बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 20)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 20)

भगवान नेमिनाथ का समवशरण

भगवान नेमिनाथ ने केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया है, यह समाचार जान कर नरक वासी भी उस क्षण शांति का अनुभव करने लगे।

देवों ने सहस्राम्र वन में भगवान का दिव्य समवशरण लगाया, जहाँ अनेक देवों और मनुष्यों ने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। तिर्यंचों के समूह भी उनके दर्शन के लिए दौड़ कर आए और अपने स्थान पर शांत व निर्भीक होकर बैठ गए।

अहा! कैसा होगा वह पावन दृश्य!! जहाँ एक ओर देवगण व मुनिवृन्द प्रभु की स्तुति कर रहे हैं और दूसरी ओर भावी तीर्थंकर श्री कृष्ण आदि प्रभु नेमिनाथ की वंदना कर रहे हैं। महाराजा समुद्रविजय अपने परिवार सहित समवशरण में विराजमान भगवान नेमिनाथ के दर्शन करके अति प्रसन्न हुए। त्रिलोक पूज्य भगवान नेमिनाथ ने सर्वप्रथम गिरनार के तपोवन में दिव्यध्वनि द्वारा मोक्षमार्ग बता कर भव्य जीवों को परम आनन्दित किया। हस्तिनापुर से युधिष्ठिर आदि भी अपने भ्राता सर्वज्ञ भगवान नेमिनाथ की धर्मसभा देखकर अति आनन्दित हुए।

भगवान नेमिनाथ को मुनिदशा में प्रथम आहार कराने वाले राजा वरदत्त भी समवशरण में दीक्षित हुए। भगवान की धर्मसभा में ‘वरदत्त’ आदि 11 गणधर उस दिव्य वाणी से ज्ञान प्राप्त कर रहे थे। आपकी धर्मसभा में जीव वीतरागता की प्रेरणा प्राप्त करते थे और क्रूर प्राणी भी हिंसक भाव छोड़ कर शांत हो कर धर्मश्रवण करते थे। आपकी धर्मसभा में प्रभु के सह-दीक्षित हज़ारों मुनियों में से 1500 मुनिवर केवली बने तथा मनःपर्यय ज्ञानी, अवधिज्ञानी, श्रुतकेवली, उपाध्याय, विक्रियाऋद्धिधारी आदि 18000 मुनिवर उस धर्मसभा में मोक्ष की साधना कर रहे थे और समवशरण में   विराजमान होकर आपकी धर्मसभा को सुशोभित कर रहे थे। आपके श्रीमण्डप में राजुलमती आदि 40,000 आर्यिकाएँ भी अब गिरिगुफ़ा का निवास छोड़ कर संघ सहित समवशरण में शोभायमान थी। एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ सम्यक्त्व व व्रत सहित समवशरण में मोक्ष की उपासना कर रहे थे। देवों और तिर्यंचों का तो कोई पार ही नहीं था।

आज भी वह गिरनार लाखों-करोड़ों जीवों द्वारा तीर्थ रूप में पूजित व वंदित है।

भगवान नेमिनाथ की धर्मसभा में मोक्षगामी पाण्डवों ने तथा गजकुमार, प्रद्युम्न आदि ने धर्म का श्रवण किया।

प्रभु नेमिनाथ की आयु 1000 वर्ष थी। उन्होंने 300 वर्ष की आयु में केवलज्ञान प्राप्त किया। तत्पश्चात् 700 वर्षों तक तीर्थंकर रूप में विहार करके भारतभूमि पर धर्मामृत की वर्षा की।

धर्मचक्र सहित देश-देशान्तर में विचरण करते हुए कभी-कभी तीर्थंकर प्रभु नेमिनाथ रैवतगिरि (गिरनार) भी पधारते थे। एक बार समवशरण में श्री कृष्ण के पूछने पर प्रभु की वाणी में आया - इस विश्व में अनन्त जीवात्माएँ स्वतन्त्र रूप से विद्यमान तत्त्व हैं। कोई भी जीव ‘मैं नहीं हूँ’, ऐसा कह कर अपना अभाव सिद्ध नहीं कर सकता। क्योंकि ‘मैं नहीं हूँ’, ऐसा कहने वाला भी जीव ही है। आत्मा का सदा शरीर से भिन्न लक्षण वाला अस्तित्व है। यद्यपि वह इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर नहीं होता, परन्तु अंतर में वह ज्ञान द्वारा अनुभव में आता है। उसका स्वभाव बाह्य विषयों के बिना सुखी होने का है। हे भव्यों! ऐसे परमतत्त्व रूप अपनी आत्मा को जानकर कषायों को त्याग कर उसकी उपासना करो। यही मोक्ष का साधन है।

आत्मा की ऐसी सुन्दर व्याख्या सुन कर सभी श्रोताओं का चित्त प्रसन्न हो गया। उनके समवशरण में अनेक भव्य जीवों ने सम्यक्त्व को प्राप्त किया।

तत्पश्चात् माता देवकी ने वरदत्त गणधर से प्रश्न पूछा - हे देव! मेरे आँगन में दो मुनिराज आहार के लिए पधारे थे, दूसरे दिन वे ही मुनिराज फिर पधारे और तीसरे दिन भी वे ही मुनिराज आहार के लिए पधारे; तो वे मुनिवर मेरे यहाँ बार-बार क्यों पधारे? .... उन्हें देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त स्नेह उमड़ता है।

दिव्यज्ञानी गणधर देव ने देवकी माता की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा - हे माता! आपके आँगन में जो तीन बार मुनि-युगल पधारे, वे वही-वही नहीं थे, हर बार अलग-अलग थे। श्री कृष्ण के जन्म से पूर्व जो तीन बार आपके युगल-पुत्र उत्पन्न हुए थे और कंस के भय से उनका पालन-पोषण अन्यत्र हुआ था, वे छहों पुत्र दीक्षा लेकर मुनि हुए हैं। आपने उन पुत्रों को बचपन में नहीं देखा, इसलिए आप उन्हें पहचान न सकी। आपके पुत्र होने के कारण ही आपका उनके प्रति मातृवत् स्नेह उमड़ रहा था। वे देवदत्त-देवपाल, अनिकदत्त-अनिकपाल और शत्रुघ्न-जितशत्रु चरमशरीरी हैं और इसी भव में मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

ऐसा सुनकर देवकी माता को बहुत हर्ष व वैराग्य की भावना होने लगी। देवकी व श्री कृष्ण की रानियों ने जाना कि अभी तक आत्मज्ञान के बिना वे स्त्री पर्याय में भटकती रही हैं। उन्होंने वैराग्यपूर्वक अपनी बुद्धि जैन धर्म में लगाई और भक्तिभाव सहित भगवान नेमि प्रभु के चरणों में अपने चित्त को लगाया।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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