बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 21)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 21)

द्वारिकापुरी का दहन

देश-देशान्तर में विचरण करते हुए एक बार तीर्थंकर प्रभु नेमिनाथ पुनः गिरनार पधारे। प्रभु का उपदेश सुनकर बलभद्र ने अपने भाई श्री कृष्ण का और स्वर्ग से सुन्दर द्वारिकापुरी का भविष्य पूछा। प्रभु की वाणी में आया कि ‘12 वर्ष पश्चात् द्वीपायन ऋषि द्वारा समस्त द्वारिकापुरी भस्म हो जाएगी और श्री कृष्ण की मृत्यु उनके भाई जरत्कुमार के हाथ से होगी।’ यह सुनकर अनेक जीवों ने वैराग्य प्राप्त करके दीक्षा धारण कर ली।

श्री कृष्ण महाराज ने द्वारिका नगरी में घोषणा कराई कि मेरे माता-पिता आदि परिजन एवं समस्त नगरवासी वैराग्यपूर्वक संयम धारण करके शीघ्र आत्मकल्याण करो। मैं किसी को रोकूँगा नहीं। मैं स्वयं व्रत धारण नहीं कर सकता, परन्तु जो भी दीक्षा लेंगे, मैं उनके परिवार के पालन-पोषण का सम्पूर्ण भार लूँगा। इसलिए द्वारिका नगरी के भस्म होने से पूर्व जिन्हें अपना कल्याण करना हो कर लें।

श्री कृष्ण की धर्मघोषणा सुन कर उनके पुत्र-पौत्र प्रद्युम्नकुमार, शम्बुकुमार, भानु कुमार, अनिरुद्धकुमार आदि चरमशरीरी राजपुत्रों ने तुरन्त नेमिप्रभु के निकट जिनदीक्षा ले ली और गिरनार पर्वत की दूसरी, तीसरी व चौथी टोंक से मोक्षपद प्राप्त किया। श्री कृष्ण की आठों पटरानियों के साथ अन्य हज़ारों रानियों ने भी भगवान के समवशरण में जाकर आर्यिका-व्रत धारण किए।

बलभद्र के मामा द्वीपायन मुनि द्वारिका नगरी से 12 वर्षों के लिए बाहर चले गए। वे यह समझकर कि 12 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, द्वारिका नगरी में लौट कर आ गए, किन्तु मलमास की अधिकता के कारण अभी 12 वर्ष पूर्ण होने में एक मास शेष था। ‘यह द्वारिका नगरी जलाने वाला आ गया है’ - ऐसा कहकर यादवकुमारों ने उसे पत्थर आदि मारने शुरू कर दिए और उन्हें भला-बुरा बोल कर अपमानित करने लगे। इससे क्रोधित होकर द्वीपायन मुनि सम्पूर्ण द्वारिका नगरी को भस्म करने को तैयार हो गए और क्रोधपूर्वक तेजोलेश्या द्वारा सारी नगरी को भस्म कर दिया। सभी मनुष्य व पशु आदि अग्नि में जलने लगे और बचाओ....बचाओ....का करुण-क्रन्दन करने लगे। देवों द्वारा निर्मित द्वारिका नगरी 6 मास तक अग्नि में जलती रही और सर्वथा नष्ट हो गई। 

अपनी आँखों के सामने द्वारिका नगरी को धू-धू करके जलते हुए देख कर श्री कृष्ण और बलभद्र आकुल-व्याकुल हो गए। आत्मज्ञानी होते हुए भी वे कहने लगे - अरे! हमारे माता-पिता, स्वजन-प्रजाजन जल रहे हैं। कोई देव ही आकर बचाओ। परन्तु भवितव्यता और द्वीपायन मुनि के क्रोध के सामने देव भी क्या कर सकते थे?

आग बुझाने का कोई साधन न देखकर श्री कृष्ण और बलभद्र ने नगरी का गढ़ तोड़ कर समुद्र के जल से अग्नि बुझाने का प्रयत्न किया। परन्तु उस जल ने भी तेल का काम किया तथा अग्नि और अधिक बढ़ने लगी। आग को बुझाना असंभव जानकर दोनों भाइयों ने अपने माता-पिता को रथ में बिठाकर घोड़े जोत दिए, पर वे चले ही नहीं; हाथी जोते पर वे भी रथ को न खींच सके। रथ के पहिए पृथ्वी पर चिपक गए। अंत में दोनों भाई रथ में जुत गए। हज़ार सिंहों का बल रखने वाले दोनों भाइयों से भी रथ नहीं हिला। वह वहीं ज़मीन में गड़ गया। अधिक बल लगाने लगे, तो नगरी के द्वार अपने आप बंद हो गए, जिन्हें दोनों भाइयों ने लातें मार-मार कर तोड़ा। उसी समय आकाशवाणी हुई - मात्र तुम दोनों भाई ही द्वारिका से जीवित निकल पाओगे। तुम अपने माता-पिता को भी नहीं बचा पाओगे।

दोनों भाई रुदन करते हुए अपने माता-पिता को असहाय छोड़ कर द्वारिका से बाहर निकले। स्वर्ण व रत्नमयी नगरी घास की तरह जल कर भस्म हो रही थी। वे दोनों दक्षिण की ओर पाण्डवों के पास जाने का निर्णय करके वहाँ से चल पड़े।

द्वीपायन मुनि ने भगवान के वचन पर श्रद्धा छोड़ कर अपना भव भी बिगाड़ा और अनेक जीवों की मृत्यु का कारण बने। धिक्कार है ऐसे क्रोध को, जो स्व-पर का नाश करके संसार की वृद्धि करता है।

द्वारिका नगरी भस्म हो चुकी थी।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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