भगवान महावीर स्वामी (33)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (33)
वर्धमानकुमार ने प्रातःकाल सिद्धों का स्मरण करके आत्मचिन्तन किया। फिर माता के पास आये। त्रिशला माता ने बड़े उत्साहपूर्वक पंचपरमेष्ठी का स्मरण करके प्रिय पुत्र को तिलक किया और बलैयाँ लेकर मंगल आशीर्वाद दिया। माता का आशीष लेकर वीरकुमार प्रसन्न हुए और उनसे आनन्दपूर्वक चर्चा करने लगे।
अहा! माताजी के साथ वीर कुँवर कैसी आनन्ददायक चर्चा करते हैं, वह सुनने के लिये हम राजा सिद्धार्थ के राजभवन में चलें!
त्रिशला माता के राजभवन में
वाह! देखो, यह राजा सिद्धार्थ का राजभवन कितना भव्य एवं विशाल है! इसका शृंगार भी कितने अद्भुत ढंग से किया गया है! आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को वीरप्रभु का जन्म दिन होने से राजभवन के प्रांगण में हजारों प्रजाजन वीर कुँवर के दर्शनार्थ एकत्रित हुए हैं; आज वे अपनी आयु के पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। राजभवन के भीतर उस कक्ष की शोभा तो स्वर्ग की इन्द्रसभा को भी भुला दे - ऐसी है; परन्तु अपना लक्ष्य वहाँ नहीं जाता। अपनी दृष्टि तो सीधी महावीर कुँवर पर केन्द्रित है। अहा, वे कैसे सुशोभित हो रहे हैं! त्रिशला माता अपने इकलौते पुत्र को कितना लाड़ कर रही हैं! और कुँवर भी माताजी से आनन्दपूर्वक चर्चा कर रहे हैं। चलो, हम भी वह सुनें -
वीर कुँवर ने पूछा - “हे माता! जिन्हें भव नहीं है और जो अभी मोक्ष को भी प्राप्त नहीं हुए, वे कौन हैं?”
माता ने पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए हँसकर कहा - “वह तो मेरा प्यारा पुत्र है।”
फिर उन्हें गोद में लेकर चुम्बन करते हुए कहा - “बेटा, वह तो तू ही है, जिसे अगला भव भी नहीं है और जिसने अभी मोक्ष प्राप्त भी नहीं किया।
वीर कुंवर कहते हैं - “हे माता! शुद्धात्मतत्त्व की महिमा कैसी अगाध है, वह तुम जानती हो?”
“हाँ बेटा, जब से तू मेरे अंतर में आया, तब से शुद्धात्मतत्त्व की महिमा मैंने जान ली है।”
“तुमने आत्मा की कैसी महिमा जानी है? वह मुझे बतलाओ।”
“बेटा, जब से यहाँ रत्नवृष्टि हुई, मुझे 16 स्वप्न दिखाई दिये और मैंने उन स्वप्नों का उत्तम फल जाना, तब से मुझे ऐसा लगा कि अहा! जिसके पुण्य का प्रभाव इतना आश्चर्यकारी है, उस आत्मा की पवित्रता का क्या कहना! ऐसा आराधक आत्मा मेरे उदर में विराज रहा है। ऐसी अद्भुत महिमा से आत्मा के आराधक भाव का विचार करते-करते किसी अचिन्त्य आनन्दपूर्वक मुझे शुद्धात्मतत्त्व का भास हुआ। बेटा, यह सब तेरा ही प्रताप है।”
“हे माता! तुम्हें तीर्थंकर की माता बनने का महान सौभाग्य प्राप्त हुआ। तुम जगत की माता कहलाई। चैतन्य की अद्भुत महिमा को जानने वाली हे माता! तुम भी अवश्य मोक्षगामिनी हो।”
“बेटा वर्धमान! तेरी बात सत्य है। स्वर्ग से तेरा आगमन हुआ। तभी से अंतर एवं बाह्य वैभव वृद्धिगत होने लगा है। मेरे अंतर में आनन्द का अपूर्व स्फुरण होने लगा है। तेरी आत्मा का स्पर्श होते ही मुझे आराधक भाव प्रारम्भ हो गया है और मैं भी एक भव पश्चात् तेरी भाँति मोक्ष साधना करूँगी।”
“धन्य है माता! मेरी माता तो ऐसी ही शोभित होनी चाहिये! माता! तुम्हारी बात सुनकर मुझे आनन्द होता है। मैं इसी भव में मोक्ष को साधने हेतु अवतरित हुआ हूँ, तो मेरी माता भी ऐसी ही होगी न!”
“बेटा, तू तो समस्त जगत को मोक्षमार्ग दर्शाने वाला है; तेरे प्रताप से तो जगत के भव्यजीव आत्मज्ञान करेंगे और मोक्ष को साधेंगे। तो मैं तेरी माता ही क्यों बाकी रहूँ? मैं भी अवश्य मोक्षमार्ग में आऊँगी। बेटा, तू भले ही सारे जगत का नाथ है, परन्तु मेरा तो पुत्र ही है। तुझे आशीर्वाद देने का मुझे अधिकार है।
वाह, माता! तुम्हारा स्नेह अपार है। माता के रूप में तुम पूज्य हो। तुम्हारा वात्सल्य जगत में बेजोड़ है।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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