मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अगस्त, 2022 को केन्द्रीय कारागार, हिसार में दिए गए प्रवचन का सारांश

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अगस्त, 2022 को केन्द्रीय कारागार, हिसार में दिए गए प्रवचन का सारांश

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

प्यारे बन्धुओं! आज का दिन परम पावन और पुनीत है। आज 15 अगस्त का दिन सारे भारत में विशेष उमंग व हर्षोल्लास से मनाया जाता है क्योंकि आज से 75 वर्ष पूर्व भारत को अंग्रेज़ों की दासता से मुक्ति मिली थी। इसलिए 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इसे ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मनाया जा रहा है। वास्तव में यह पूर्ण सत्य है कि बन्धन में तो कोई नहीं रहना चाहता। मैं जानता हूँ कि सभी जीव चाहते हैं कि वे बन्धन से और दुःखों से मुक्त हों।

यहाँ आते ही एक बच्चे ने मुझ से पूछा कि महाराज जी! यहाँ सब सीरियस और साइलेंट क्यों हैं? मैंने उत्तर दिया कि बेटा! बन्धन में रह कर भला कौन हँसेगा? यहाँ से तो सब जल्दी से जल्दी छुटकारा पाना चाहते हैं। आपको यहाँ बन्धन में बाँध कर लाया गया है और मुझे वन्दन करके लाया गया है। जानते हैं क्यों?

जब हमने जेल में प्रवेश किया तो जेलर साहब आदि ड्यूटी पर तैनात सभी व्यक्तियों ने मेरी चरण वन्दना की, क्योंकि हम जैन दिगम्बर मुनि पाँच महाव्रतों का अपने आचरण में पालन करते हैं। संसार में रहते हुए इन व्रतों को महाव्रत के रूप में नहीं, तो अणुव्रत के रूप में तो सभी के द्वारा पालन किया जा सकता है। हमें त्याग करना है इन पाँच पापों का - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का।

ये पाँचों पाप हमें बन्धन में बाँधने का कारण बन सकते हैं। इनका विचार भी यदि मन में आ जाए, तो वह पाप कहलाता है। मान लो हमने अपने मन में किसी को मारने का, किसी से झूठ बोलने का, किसी की वस्तु या धन-सम्पत्ति चुराने का, पर-स्त्री पर बुरी नज़र डालने का या आश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करने का भाव भी कर लिया तो वह पाप है। यदि ये बुरी भावनाएँ मन में आ जाएँ तो पाप है और ये पाप वचन से कर लिए, तो अपराध की श्रेणी में आ जाते हैं और काया से भी हो गए या जानबूझ कर कर दिए तो उसकी कोई माफ़ी नहीं अपितु दण्ड ही मिलता है।

सज़ा तो पाप की भी मिलती है, लेकिन इस संसार की अदालत में नहीं; ऊपर वाले की अदालत में। यह न सोचो कि मैंने अपने मन में क्या सोचा, यह तो किसी को पता ही नहीं चला। भगवान की अदालत में सब पापों का लेखा-जोखा रहता है। अपराधी केवल वचन से अपराध करके कोई सबूत न होने पर छूट भी सकता है, लेकिन काया से किए गए दुष्कृत्य से कोई नहीं बच सकता। इसलिए पाप जहाँ भी रोक सको तो रोक लो। मन में आ जाए तो वहीं रोक लो, वचनों में न आने दो और वचनों में भी आ जाए तो उसे वहीं तक सीमित रहने दो, काया में न आने दो।

इन पापों का सबसे बड़ा कारण है - क्रोध। क्रोध हमेशा मूर्खता से आरम्भ होता है और पश्चाताप पर खत्म होता है। कई व्यक्ति क्रोध में आकर किसी से लड़ाई-झगड़ा कर लेते हैं, मार-पीट कर लेते हैं; जिसमें उसकी जान भी जा सकती है। जब उसके परिणाम उन्हें जेल में भुगतने पड़ते हैं, तब उन्हें अपने किए हुए ग़लत काम पर पश्चाताप होता है कि काश! उस समय संयम रख लेते और बात को वहीं समाप्त कर देते तो आज इस बन्धन में न बँधना पड़ता।

बन्धुओं! कुछ लोग होते हैं जिनका दासता में जन्म होता है और सारा जीवन दासता में ही व्यतीत होता है। बन्धन में जन्म लेना बुरा नहीं है, बन्धन में जीवन का कुछ काल बिताना भी बुरा नहीं है, पर बन्धन में ही मर जाना सबसे बुरा है। अपने जीवन में कुछ ऐसा काम कर जाना, जिससे आप सब दासता से मुक्त हो कर ही मरण करें और अपने जीवन को सफल बना सकें।

जानते हो न कि नारायण कृष्ण जी का जन्म कहाँ हुआ था? जेल में। और मरण कहाँ हुआ था? जंगल में। लेकिन क्या उन्होंने अपना जीवन जेल में ही बिताया या उनका मरण जेल में ही हुआ? नहीं न! उनका जन्म अवश्य ही जेल में हुआ, पर वे हर समय जेल में नहीं रहे। उनके सारे कर्म जेल से बाहर हुए।

एक मंदिर होता है, जहाँ जाकर जीव अपनी आत्मा का सुधार करता है। वहाँ हम परमात्मा या गुरुओं के पास जाते हैं तो हमारे अन्दर की बुराइयाँ दूर होने लगती हैं और अच्छाइयाँ प्रवेश करने लगती हैं। जेल भी एक सुधार गृह होता है, जहाँ रह कर अपनी ग़लतियों को सुधारा जाता है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को सही रास्ते पर चलाने के लिए ग़लत काम करने से मना करती है। यदि वह नहीं सुनता तो उस पर क्रोध भी करती है और फिर भी वह नहीं मानता तो एक-आध चांटा भी लगा देती है।

उसी प्रकार जेल में रखने का उद्देश्य यही है कि हम अपनी जाने-अनजाने में हुई ग़लतियों को सुधार सकें। हम संसारी जीव हैं और न चाहते हुए भी हमसे अनेक प्रकार के अपराध हो जाते हैं। हम उन पापों और अपराधों की गुरु या प्रभु के पास जाकर आलोचना करते हैं, स्वीकार करते हैं, प्रायश्चित करते हैं और पुनः उन्हें न करने की प्रतिज्ञा भी करते हैं। तो जेल में रह कर भी ऐसे काम किए जा सकते हैं कि आदर्श व्यवहार के चलते आपको इस बन्धन से शीघ्र ही छुटकारा मिल सकता है।

आसमान की शोभा सूर्य से नहीं, सितारों से होती है।

देश की शोभा गद्दारों से नहीं, वफादारों से होती है।

इंसान की शोभा रूपरंग से नहीं, ए दोस्तों!

उसके सद्व्यवहार और ऊँचे विचारों से होती है।

एक बार मैं चातुर्मास के दौरान लखनऊ की आदर्श जेल में प्रवचन करने गया। उस जेल में ऐसे कैदियों को रखा जाता है जो अपने अच्छे व्यवहार व अनुशासन का पालन करने के कारण दूसरी जेल से उस आदर्श जेल में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं और उनके जल्दी मुक्त होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

जैसे एक हाथ में पाँचों अंगुलियाँ बराबर नहीं होती, उसी प्रकार सभी व्यक्ति और उनकी सोच बराबर नहीं हो सकती। कभी किसी के समान बनने की कोशिश न करो। बस! स्वयं को सुधारो।

पंछी तुझे है अगर, अपने पंखों पर विश्वास। तो डरा नहीं सकेगा तुझे, ये विशाल आकाश।

मांझी तुझे है अगर, अपने साहस पर विश्वास। तो डरा नहीं सकेगी तुझे, ये तूफ़ानों की प्यास।

मानव तुझे है अगर, अपने कर्मों पर विश्वास। तो कैद न कर सकेगा तुझे, कोई कारावास।

हम अपनी आत्मा को इस देह की कारागार से मुक्त कराने के लिए ही नग्न दिगम्बर वेश धारण करते हैं। एक जैन दिगम्बर संत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का साक्षात् प्रमाण है।

आप अपने आचरण में सुधार करना चाहते हैं, तो सबसे पहले व्यसन का त्याग करना होगा। शराब, गुटखा, तम्बाकू, चरस, गांजा आदि का कोई भी व्यसन हमें जेल की सलाखों के पीछे बंद करा सकता है। व्यसन सभी पापों को करने के लिए प्रेरित करता है। इसके लिए व्यक्ति हिंसा करने, झूठ बोलने, चोरी करने, दुराचरण करने और दूसरों की सम्पत्ति हड़पने जैसे काम भी कर बैठता है।

बेटी को बेटे के समान समझ कर उसका पालन-पोषण करो। आज एक बेटी ही अपनी योग्यता के कारण भारत के राष्ट्रपति के पद को सुशोभित कर रही है। कई बार भ्रूण हत्या या बेटा न होने के चक्कर में लोग अपनी पत्नी का कत्ल करने का बड़ा अपराध कर बैठते हैं और दण्ड के भागी बन जाते हैं।

जैसे हमारा ध्वज ऊपर होता है, वैसे ही ऐसा माना जाता है कि परमात्मा भी ऊपर ही रहता है। रामायण में एक कथन आता है कि -

रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।।

जब हम गुरुओं के आगे संकल्प लेते हैं तो हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हमारे प्राण भले ही चले जाएँ, पर वचन नहीं जाना चाहिए। जब कोई व्यक्ति अपराध करने के बाद पकड़े जाने पर आत्मसमर्पण करता है, तो अपने दोनों हाथ ऊपर करके चलता है। ओऽम् शब्द में सभी धर्मों का सार निहित है। आज आपको मौका मिला है गुरु और परमात्मा को याद करने का, इसलिए सभी लोग अपने-अपने हाथ आसमान की ओर उठा कर तीन बार ओऽम् शब्द का उच्चारण करेंगे और अपने तन, मन और वाणी को पवित्र करेंगे। आज हम सभी इन नियमों का पालन करने का संकल्प करेंगे।

ओऽम्............, ओऽम्............, ओऽम्............!!!

सदा परमात्मा में विश्वास रखो और नेकी की राह पर चलो, यही मेरा आप सभी को मंगल आशीर्वाद है।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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