भगवान महावीर स्वामी (35)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (35)

माता को आनंदित करके वीरकुमार बोले - “माँ, मेरे मित्र बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनके पास जाता हूँ।”

माँ ने कहा - “अवश्य जाओ, बेटा! सबको आनंद देने के लिये तो तुम्हारा अवतार है।”

माताजी से आज्ञा लेकर वीरकुमार राजगृह में आये। उन्हें देखकर ही देवकुमार तथा राजकुमार हर्षपूर्वक जय-जयकार करने लगे और अनेक प्रकार से उनका सम्मान किया। वर्धमान कुमार ने भी प्रसन्न दृष्टि से सबको देखा और माताजी के साथ हुई आनन्दकारी चर्चा कह सुनायी। यह सुनकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई।

एक राजकुमार बोले - अहा! तीर्थंकर के मित्र होने से अपने को उनके साथ रहने तथा खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो हम सब उनके साथ मोक्ष की साधना भी अवश्य करेंगे। वे दीक्षा ग्रहण करेंगे, तब उनके साथ हम सब भी दीक्षा लेंगे।

यह सुनकर देवकुमारों के मुख पर उदासी छा गई। 

तुम क्यों उदास हो गये, मित्र? 

ऐसा पूछने पर देवकुमारों ने कहा - हे मित्र! तुम तो मनुष्य पर्याय में हो, इसलिए प्रभु के साथ दीक्षा ले सकोगे; परन्तु हम देवपर्याय में होने के कारण प्रभु के साथ दीक्षा नहीं ले सकते, इस विचार से हम खेदित होते हैं।

महावीर बोले - बन्धु देव! सम्यग्दर्शन द्वारा देवपर्याय में भी चैतन्य की आराधना चलती रहती है और ऐसे आराधक जीव मोक्ष के मार्ग में ही चल रहे हैं; जीव को मोक्षमार्ग की प्राप्ति वह अपूर्व महान लाभ है। मोक्षमार्ग में लगा हुआ जीव अल्पकाल में मोक्ष को प्राप्त करेगा, इसमें संशय नहीं है।

महावीर की ऐसी गंभीर वाणी सुनकर सब को हर्ष हुआ और फिर बालतीर्थंकर के साथ सम्यक्त्व सम्बन्धी बहुत चर्चा की। 

अहा! छोटे-से द्रव्यतीर्थ कर के श्रीमुख से वीतरागी मोक्षमार्ग की सुन्दर बातें सुनकर उन कुमारों को जो हार्दिक प्रसन्नता हुई, उसका क्या कहना? ढाई हजार वर्ष पूर्व का यह प्रसंग आज भी हमें उतना ही आनन्द देता है, तो उस प्रसंग को प्रत्यक्ष देखने वाले जीवों के महान आनन्द का क्या कहना! कितने ही कुमार उस समय सम्यक्त्व को प्राप्त हुए। साथ ही पाठकों को यह जानकर आनन्द होगा कि वीर कुंवर की बातें मनुष्यों की भाँति हाथी, घोड़े और बन्दर भी प्रेम से सुनते थे और प्रसन्न होते थे।

बाल महावीर अपने बालमित्रों के साथ ऐसी चर्चा भी करते थे और बालसुलभ क्रीड़ाएँ भी; परन्तु उस समय वे मात्र क्रीड़ाओं में ही नहीं वर्तते थे, उन बाल महात्मा की चेतना उस समय भी अन्तर में अतीन्द्रिय ज्ञानक्रीड़ा करती थी। कई बार वे चैतन्यभवन में जाकर निर्विकल्प ध्यान कर लेते थे। उनके अंतरंग ज्ञान जीवन का आनंद अनुपम था। एक बार वीरकुमार अपने मित्रों के साथ चर्चा-विनोद कर रहे थे, इतने में अचानक एक आश्चर्यजनक घटना हुई। क्या हुआ? वह अगले प्रकरण में पढ़ेंगे।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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