भगवान महावीर स्वामी (29)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (29)
जन्म कल्याणक
वैशाली में महावीर-जन्म की मंगल बधाई
आज तो बधाई राजा सिद्धार्थ दरबार जी...
त्रिशलादेवी कुंवर जायो जग का तारनहार जी...
वैशाली में नौबत बाजे देव करें जयकार जी...
भव्यों के इस भाग्योदय से हर्षित सब नरनार जी...
आत्मा को धन्य करने, समकित को उज्ज्वल करने;
बाल-तीर्थंकर दर्शन करने, चलो जाएं वैशाली धाम।
(इस पुस्तक के लेखक ने वीर सं. २५०२ की चैत्र शुक्ला १३ का मंगलवार-दिवस
वीर जन्मधाम वैशाली में आनन्द पूर्वक मनाया था; इस पुराण का कुछ भाग वहीं रहकर लिखा है और वीरप्रभु की रथयात्रा के समय इसकी पाण्डुलिपि को रथ में विराजमान करके उसकी पूजा की है।)
चैत्रशुक्ला त्रयोदशी के मंगल-दिन वैशाली-कुण्डग्राम में भगवान महावीर का अवतार हुआ। उस काल (ईसवी सन पूर्व 598 वर्ष, तारीख 28 मार्च सोमवार को) समस्त ग्रह सर्वोच्च स्थान में थे। ज्योतिषविज्ञान के अनुसार ऐसा उत्तमयोग 10 कोड़ाकोड़ी सागरोपम में 24 बार ही आता है और वीरप्रभु की यह जन्म-कुण्डली उनका बालब्रह्मचारिपने को सूचित करती है।
तीर्थंकर का अवतार होते ही तीनों लोक आश्चर्यकारी आनन्द से खलबला उठे। इन्द्र ऐरावत हाथी लेकर जन्मोत्सव मनाने आ पहुँचा। एक देवपर्याय में असंख्य तीर्थंकरों का जन्माभिषेक करने वाले इन्द्र पुनः-पुनः जन्माभिषेक के अवसर पर किसी नूतन आह्लाद का अनुभव करते हैं। भक्ति भावना से प्रेरित होकर वह सौधर्म इन्द्र स्वयं एक होने पर भी अनेक रूप धारण करके जन्मोत्सव मनाने हेतु तत्पर हुए; जिसप्रकार मोक्ष का साधक आत्मा स्वयं ‘एक’ होने पर भी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र द्वारा अनेक रूपों को धारण करता हुआ मोक्ष साधने को तत्पर होता है।
शची इन्द्राणी के भी हर्ष का पार नहीं है। जिन्हें बाल तीर्थंकर को गोद में लेने की प्रबल उत्कण्ठा है- ऐसी वे इन्द्राणी कुण्डपुरी में प्रवेश करके तुरन्त ‘जिन-मन्दिर’ में गई। (सिद्धार्थ राजा के ‘नद्यावर्त’ नामक राजप्रासाद में ‘द्रव्यजिन’ का अवतार हुआ और वे ‘द्रव्यजिन’ वहीं विराजमान होने से पुराणकारों ने उस राजमहल को भी ‘जिन मन्दिर’ कहा है।)
वहाँ प्रवेश करके बालतीर्थंकर का मुख देखते ही आनन्द से उनका अन्तर नाच उठा - “अहा! देवी पर्याय में सन्तान नहीं होती, परन्तु मुझे तो इन तीर्थंकर समान पुत्र को गोद में लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।” इस प्रकार परम हर्ष पूर्वक उन बालतीर्थंकर के स्पर्श से वे इन्द्राणी चैतन्य की अद्भुतता का अनुभव करने लगी। अहो! प्रभु के स्पर्श से मैं धन्य हो गई।
अब मैं स्त्री पर्याय का छेदन करके मोक्ष प्राप्त करूँगी। ऐसे आत्मिक आह्लाद सहित उन बाल प्रभु को इन्द्र के हाथ में दिया। इन्द्र भी प्रभु का रूप देखकर ऐसे आश्चर्यचकित हुए कि एक साथ हजार नेत्र बनाकर उस रूप को निहारने लगे।
जिस प्रकार मोक्षाभिलाषी जीव अतीन्द्रिय ज्ञान की सर्व किरणों द्वारा आत्मा के अलौकिक रूप का निरीक्षण करता है और महा आनन्दित होता है, उसी प्रकार हरि हजार नेत्रों द्वारा प्रभु के रूप को देखकर अति प्रसन्न हुए। उस समय होने वाली दिव्य पुष्पवृष्टि से ऐसा लग रहा था मानो आकाश में सुन्दर उद्यान खिला हो! परन्तु अरे, उस दिव्य पुष्पोद्यान की अपेक्षा प्रभु के आत्मा में चैतन्य के अद्भुत गुणों का उद्यान खिल रहा था। उसे तो धर्मात्मा ही देख सकते थे और ‘अगन्धभाव’ से उस चैतन्य उद्यान की अपूर्व सुगन्ध लेते थे।
इस प्रकार अद्भुत जिनमहिमा देखकर तथा चैतन्य की अचिन्त्यता को लक्ष्यगत करके अनेक जीव सम्यक्त्व को प्राप्त हुए। सम्यक्त्व के अनुपम प्रकाश से उनका आत्मा जगमगा उठा। प्रभु का जन्म उनके लिये सचमुच कल्याणकारी हुआ। अहो! तीर्थंकरों का अचिन्त्य प्रभाव!
बालतीर्थंकर का रूप निहारने के लिये हजार नेत्र खोलकर इन्द्र ऐसा बतलाना चाहता था कि अरे जीवों ! मेरे यह हजार नेत्र जिनका रूप दर्शन करने के लिये कम लग रहे हैं उन साधक के अन्तर का तो क्या कहना?
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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