तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39)
सन्मतिनाथ(संजय और विजय मुनिवरों का प्रसंग)
तीर्थंकर वर्धमान जब बाल्यावस्था में थे, उस काल में पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; उस शासन में संजय और विजय नाम के दो मुनि विचर रहे थे; रत्नत्रयवन्त वे मुनिवर आकाशगामी थे। स्वानुभूति की चर्चा करते-करते वे सिद्ध क्षेत्र की यात्रा हेतु सम्मेद शिखर तीर्थ भूमि में पधारे और वहाँ अनन्त सिद्धों का स्मरण करके आत्मध्यान किया। पश्चात् संजय मुनि बोले- अहा! स्वानुभूति में आत्मा स्पष्ट ज्ञात होता है। वहाँ मतिश्रुतज्ञान होने पर भी वे अतीन्द्रिय भाव से काम करते हैं। इसलिए स्वसंवेदन ये प्रत्यक्षपना है। उसमें कोई संदेह नहीं रहता।
तब विजय मुनि ने कहा - “हे मुनिराज! आपकी बात सत्य है। परंतु मतिश्रुतज्ञान के निर्बल होने से किसी सूक्ष्म ज्ञेयों में संदेह भी बना रहता है। देखो न! सूक्ष्म अगुरुलघुत्वजनित षट्गुण वृद्धिहानि के किसी गंभीर स्वरूप का हल अभी हमें़ नहीं मिलता और सूक्ष्म-शल्य रहा ही करती है। पार्श्वनाथ भगवान तो मोक्ष पधार गए; वर्धमान तीर्थंकर अभी बाल्यावस्था में हैं। किन्हीं केवली या श्रुतकेवली के दर्शन से ही हमारी इस सूक्ष्म शंका का समाधान हो सकेगा।”
इस प्रकार सूक्ष्म शल्य सहित विचरते हुए वे मुनिवर सम्मेद शिखर तीर्थ की यात्रा करके लौटते समय वैशाली-कुंडपुर में सिद्धार्थ महाराज के राजप्रासाद के ऊपर से जा रहे थे और सोच रहे थे कि अहा! यह एक तीर्थंकर की जन्मभूमि है; भारत के अंतिम तीर्थंकर इस नगरी में विराज रहे हैं।
ऐसी महिमा करते करते उनकी आत्मा में कोई आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा। अंतर की गहराई में रही हुई सूक्ष्म शल्य न जाने कहाँ चली गई। शल्यरहित, निशल्य हो जाने से उन मुनिवरों की आत्मा प्रफुल्लित हो उठी।
अचानक यह क्या हुआ? वह देखने के लिए चलें, त्रिशला माता के भवन में।
उस समय राजप्रासाद के झरोखे में वर्द्धमान कुमार त्रिशला माता के साथ बैठे थे। जैसे चैतन्य की स्वानुभूति द्वारा जिनवाणी माता सुशोभित होती है, वैसे ही वीर कुँवर द्वारा विशाल माता शोभायमान हो रही थीं।
माता-पुत्र के वात्सल्य का अद्वितीय दृश्य देख कर देखने वालों के हृदय में स्नेह उमड़ता था। बाल प्रभु महान स्वानुभूति की दिव्यता और साथ ही तीर्थंकरत्व की सातिशयता से सुशोभित हो रहे थे। निःशंकता, प्रभावना आदि आठ गुणों से वे अलंकृत थे।
संजय और विजय मुनिराज जब आकाश मार्ग से गमन करते हुए राजप्रासाद के ऊपर आए तब अचानक ही उनकी दृष्टि वर्द्धमान कुँवर पर पड़ी। बालतीर्थंकर को देखकर वे आश्चर्य में पड़ गए। क्षणभर के लिए वे थम गए और उनकी महिमा का विचार करने लगे।
उतने में सातिशय जिनमहिमा के प्रताप से उनका मति-ज्ञान उज्ज्वल हुआ और सूक्ष्म शंकाओं का भी समाधान हो जाने से वे निःशल्य हो गए।
इस प्रकार वीरनाथ प्रभु उनकी मति की उज्ज्वलता के कारण बने। इसलिए मुनिवरों ने प्रसन्नचित्त से उनको ‘सन्मतिनाथ’ नाम से सम्बोधित किया।
वाह! वीर-वर्द्धमान-महावीर-सन्मतिनाथ! आपका एक मंगल-नामकरण इन्द्र ने, दूसरा माता-पिता ने, तीसरा देव ने और चौथा मुनिवरों ने किया। तीन उत्तम ज्ञान तथा चार उत्तम नामों को धारण करने वाले आप त्रि-जगत को रत्नत्रय का इष्ट उपदेश देकर कल्याण करने वाले हो; आपकी जय हो।
मुनिवरों ने प्रभु को ‘सन्मतिनाथ’ विशेषण से अलंकृत किया, जिससे प्रसन्न होकर नगरजनों ने उत्सव किया; देवों ने आकाश में बाजे बजाकर आनन्द मनाया; ‘अहो सन्मतिनाथ! आप हमें अपूर्व सम्यक् मति के दाता हो, आपकी पहचान से हमारी मति सम्यक् हुई है और उसके द्वारा चैतन्यतत्त्व प्राप्त करके हम आपके मार्ग की साधना कर रहे हैं।
सबको सन्मतिदाता सन्मतिनाथ की जय हो!
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद

Comments
Post a Comment