भगवान महावीर स्वामी (42)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (42)
भगवान महावीर : वैराग्य और दीक्षा
(मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी)
वीरकुमार चैतन्य-उद्यान की प्रशंसा कर रहे थे। इतने में एक कुमार ने सुन्दर पुष्प लाकर आदर सहित वीरकुमार के चरणों में रख दिया। सब लोग आनन्दपूर्वक उसे देख रहे थे।
तब वीरकुमार ने गम्भीरता से कहा - बन्धु! यह पुष्प वृक्ष की डाल पर जैसी शोभा दे रहा था, वैसी अब नहीं दे रहा। उस की शोभा नष्ट हो गई है। वह माता से बिछुड़े बालक की भांति मुरझा रहा है। पुष्प को उसकी डाली से पृथक् करना तो वृक्ष और पुष्प दोनों की सुन्दरता को नष्ट कर देना है। देखो! यह कैसा शोकमग्न दिखाई दे रहा है। अपनी प्रसन्नता के लिए हम दूसरे जीवों का सौन्दर्य नष्ट कर दें, वह क्या उचित लगता है? दूसरों को कष्ट दिये बिना हम आनन्द प्रमोद करें, वही उचित है।
इस प्रकार सहज रूप से अहिंसादि की प्रेरणा करके वीरकुमार वीतरागता फैला रहे थे। धन्य उनका जीवन! गृहवास में भी धर्मात्मा राजपुत्र का जीवन अलौकिक था। वे गृहवासी भगवान बार-बार सामायिक का प्रयोग
भी करते थे। सामायिक की स्थिति में वे इस प्रकार मन की एकाग्रतापूर्वक धर्मध्यान रूप आत्मचिंतन करते थे, मानो एकान्त में कोई मुनिराज विराज रहे हों। उस में वे राग-द्वेष से परे समभावरूप वीतराग परिणति का विशेष आनन्द अनुभव करते थे।
दूसरी ओर त्रिशला माता भी पुत्र के मुख से आत्मवैभव की बातें सुन-सुनकर हर्षविभोर हो जाती और कहती -
“बेटा, तू सचमुच पहले से ही इस राजभवन में रह कर भी परमात्मा की भाँति अलिप्त रहता था। तेरी ज्ञानचेतना तुझ में ही भीतर-भीतर कोई परमात्म लीला करती रहती थी... वह हम बहुत दिनों से देख रहे थे... अब तो कुछ समय पश्चात सारा जगत भी तुम्हारी ज्ञानचेतना की अद्भुत परमात्म लीला देखकर धन्य होगा।”
“धन्य माता! तुम्हारी ज्ञानचेतना की प्रतीति यथार्थ है। तुम स्वयं ज्ञानचेतना के मधुर आनन्द का आस्वादन करने वाली हो। मैं इस भव में, तो तुम उस भव में... अवश्य मोक्ष साधने वाली हो।”
“बेटा, तुम्हारी वीरता भरी मीठी-मीठी बातों से मैं मुग्ध हो जाती हूँ... ऐसा लगता है कि तुम्हारी बातें सुनती ही रहूँ! किन्तु रह-रहकर मन में ममता की लहर आ जाती है कि तुम सचमुच यह सब छोड़कर चले जाओगे? ... फिर मुझे ‘माँ’ कहकर कौन बुलाएगा? यह राजभवन और वैभव सब तेरे बिना सूने-सूने लगेंगे।”
“सुने माँ! यह सब मोह-ममता है। मैं तीस वर्ष तक इस राजपाट और हीरे-जवाहरात की सुख-समृद्धि में रहा, परन्तु मुझे इनमें कहीं चेतनता दिखाई नहीं दी। इन अचेतन पदार्थों में मैंने कहीं सुख या चैतन्य की चमक
नहीं देखी और हे माता! यह सब छोड़कर मैं कहीं दुःखी होने वाला तो नहीं हूँ, अपितु इनमें रहकर जो सुख मैं भोगता हूँ, उसकी अपेक्षा कोई विशेष सुख मुझे प्राप्त होनेवाला है और तुम देखना कि तुम्हारे इन अचेतन हीरों की अपेक्षा कोई अपूर्व-अमूल्य-महान-त्रिलोक-प्रकाशी चैतन्यरत्न लेकर कुछ ही समय पश्चात् मैं परमात्मा बनकर वैशाली में आऊँगा।
वीरकुमार की बातें सुनकर त्रिशला माता को हार्दिक प्रसन्नता होती थी कि अरे! इस समय भी मेरे पुत्र का ज्ञान कितना विकसित है! उसकी चैतन्यरसयुक्त वाणी मन भरकर सुन लूँ- ऐसा सोचकर माता-पुत्र ने हृदय खोलकर आत्म-साधना के विषय में अनेक प्रकार की चर्चाएँ कीं।
अरे! राजभवन में रहने वाले राज-सेवक भी उनके श्रीमुख से झरती वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे और किसी-किसी को स्वानुभव भी हो जाता था। इस प्रकार द्रव्य तीर्थंकर के प्रताप से चारों ओर धर्मप्रभावना हो रही थी और भावी तीर्थंकर होने का दिन भी निकट आता जा रहा था। दो कल्याणकों के बाद अब तीसरे कल्याणक की तैयारी होने लगी थी।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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