भगवान महावीर स्वामी (23)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (23)


(पाँचवाँ और चौथा पूर्वभव)

अहा! सुख का सरोवर अपने में पाकर ‘असत’ ऐसे मृगजल की ओर कौन दौड़ेगा? चारित्रदशा का चैतन्य सरोवर प्राप्त करके चक्रवर्ती के विषय-भोगों को छोड़ना, वह कोई बड़ी बात नहीं है। विदेहक्षेत्र में राजचक्रीपन छोड़कर जो मुनि हुए हैं और अब चौथे भव में भरतक्षेत्र में धर्मचक्री-तीर्थंकर होनेवाले हैं - ऐसे वे प्रियमित्र मुनिराज जगत में सर्वप्रिय थे, और सर्वजीवों के हितकारी मित्र थे। 

उत्तम प्रकार से चारित्रपालन करके उन्होंने संल्लेखना पूर्वक शरीर का त्याग किया और उत्तम रत्नत्रय की आराधना करते-करते शेष रह गये किंचित् कषायकरण के महान पुण्यफल का उपभोग करने हेतु सहस्रार नाम के बारहवें सूर्यप्रभ स्वर्ग में देवरूप से उत्पन्न हुए। वहाँ यद्यपि उनको पुण्यजन्य वैभव अपार था, परन्तु अरे! जो कषाय का फल है, उसका कितना वर्णन करें। कषायकलंक के उस फल का विस्तार करने से अथवा उसकी प्रशंसा सुनकर मुमुक्षु जीव लज्जित होते हैं कि अरे! हम अपने चैतन्य की शान्ति को साधने वाले हैं। उसके बीच कषाय तो कलंकरूप है। 

हम तो अपनी शान्ति का विस्तार करके चैतन्यवैभव की पूर्णता करें - यही हमारे लिये इष्ट है। अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है। ऐसी भावना पूर्वक स्वर्ग के अपार तथापि अध्रुव वैभवों में सूर्यप्रभ देव असंख्य वर्ष तक रहे। परन्तु अन्त में तो देवपद भी अध्रुव ही है न! अध्रुव ऐसे रागभावों का फल भी अध्रुव ही होगा न! इसलिये ऐसी देवगति को छोड़कर ध्रुवपद की साधना के ध्येय से वे धर्मात्मा मनुष्यलोक में अवतरित हुए। जिस अवतार में अपने चरित्रनायक महात्मा ने सोलह उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थकर प्रकृति का बंध किया, अब उस अवतार का वर्णन आप पढ़ेंगे।

नन्द राजा (तीसरा पूर्वभव)

(जिनदीक्षा, सोलहकारण भावना और तीर्थंकर नामकर्म; पश्चात् सोलहवें स्वर्ग में)

इस भरतक्षेत्र के पूर्वभाग में श्वेतनगरी है; वहाँ भव्य जीव मोक्षमार्ग की साधना करते हैं; वहाँ के जिनालयों की ऐसी अद्भुत शोभा है कि जिसे देखकर नास्तिक को भी श्रद्धा जागृत हो जाए। स्वर्ग से च्यवकर भगवान महावीर का जीव इसी नगरी के राजा नन्दिवर्धन का पुत्र हुआ; उसका नाम ‘नन्दन’ था (विभिन्न पुराणों के अनुसार ‘नन्दन’ तथा ‘नन्द’ - दोनों नाम स्वीकार किये गये हैं)। एक दिन वन-विहार करते समय श्रुतसागर नाम के एक जैन आचार्य को देखकर उन नन्दराजा को हार्दिक प्रसन्नता हुई और मोक्षमार्ग श्रवण करने की अभिलाषा से उन्होंने पूछा- हे स्वामी! इस संसार समुद्र से छूटकर जीव मोक्षसुख किस प्रकार प्राप्त करता है?

मुनिराज के श्रीमुख से मानो अमृत झरता हो तदनुसार प्रसन्नता पूर्वक बोले - हे भव्य! जब आत्मा भेदज्ञान द्वारा सम्यक्त्वादि शुद्धभावों को प्रकट करता है, तब भवदुःख से छूटकर वह मोक्षसुख प्राप्त करता है।

मुनिराज का उपदेश सुनकर नन्दराज अपना जीवन प्रसन्नतापूर्वक मोक्षसाधना में बिताते थे। उन्हें कोई अशुभ व्यसन तो था नहीं; मात्र एक ही व्यसन था, देव-गुरु-धर्म की उपासना का। धर्म के चिन्तन बिना वे एक दिन तो क्या, एक क्षण भी नहीं रह सकते थे।

महाराजा नन्दिवर्धन ने यद्यपि नन्दकुमार को राज्य का कार्यभार सौंप दिया था; तथापि अब जिनके संसार का किनारा निकट आ चुका है- ऐसे नन्दराजा, ‘सदननिवासी तदपि उदासी’ थे। राज एवं रमणियों के बीच रहने पर भी उनकी चेतना सबसे पृथक् ही रहती थी। निज चेतना के सिवा उन्हें अन्यत्र कहीं सुख की कल्पना नहीं होती थी।

महाराजा नन्दिवर्धन एकबार आकाश में मेघों की क्षणभंगुरता देखकर संसार से विरक्त हुए और पंचमगति-मोक्ष प्राप्त करने के लिये जिनदीक्षा अंगीकार की; पश्चात् ध्यानचक्र द्वारा कर्मों को नष्ट करके केवलज्ञान एवं मोक्ष पद प्राप्त किया।

पिता के वियोग से पुत्र ‘नन्दन’ यद्यपि शोकाकुल हो गया; परन्तु कायर पुरुष ही शोक के आधीन होकर बैठे रहते हैं। बुद्धिमान धीर पुरुष तो शोक को छोड़कर स्वकार्य को संभालते हैं, तदनुसार नन्द राजा ने राज्य का कार्यभार संभाल लिया। राज्य और धर्म दोनों के सहयोगपूर्वक वर्ष बीतते गये। 

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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