भगवान महावीर स्वामी (32)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (32)

देवकुमारों तथा राजकुमारों की तत्त्वचर्चा

एक बार चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन वीरकुंवर का जन्म-दिन मनाने हेतु देव कुमार और राजकुमार कुण्डग्राम के राजोद्यान में एकत्रित हुए थे। वीरकुंवर के आने में कुछ देर होने से वे तत्त्व-चर्चा करने लगे। उनकी चर्चा कितनी सुन्दर थी! आओ, हम भी देखें -

देव कुमार - भाइयों! आज वीरकुंवर का जन्म-दिन है। जब तक वे राजभवन से यहाँ पधारें, तब तक हम थोड़ी धर्मचर्चा करें।

राजकुमार बोले - वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। धर्म के जन्म के महान दिवस पर तो धर्मचर्चा ही शोभा देती है।

देव कुमार - ठीक है। आज हम ‘सर्वज्ञ’ के स्वरूप की चर्चा करेंगे।

बोलो, राजकुमार! हम किस धर्म को मानते हैं? और हमारे इष्टदेव कौन हैं?

राजकुमार - हम जैनधर्म को मानते हैं। उसमें आत्मा के शुद्धभाव द्वारा मोह को जीतते हैं और भगवान ‘सर्वज्ञ’ अपने इष्टदेव हैं।

सर्वज्ञ कौन हैं?

‘सर्वज्ञ’ नाम कोई व्यक्ति-वाचक नहीं है, परन्तु मोह का नाश करके ज्ञानस्वभावी आत्मा की सर्व ज्ञान-शक्ति जिनके अंदर विकसित हो गई है, वे सर्वज्ञ हैं। इस प्रकार ‘सर्वज्ञ’ शब्द गुणवाचक है।

सर्वज्ञ कब हुए?

राजकुमार - सर्वज्ञ अनादि से होते आ रहे हैं, वर्तमान में हो रहे हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे।

सर्वज्ञ कितने हैं? उनके कितने प्रकार हैं?

अनन्त जीव सर्वज्ञ हुए हैं; उनकी सबकी सर्वज्ञता एक समान है, उसमें कोई अन्तर नहीं है; परन्तु अन्य प्रकार से उनके ‘सिद्ध’ और ‘अरिहन्त’ ऐसे दो भेद हैं।

वे सर्वज्ञ भगवान कहाँ रहते हैं?

सर्वज्ञ में जो सिद्ध हैं, वे लोकाग्र में सिद्धलोक में विराजते हैं; उनके अतिरिक्त कितने ही सर्वज्ञ ‘अरिहन्त’ पद पर विराजमान हैं। वे इस मध्यलोक में मनुष्य रूप में विचरते हैं और ऐसे लाखों ‘अरिहन्त’ हैं। 

ऐसे किन्हीं सर्वज्ञ का नाम बतलाइए?

इस समय महाविदेह क्षेत्र में ‘श्री सीमंधर भगवान’ आदि सर्वज्ञ रूप से विराज रहे हैं। वे ‘अरिहंत-सर्वज्ञ’ हैं और पार्श्वनाथ आदि अनन्त भगवान वर्तमान में सिद्धलोक में विराजते हैं, वे ‘सिद्ध-सर्वज्ञ’ हैं। अपने महावीर कुमार भी आयु के 42 वें वर्ष में सर्वज्ञ होंगे।

देवकुमार - सर्वज्ञ क्या करते हैं?

राजकुमार - सर्वज्ञ अर्थात् सबके ज्ञाता सर्वज्ञ भगवान अपने ज्ञानसामर्थ्य से सब जानते हैं और उस ज्ञान के साथ वे अपने पूर्ण आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं। वे विश्व के ज्ञाता हैं, किन्तु कर्ता नहीं हैं।

ऐसे सर्वज्ञ को ही ‘देव’ किसलिए मानना?

क्योंकि अपने को अतीन्द्रिय पूर्ण सुख और पूर्णज्ञान ही इष्ट है, प्रिय हैं। इसलिए जिन्हें ऐसा सुख एवं परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ है, उन्हीं को हम अपने इष्टदेव रूप में मानेंगे।

देवकुमार - सर्वज्ञ को मानने से हमें क्या लाभ है?

राजकुमार - सर्वज्ञ को जानने व मानने से हमें आत्मा के पूर्ण सामर्थ्य की प्रतीति होती है। और अपने आत्मा के पूर्ण सामर्थ्य की प्रतीति होने के कारण ‘पर’ से ज्ञान या सुख लेने की पराधीन मान्यता दूर हो जाती है; बाह्यविषयों में सुख की मिथ्या-कल्पना छूट कर आत्मस्वभाव में जो अतीन्द्रिय ज्ञान एवं सुख है, उसकी श्रद्धा प्रकट होती है तथा सर्वज्ञता के साथ राग-द्वेष का कोई अंश भी नहीं रह सकता, इसलिए सर्वज्ञ को जानने से राग-द्वेष से भिन्न आत्मा के शुद्धस्वरूप की पहचान होती है। इस प्रकार सर्वज्ञ को जानने से हमें अपनी आत्मा में स्वाश्रयपूर्वक सम्यग्ज्ञान एवं अतीन्द्रिय सुख होता है अर्थात् धर्म का प्रारम्भ होता है। यह अपूर्व लाभ है।

क्या सर्वज्ञ को माने बिना धर्म नहीं हो सकता?

नहीं, सर्वज्ञ को माने बिना कदापि धर्म नहीं होता। 

सर्वज्ञ को माने बिना धर्म क्यों नहीं होता?

क्योंकि सर्वज्ञता ही आत्मा की पूर्ण प्रकट हुई परमात्मशक्ति है; आत्मा की पूर्ण प्रकट हुई शक्ति को जो नहीं मानेगा, वह अपनी आत्मा की परमशक्ति को भी कहाँ से जानेगा? और जब तक अपनी आत्मा की पूर्ण शक्ति को नहीं जानेगा, तब तक ‘पर’ से ज्ञान या सुख प्राप्त करने की पराश्रित मिथ्याबुद्धि बनी ही रहती है। जहाँ पराश्रित बुद्धि हो अर्थात् बाह्यविषयों में सुखबुद्धि हो, वहाँ धर्म हो ही नहीं सकता। इसलिए सर्वज्ञ को माने बिना कदापि धर्म नहीं होता।

 देवकुमार - सर्वज्ञ को माने बिना आत्मा की पूर्ण शक्ति को मान लेते तो?

राजकुमार - यदि आत्मा की पूर्ण शक्ति को यथार्थरूप से मानें, तो उसमें सर्वज्ञ की प्रतीति भी अवश्य आ ही जाती है। यदि सर्वज्ञ की प्रतीति न हो, तो आत्मा की पूर्ण शक्ति की प्रतीति भी नहीं होती। अपने को पूर्ण सुख चाहिए न? तो जहाँ पूर्णज्ञान हो, वहीं पूर्ण सुख होता है। इसलिए पूर्णज्ञान कैसा होता है, उसका निर्णय करना चाहिए। पूर्णज्ञान के निर्णय में ही सर्वज्ञ की मान्यता आ गई तथा ज्ञान एवं राग का भेदज्ञान भी हो गया; क्योंकि पूर्णज्ञान में राग का सर्वथा अभाव है। भले ही सर्वज्ञ अपने सामने उपस्थित न हों, परंतु अपने ज्ञान में तो उनका निर्णय हो ही जाना चाहिए। तभी आत्मा की पूर्णशक्ति का विश्वास आएगा और धर्म होगा।

देवकुमार - सर्वज्ञ कौन हो सकता है?

राजकुमार - प्रथम जो सर्वज्ञ को तथा सर्वज्ञ समान अपन आत्मा की परमात्मशक्ति को जाने, वह जीव अपनी सर्वज्ञत्व शक्ति को सर्वज्ञता में व्यक्त करके सर्वज्ञ होता है। इसलिए जो सर्वज्ञस्वभाव को जाने, वही आत्मज्ञ होता है और जो आत्मज्ञ हो, वह अवश्य सर्वज्ञ होता है। इस प्रकार सर्वज्ञता जैनधर्म का मूल है।

इसलिए हे मुमुक्षु भव्य जीवों! यदि तुम धर्मार्थ सर्वज्ञ का निर्णय करना चाहते हो, तो सर्वज्ञता के प्रति जिनकी परिणति उल्लसित हो रही है, जिनकी वाणी एवं मुद्रा सर्वज्ञता की निःशंक घोषणा कर रही है तथा राग से भिन्न ज्ञानचेतना के बल से जो सर्वज्ञ होकर जिनशासन के धर्मचक्र का प्रवर्तन करने वाले हैं - ऐसे श्री वीर प्रभु को चैतन्यभाव से जानो।

जो जानता महावीर को चेतनमयी शुद्धभाव से।

वह जानता निज आत्म को सम्यक्त्व लेता चाव से।।

प्रभु की ज्ञानचेतना को जानने से रागरहित सर्वज्ञस्वभावी आत्मा तुम्हारे स्वसंवेदन में आ जायेगा और सम्यक्त्व सहित सर्वज्ञता का सर्व समाधान हो जाएगा; तुम्हारा परिणाम राग से भिन्न ज्ञानचेतनास्वरूप हो जायेगा और तुम स्वयं अल्पकाल में अल्पज्ञता मिटाकर सर्व काल के लिये सर्वज्ञ हो जाओगे।

इस प्रकार देवकुमारों तथा राजकुमारों के बीच तत्वचर्चा चल रही थी। उस समय राजभवन में (चैत्र शुक्ला नवदशी को) क्या हो रहा था - आओ, वह हम देखें।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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