भगवान महावीर स्वामी (34)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (34)
पुत्र - माता! मेरी मोक्षसाधिका, धन्य-धन्य है तुझ को.....
तव स्नेह भरी मीठी आशीष, प्यारी लगती है मुझको...
माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।।
माता - बेटा! तेरी अद्भुत महिमा, सरस हृदय जैसी है....
तेरा दर्शन करके भविजन, मोह के बन्धन तोड़े हैं....
बेटा! दर्शन तेरा रे.... जगत को मंगलकारक है।।
पुत्र - माता! तेरी मीठी वाणी, मानो फूल ही बरस रहे हैं....
तेरे हृदय हेतु फव्वारे, इधर-इधर झरते हैं....
माता! दर्शन तेरा रे... जगत को आनन्ददायक है।।
माता - तेरी वाणी सुनकर भविजन, मोक्षमार्ग में दौड़े...
चेतन रस का स्वाद चखकर, राजपाट सब छोड़े....
बेटा जन्म तुम्हारा रे.... जगत को मंगलकारक है।।
पुत्र - माता मुझको जगे भावना, कब मैं बनूँ वैरागी...
रागमयी बंधन सब तोड़ूँ, बनूँ परिग्रह त्यागी....
माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।।
माता - बेटा! तू तो पाँच वर्ष का, पर गंभीर बहुत है...
गृहवासी तू फिर भी उदासी, दशा मोह से विरहित है...
बेटा! जन्म तुम्हारा रे... जगत को मंगलकारक है।।
पुत्र - माता! तू तो अंतिम माता, फिर नहीं होगी माता...
रत्नत्रय से केवल मिलते, जन्म-मरण भग जाता...
माता! दर्शन तेरा रे....जगत को आनंददायक है।।
माता - बेटा! तू तो जग में उत्तम, आत्म जीवन जीता....
दिव्यध्वनि का दे संदेशा, मुक्ति मार्ग प्रगटाता है....
बेटा! धर्म तुम्हारा रे...जगत को मंगलकारक है।।
पुत्र - माता! मुक्ति मार्ग खुला है, भव्य स्वयं ही चलता...
भरतक्षेत्र में जयवंतो, जिन आनंद मंगल देता...
माता! दर्शन तेरा रे....जगत को आनंददायक है।।
माता - वर्धमान! तू सच्चा बेटा, धर्म वृद्धि का कर्ता...
महावीर भी सच्चा तू है, मोहजाल का जेता....
बेटा! धर्म तुम्हारा रे...जगत को मंगलकारक है।।
पुत्र - माता! मैं निजधर्म बढ़ाऊँ, परमात्म पद पाऊँ....
जीव सभी निजधर्म को पायें, यही भावना भाऊँ....
माता! दर्शन तेरा रे...नगर को आनंददायक है।।
माता - बेटा! तेरे ही प्रताप से, जग में धर्म बढ़ेगा...
जो तेरा अनुचर बन जाये, मोक्षपुरी पहुँचेगा...
बेटा! धर्म तुम्हारा रे...जगत को आनंददायक है।।
पुत्र - माता! चेतन की अनुभूति, अतिशय मुझ को प्यारी...
अनुभूति तें आनंद उछले, उसकी जाति न्यारी है....
माता! दर्शन तेरा रे.....जगत को आनंददायक है।।
माता - बेटा! तू तो स्वानुभूति की, मस्ती में नित झूमे...
रत्नत्रय के लेता झोंके, प्यार-प्यार हिय में....
बेटा! जन्म तुम्हारा रे....जगत को आनंददायक है।।
अहा! त्रिशला माता और बाल तीर्थंकर वर्धमान कुँवर की यह चर्चा कितनी आनंदकारी है!
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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