उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी (भाग - 1)
उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी (भाग - 1)
भगवान मल्लिनाथ जी के पूर्वभव
भगवान मल्लिनाथ जी पूर्वभव में - विदेह में वैश्रवण राजा
भगवान मल्लिनाथ का पवित्र जीवन पूर्व भवों से ही रत्नत्रय द्वारा अलंकृत था। जम्बूद्वीप के विदेह क्षेत्र में वीतशोका नाम की एक सुन्दर नगरी है। मोक्ष के अभिलाषी धर्मात्माओं से भरपूर उस नगरी में जिन मंदिरों के उत्तम शिखरों पर लहराती हुई धर्मध्वजाएं सबको अपनी ओर आकर्षित करती हैं। क्या आप जानना चाहते हैं कि ऐसी सुन्दर नगरी का राजा कौन होगा? सुन्दर नगरी का राजा भी तो सुन्दर ही होगा न! तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ का जीव स्वयं ही पूर्वभव में इस सुन्दर नगरी का राजा ‘वैश्रवण’ था। वे आत्मज्ञानी थे और उनका चित्त सदा रत्नत्रय की आराधना में लीन रहता था।
एक बार वे राजसभा में बैठे थे, वहाँ उद्यान के माली ने आकर आनन्दपूर्वक बधाई दी कि ‘हे स्वामी! अपनी नगरी के चन्दनवन में आज सुगुप्ति नाम के महामुनिराज पधारे हैं। जिस प्रकार साधकजीवों का हृदय रत्नत्रय द्वारा खिल उठता है, उसी प्रकार सारा उद्यान बिना मौसम के आम आदि फल-फूलों से खिल उठा है।’ यह सुनते ही राजा ने अत्यन्त विभोर होकर आनन्दभेरी बजवाई और नगरजनों सहित धूमधाम से मुनिराज की वन्दना करने आए।
श्री मुनिराज ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा - हे राजन्! तुम्हें मोक्ष के कारणरूप रत्नत्रय धर्म में वृद्धि हो।
राजा ने पूछा - हे नाथ! रत्नत्रय धर्म किसे कहते हैं?
मुनिराज के श्रीमुख से अमृत के झरने के समान वाणी निकली - यह संसार अनेक प्रकार के दुःखों से भरा हुआ है। जो धर्म इस संसार के दुःखों से छुड़ाकर अनन्त सुख के धाम अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कराए, उसे सच्चा धर्म कहते हैं। इसको प्राप्त करने का उपाय सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यग्चारित्र रूपी तीन रत्न हैं। उन्हें पहचान कर उनकी आराधना करो।
मुनिराज ने विस्तारपूर्वक रत्नत्रय का वर्णन और उसकी प्राप्ति का उपाय बताया, जिसे सुनकर राजा ने हर्षपूर्वक उत्तम श्रावक व्रत लेकर मुनिराज की वंदना की।
धर्म का आचरण करते-करते एक दिन राजा वैश्रवण वनविहार करने गए। प्रातःकाल जाते समय उनके मार्ग में एक विशाल वटवृक्ष खड़ा था, जिसे देखकर उन्हें विचार आया कि ‘वाह! कितना विशाल एवं सुन्दर वटवृक्ष है! मेरा राज्य भी इस विशाल वटवृक्ष की तरह ही विशाल एवं सुन्दर है।’ परन्तु सांयकाल वनविहार करके लौटते समय उन्होंने देखा कि वह विशाल एवं सुन्दर वटवृक्ष बिजली गिरने से भस्मीभूत हो गया था।
ऐसी क्षणभंगुरता को देख कर राजा का चित्त संसार से एकदम विरक्त हो गया और वे विचार करने लगे कि मेरा राज्य और शरीर के भोग भी इस वटवृक्ष की भांति क्षणभंगुर हैं। ऐसा विचार कर उत्तम बारह वैराग्य भावना पूर्वक संसार भोगों से उदासीन होकर तथा शरीर का ममत्व छोड़ कर ‘श्रीनाग’ नामक मुनिराज के पास जाकर उन्होंने जिनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर ली और आत्मध्यान में शुद्धोपयोग द्वारा सम्यक् रत्नत्रय दशा प्रगट की। रत्नत्रयधारी उन वैश्रवण मुनिराज ने दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं को भा कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध भी किया। बारह अंग का ज्ञान प्राप्त करके वे श्रुतकेवली हुए और आराधना सहित समाधिमरण करके ‘अपराजित विमान’ में अहमिन्द्र हुए।
क्रमशः
।।ओऽम् श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।
Comments
Post a Comment