भगवान महावीर स्वामी (41)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (41)
एक सभाजन ने आतुरता से पूछा - प्रभो! ‘आत्मा अनन्तशक्ति सम्पन्न है’, तो उसमें कैसी-कैसी शक्तियाँ हैं, वह आपके श्रीमुख से सुनने की उत्कण्ठा है।
उसके उत्तर में मोक्षसाधक युवराज महावीर ने चैतन्य स्वरूप आत्मा की अनन्त शक्तियों का अद्भुत, परम अध्यात्मरस पूरित वर्णन किया -
अभेदरूप ज्ञानलक्षण द्वारा लक्षित करके ज्ञायक का अनुभव करने पर जीवत्व, चेतन, सुख, वीर्य, प्रभुता, विभुता, स्वसंवेदनता आदि अनन्त चैतन्य शक्तिरूप से आत्मा एक साथ वेदन अर्थात् अनुभव में आता है। अहो, जिसकी प्रत्येक शक्ति की महत्ता अपार है, ऐसी अनन्त शक्तियाँ, वे भी रागरहित शुद्ध परिणमन युक्त ऐसी अगाध शक्तिवान आत्मा की अद्भुत महिमा एक भावी तीर्थंकर के श्रीमुख से साक्षात सुनकर अनेक भव्यजीव उस चैतन्यमहिमा में इतने गहरे उतर गये कि तत्क्षण ही महा आनन्द सहित निर्विकल्प आत्मानुभूति को प्राप्त हुए और अनन्त शक्तियों का स्वाद एक साथ स्वानुभूति में चख लिया।
सहजानन्द स्वरूप अनंत शक्तिसंपन्न चैतन्य चित् चमत्कार चिंतामणि भगवान की जय!
वाह! आत्मा के अपार वैभव का मधुर वर्णन सुनकर सभाजन शांत रस में निमग्न हो गये। वे आज की धर्म चर्चा में इतने तन्मय हो गये कि किसी को उठने का मन नहीं होता था।
अहा, एक तो अति सुन्दर आत्मतत्त्व की चर्चा और वह भी तीर्थंकर के श्री मुख से सुनकर किसे आनंद नहीं होगा? सबको ऐसा लगा कि अहा! अभी तो चौथा काल धर्मयुक्त वर्त रहा है और अंतिम तीर्थंकर की आत्मा हमारे समक्ष साक्षात् विराज रही है।
जगत के जीवों को तो उनकी दिव्यध्वनि/उपदेश उन्हें केवल ज्ञान होने पर सुनने को मिलेगा, जब कि हमें वैशाली गणतंत्र के प्रजाजनों को तो वर्तमान में ही उनके श्रीमुख से धर्म श्रवण का महाभाग्य प्राप्त हुआ है, तथा उनके प्रताप से अनेक जीव धर्म प्राप्त कर रहे हैं।
इस प्रकार वीर कुंवर की प्रशस्ति एवं जय जयकार पूर्वक सभा समाप्त हुई।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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