भगवान महावीर स्वामी (36)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (36)बालवीर की महा-वीरता
जीत लिया मिथ्यात्व-विष, सम्यक् मंत्र प्रभाव।
नाग लगा फुफकारने, प्रभु को समता भाव।।
जहाँ इन्द्रियातीत भाव है, वहाँ नाग क्या करता?
रूप बदलकर बना देव वह, नमन वीर को करता।।
फूँ.... फूँ.... करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुँफकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर सब राजकुमार इधर-उधर भागने लगे; क्योंकि उन बालकों ने पहले कभी ऐसा भयंकर सर्प नहीं देखा था। परंतु महावीर न तो भयभीत हुए और न भागे।
अहिंसा के अवतार महावीर को मारनेवाला कौन है? वे तो निर्भयता से सर्प की चेष्टाएँ देखते रहे। जैसे मदारी साँप का खेल कर रहा हो और हम देख रहे हों, तदनुसार वर्धमान कुमार उसे देख रहे थे।
शांतचित्त से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि वाह! यह वर्धमान कुमार आयु में छोटे होने पर भी महान हैं, वीर हैं। उसने उन्हें डराने के लिये अनेक प्रयत्न किये, बहुत फुँफकारा.... परंतु वीर तो अडिग रहे, वे निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसकी ओर जाने लगे।
दूर खड़े राजकुमार यह देखकर घबराने लगे कि अब क्या होगा? सर्प को भगाने के लिये क्या किया जाये? वे उसके सोच-विचार में पड़ गये। इतने में लोग क्या देखते हैं कि वह भयंकर सर्प अपने आप अदृश्य हो गया! उसके स्थान पर एक तेजस्वी देव खड़ा है और हाथ जोड़कर वर्धमानकुमार की स्तुति करते हुए कह रहा है कि -
हे देव! आप सचमुच ‘महावीर’ हैं। आपके अतुल बल की प्रशंसा स्वर्ग के इन्द्र भी करते हैं। मैं स्वर्ग का देव हूँ। मैंने अज्ञानभाव से आपके बल और धैर्य में शंका की; मैं नाग का रूप धारण करके आपकी परीक्षा ले रहा था; मुझे क्षमा कर दें। तीर्थंकरों की दिव्यता वास्तव में अद्भुत है। प्रभो! आप वीर नहीं, अपितु ‘महावीर’ हैं।
महावीर कुमार तो देव की बात गंभीरता से सुन रहे थे; परन्तु हम उस देव को उत्तर देंगे कि- अरे देव! तू तो परीक्षा करने के लिये सर्प का रूप धारण करके आया था; परन्तु कदाचित् सच्चा सर्प भी आया होता, तो क्या था? वह सर्प भी महावीर के सान्निध्य में निर्विष हो जाता। जिनकी शांत दृष्टि के समक्ष मिथ्यात्व का विष भी टिक नहीं सकता, उन भगवान की दृष्टि पड़ने से सर्प भी निर्विष हो जाए, इसमें क्या आश्चर्य है! सम्पूर्ण कषायों को जीतने वाले वीर क्या एक सर्प से डर जाएंगे? कदापि नहीं। महावीर की वीरता किन्हीं बाह्य शत्रुओं को जीतने के लिये नहीं है, किन्तु वह तो अंतरंग कषाय-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाली वीतरागी वीरता है। उन वीर की वीतरागता के सान्निध्य में विषैले सर्प भी अहिंसक बन जाएंगे और मिथ्यात्व-विष को छोड़कर सम्यक्त्व-अमृत का पान करेंगे।
अंतर एवं बाह्य में वृद्धिगत होते-होते राजकुमार महावीर जब आठ वर्ष के हुए, तब एक बार अत्यन्त विशुद्धि से अंतर में चैतन्य धाम में एकाग्रता की धुन लगाने से निर्विकल्प ध्यान का महाआनन्द प्रकट हुआ और प्रभु ‘चतुर्थ गुणस्थान से पंचम गुणस्थान’ में पहुँचे। आठ वर्ष की आयु में ‘शुद्ध उपयोग’ की वृद्धिपूर्वक प्रभु ने पंच अणुव्रत धारण किये। प्रभु श्रावक हो गये। यद्यपि उनका जीवन तो पहले से ही अहिंसादि रूप था, परन्तु आठवें वर्ष में बालक वर्धमान के चौथे से पाँचवे गुणस्थान में आने पर अप्रत्याख्यान सम्बन्धी चारों कषायें नष्ट हो गई और आत्मिक आनन्द की वृद्धि हुई; कषायों को जीतने की वीरता में वीर प्रभु एक डग आगे बढ़े।
तत्पश्चात् बाल तीर्थंकर की वीतरागी वीरता की एक अन्य घटना हुई, जिसका आनन्ददायक वर्णन आप आगे पढ़ेंगे।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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