भगवान महावीर स्वामी (26)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (26)भगवान महावीर : पंचकल्याणक
यत् स्वर्गावतरोत्सवे यद्भवत् जन्माभिषेकोत्सवे,यत् दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिल ज्ञानप्रकाशोत्सवे।
यत् निर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुतं तद्रवे;
संगीतः स्तुति मंगलैः प्रसरतां मे सुप्रभातोत्सवः॥
सर्वज्ञ भगवान महावीर स्वामी के पंचकल्याणक जगत का कल्याण करें।
हे जिनेन्द्र! आप श्री के मंगल पंचकल्याणक प्रसंग पर आपकी शुद्धात्मा की दिव्य महिमा को हृदयंगम करके इन्द्रादि आराधक भक्तजनों ने अद्भुत पूजन-स्तुतिपूर्वक जो मंगल उत्सव किया, उसके मधुर संस्मरण आज भी आनंद उत्पन्न कर रहे हैं; मानो आप ही मेरे हृदय में विराज कर बोल रहे हैं। ऐसे आपके मंगल चिन्तन पूर्वक आपके पंचकल्याणक का भक्ति सहित आलेखन करता हूँ। जिन भावों से स्वर्ग के हरि ने आपकी भक्ति की थी, उन्हीं भावों से मैं इस मनुष्य लोक का हरि आपकी भक्ति करता हूँ। अहो! त्रिकाल मंगल रूप उन तीर्थंकरों को नमस्कार हो कि जिनके पंचकल्याणक अनेक जीवों के कल्याण के कारण हुए हैं।
भगवान महावीर की आत्मा का भव-भ्रमण पूरा हुआ; अब अंतिम तीर्थंकर अवतार में उनके पंचकल्याणक होते हैं। उस महान आत्मा का अनादिकाल के चले आ रहे भव समुद्र का किनारा आ चुका है, और अनेक भव से चल रही वृद्धिगत आत्मसाधना के प्रताप से महामंगल मोक्षपद बिल्कुल निकट आ गया है; जिन्होंने चैतन्यसुख का आस्वादन किया है। ऐसे उन महात्मा को देवलोक के दिव्य वैभव भी लुभा नहीं सके। मोक्ष के साधक को स्वर्ग का भव कैसे ललचा सकेगा? वीतरागता के साधक को राग के फल कहाँ से अच्छे लगेंगे? उन मंगल आत्मा को 16वें स्वर्ग से इस भरतक्षेत्र में अवतरित होने में जब छह मास शेष थे, तब वैशाली-कुण्डग्राम में रत्नवृष्टि होने लगी।
अनन्त तीर्थंकरों के मंगलविहार से पावन अपना यह भारत देश; ढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाली गणतंत्र का कुण्डलपुर (कुण्डग्राम) अति शोभायमान था। उस समय भगवान पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था और उनके परम उपासक सिद्धार्थ महाराजा वैशाली गणराज्य के अधिपति थे। उनकी महारानी प्रियकारिणी-त्रिशलादेवी समग्र भरतक्षेत्र की अद्वितीय नारी-रत्न थीं। गौरववंती वैशाली-कुण्डलपुर की शोभा अयोध्या नगरी जैसी थी; उसमें तीर्थंकर के अवतार की पूर्व सूचना से सम्पूर्ण नगरी की शोभा में और भी वृद्धि हो गई थी। जिस प्रकार मिथ्यात्व से सम्यक्त्व की तैयारी होने पर आत्मा का रूप बदल जाता है और आनन्द की उर्मियाँ उठने लगती हैं, तदनुसार जिनराज के अवतार की तैयारियों से समस्त वैशाली की शोभा में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा, प्रजाजनों में सुख-समृद्धि एवं आनन्द की वृद्धि होने लगी। महाराजा सिद्धार्थ के प्रांगण में प्रतिदिन तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी। नगरजन नगरी की दिव्य शोभा तथा रत्नवृष्टि देखकर विस्मित होने लगे कि अरे! इस नगरी में कौन ऐसा पुण्यवान पुरुष है कि जिसके गृह-आँगन में प्रतिदिन ऐसे रत्नों की वर्षा होती है। तब किन्हीं अनुभवी पुरुषों ने बताया कि अपनी नगरी में अन्तिम तीर्थंकर अवतरित होने वाले हैं, उसी की तैयारी के यह चिह्न हैं। मात्र अपनी नगरी का नहीं, परन्तु सारे भरतक्षेत्र का भाग्योदय हो रहा है।
उत्तम मंगल सूचक सोलह स्वप्न
ऐरावत हाथी, श्वेत बैल, सिंह, पुष्पमाला, लक्ष्मी, चंद्रमा, सूर्य, दो कलश, दो मछली, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, देव विमान, नाग भवन (नागेंद्र भवन), रत्नों की राशि और धूम रहित अग्नि
महारानी त्रिशलादेवी में भी अन्तरंग एवं बाह्य में कई अद्भुत् परिवर्तन होने लगे। महान आनन्द की अव्यक्त अनुभूतियाँ उनके अंतर में होने लगीं। आषाढ़ शुक्ला षष्ठी की रात्रि के पिछले प्रहर में अति उत्तम मंगल सूचक सोलह स्वप्न देखकर वे हर्षातिरेक से रोमांचित हो गईं और उसी समय प्रभु महावीर की मंगल आत्मा 16वें स्वर्ग से च्यवकर प्रियकारिणी-त्रिशला माता के उदर में अवतरित हुई।
मंगलदिन अति सुखदाता, आये उर त्रिशला माता।
नर-हरि-देव नमें जिनमाता, हम सिर नावत पावत साता॥
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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