भगवान महावीर स्वामी (25)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (25)

प्रश्न - क्षायिक सम्यक्दर्शन तो आत्मा की विशुद्धि है, उसके लिये बाह्य आलम्बनरूप केवली-श्रुतकेवली के पाद-मूल की समीपता किसलिये आवश्यक है?

उत्तर - तीर्थंकरों आदि का महात्म्य जिसने नहीं देखा, ऐसा जीव को दर्शनमोह के क्षय के कारण रूप परिणाम उत्पन्न नहीं होते।

‘अदिट्ठ तिथ्थयरादिमाहप्पस्स दंसणमोहखवण णिबन्धणकरण परिणामाणमणुप्पत्तीदो’

(यह बात तीर्थंकर प्रकृति के बंधन में भी समझ लेना अर्थात् क्षायिक सम्यकत्व की भाँति तीर्थंकर प्रकृति का प्रारम्भ भी केवली या श्रुतकेवली के सान्निध्य में ही होता है। कषाय प्राभृत, गाथा-110)

(यहाँ, तीर्थंकर के कारणरूप दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओं का अति सुन्दर भावपूर्ण वर्णन षट्खण्डागम, धवला आदि के आधार से किया गया है)

इस प्रकार उन नन्द मुनि ने दर्शनविशुद्धि से लेकर प्रवचन वत्सलत्व तक की सोलह मंगल-भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति बांधना प्रारम्भ किया। यद्यपि एक ओर अघाति ऐसी तीर्थंकर प्रकृति बंध रही थी, तो दूसरी ओर उसी समय वे मोहादि घाति-कर्मों को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे थे और जिसके बिना तीर्थंकरत्व की सम्भावना नहीं होती- ऐसी सर्वज्ञता को वे अति शीघ्रता से निकट ला रहे थे। वे रत्नत्रयवंत धर्मात्मा कहीं तीन रत्नों को ही धारण नहीं करते थे। उनकी आत्मा तो अपार चैतन्यगुण रत्नों की राशि से शोभायमान थी। उनमें सम्यक्त्वादि शुद्धभाव मोक्ष के ही साधक थे, बंध के किंचित् नहीं। जब भरतक्षेत्र के २४वें तीर्थंकर की प्रकृति को बाँधना प्रारम्भ किया तब 12वें वासुपूज्य तीर्थंकर का शासन प्रवर्त रहा था। एक ओर तीर्थंकर की प्रकृति बंध धारा, और दूसरी ओर रत्नत्रय की शुद्धरूप वेगवती मोक्षधारा, ऐसी द्विरूपधाराओं में वर्तति हुई उनकी परिणति तीव्रगति से मोक्ष की ओर प्रयाण कर रही थी। एक रागधारा और दूसरी रत्नत्रयधारा,- ऐसी दोनों धाराएँ एक साथ साधक की भूमिका में अपना-अपना कार्य करती हैं; उन दोनों धाराओं की भिन्नता को भेदज्ञानी जीव जानते हैं।

वे रागधारा को मोक्ष का कारण नहीं मानते और रत्नत्रयधारा को किंचित् भी बंध का कारण नहीं मानते। यदि रत्नत्रय स्वयं बंध का कारण हो, तो जगत में मोक्ष के उपाय का अभाव हो जाय; और यदि राग मोक्ष का कारण हो तो सर्व जीव मोक्ष प्राप्त कर लें।

इसलिये जिनसिद्धान्त है कि ‘जितने अंश में राग उतने अंश में बंधन; और जितने अंश में रत्नत्रय उतने अंश में मोक्ष का उपाय।’ (देखें - पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय श्लोक-212 से 214)

भगवान के मुनिजीवन की, (और ऐसे ही प्रत्येक साधक धर्मात्मा की) यह विशेषता है कि उनकी चेतन्यधारा बंध को तोड़ती हुई आनन्दपूर्वक मोक्ष को साधने का कार्य निरन्तर कर रही है, उनकी ज्ञानचेतना का प्रवाह अखण्डरूप से केवलज्ञान की ओर दौड़ रहा है। अहा! धर्मात्मा की यह दशा अद्भुत-आश्चर्यजनक है। ऐसी अद्भुत वीतरागी दशा में वे नन्द मुनि शोभायमान थे। यह मुनिराज अब तीर्थंकर होकर मोक्ष में जाने की तैयारी कर रहे हैं, इनके साथ हम भी मोक्ष में जायेंगे - ऐसी भावना से प्रेरित होकर जगत के समस्त सद्गुण दौड़-दौड़कर प्रभु के आश्रय में आ रहे थे, और क्रोधादि समस्त दोष अब अपना नाश निकट जानकर शीघ्रता से दूर भागने लगे थे।

इस प्रकार दोष रहित, गुण सहित निर्दोष मोक्षमार्ग को वे मुनिराज सुशोभित कर रहे थे और जगत को भी उस सुन्दर मार्ग की प्रेरणा दे रहे थे। इसप्रकार रत्नत्रय की उत्तम आराधना पूर्वक समाधिमरण करके वे महात्मा १६वें प्राणत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्ररूप में उत्पन्न हुए। वहाँ वे यद्यपि पुण्यजनित दिव्य इन्द्रियसुखों के सागर में रहते थे, तथापि उन मुमुक्षु महात्मा को मोक्षसुख के बिना कहीं चैन नहीं पड़ता था; इसलिए अन्त में उन स्वर्गसुखों को भी छोड़कर मोक्षसुख की साधना के लिये वे मनुष्यलोक में आने को तैयार हुए।

(स्वर्ग से च्यवकर वे मंगल-महात्मा अपने अन्तिम अवतार भरतक्षेत्र में तीर्थंकर रूप से अवतरित हुए और उनके पंचकल्याणक उत्सवों में अनेक जीवों का कल्याण हुआ। उसकी आनन्दकारी कथा आप आगे पढ़ेंगे।)

है शार्दूल समान वीरता, साधकत्व है अनुपम।

भव का अंत किया जिन्होंने, उन महावीर को वंदना॥

(यहाँ भगवान महावीर के पूर्व भवों का वर्णन समाप्त हुआ।)

 ज्ञान की माला

तर्ज - ये देश की धरती सोना उगले ......

ये ज्ञान की माला ले लो, भैया! ले लो ज्ञान की माला।

जो पहिनेगा वह बन जायेगा, शाश्वत शिवसुख वाला॥

ये कहाँ से लाए ज्ञान की माला, हमको तो दिखलाओ ना।

ये कहाँ बनी है, किसने बनाई, यह भी तो बतलाओ ना॥

कीमत क्या है यह तो बताओ, लेवेंगे हम माला।

सर्वज्ञ देव के दिव्यज्ञान से, आई ज्ञान की माला॥

गणधर देव ने अंग पूर्व में, गूंथी ज्ञान की माला।

अनन्त गुणों की अमूल्य महा निधि, युक्त बनी ये माला॥

जड़-धन वैभव की कीमत से, नहीं मिले ये माला।

शुभ भावों गुण भेदों में भी, नहीं मिले ये माला॥

पूर्ण उपयोग समर्पित कर दो, तभी मिले ये माला।

मुक्ति सुन्दरी को पा जाओ, पहन ज्ञान की माला॥

विदेह धाम से कुन्द-कुन्द गुरु, लाये हैं ये माला।

जन्म-मरण का नाश करावे, ऐसी अद्भुत माला॥

 श्रीमती कंचनदेवी जैन, खेरागढ़

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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