दीपक हवा के ज़रा से झौंके से बुझ जाते हैं परन्तु आपके ज्ञान-प्रकाश को प्रलयकाल की हवा भी नष्ट नहीं कर सकती। दीपक का प्रकाश तो थोड़े से स्थान को प्रकाशित करता है पर आपका ज्ञान प्रकाश तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाला है।

अतः संत कहते हैं कि आप भी अपनी आत्मा को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करें और अपना मोक्ष मार्ग प्रशस्त करें।

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)