भगवान महावीर स्वामी (43)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (43)
आज पूरी रात राजकुमार वर्द्धमान चैतन्य की अनोखी धुन में थे; निद्रा का तो नाम ही नहीं था। उपयोग बार-बार चैतन्य की अनुभूति में स्थिर हो जाता था। परभावों से थक कर विमुख हुआ उनका उपयोग अब आनन्दमय निजघर में ही सम्पूर्ण रूप से स्थिर रहना चाहता था। तीस वर्ष के राजकुमार का चित्त आज अचानक ही संसार से विरक्त हो गया है; मोक्षार्थी जीव प्रशम हेतु किसी बाह्य कारणों को नहीं ढूँढ़ता। प्रशम तो उसके अन्तर से स्वयमेव स्फुरित होता है।
आज प्रातःकाल महावीर ने सिद्धों का स्मरण करके आत्मा का ध्यान किया। आज उनके वैराग्य की धारा कोई अप्रतिम थी। विशुद्धता में वृद्धि हो रही है। उपयोग क्षणभर में अन्तर्मुख निर्विकल्प हो जाता है और पुनः बाहर आ जाता है, परन्तु बाहर में उसे चैन नहीं पड़ता। वह सर्वत्र से छूटकर, विभावरूप परदेश से लौटकर स्वभाव रूप स्वदेश में स्थिर रहना चाहता है।
बारम्बार ऐसी दशा में झूलते हुए प्रभु के मतिज्ञान में सहसा कोई विशिष्ट निर्मलता झलक उठी, उनको जातिस्मरण हुआ। स्वर्गलोक के दिव्य दृश्य देखे, चक्रवर्ती का वैभव देखा, सिंह देखा, सम्यक्त्व का बोध देते हुए मुनिवर देखे; उससे पूर्व की नरकगति भी देखी। इस प्रकार अनेक पूर्वभव देखकर तुरन्त वीरप्रभु का चित्त संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा लेने हेतु उद्यत हुआ।
अरे! कहाँ वे नरक के घोर दुःख और कहाँ स्वानुभूति का सुख! कहाँ वे सिंह पर्याय में हिंसा और क्रूरता के रौद्र परिणाम और कहाँ सम्यक्त्व की शान्ति! दोनों में अटूट रहने वाला एक महान ज्ञायकभाव मैं हूँ - ऐसे अपने एकत्व का चिन्तन करते हुए वे बारम्बार निर्विकल्प हो जाते थे। बारम्बार इतनी अधिक निर्मलता एवं निर्विकल्पता होती थी कि बस, अब शुद्धोपयोगी मुनिदशा के बिना यह जीव रह नहीं सकेगा। इस प्रकार महावीर ने अपने मन में दीक्षा का निर्णय किया।
महावीर का निर्णय अर्थात वज्र-निर्णय.... महावीर का निर्णय अर्थात अचल निर्णय.... भगवान ने दीक्षा ग्रहण का दृढ़ निर्णय किया और परम विरक्त चित्त से एकबार निर्विकल्प अनुभूति में लीन हो गये।
राजकुमार सिंहासन पर बैठे हैं। चैतन्य की गंभीरता में ऐसे लीन हैं कि दुनिया का लक्ष ही नहीं रहा। अरे! त्रिशला माता आकर सामने खड़ी हैं, उनका भी उन्हें लक्ष नहीं है। माता तो देखती ही रह गई कि वाह! मेरा पुत्र कैसी अद्भुत वैराग्यमुद्रा में सुशोभित हो रहा है। अहा, इसकी शान्त वैराग्यमुद्रा देखकर मुझे अनुपम आनन्द होता है, मानो देखती ही रहूँ।
इस प्रकार त्रिशला माता के हृदय में अत्यन्त स्नेह उमड़ रहा है और वे मन-ही-मन पुत्र को आशीर्वाद दे रही हैं। सचमुच आशीर्वाद दे रही हैं या आशीर्वाद के बहाने उनकी भक्ति कर रही हैं? यह तो वे ही जानें।
थोड़ी देर में महावीर ने नेत्र खोले तो देखा कि सामने माताजी खड़ी हैं। माता को देखकर उनकी वैराग्यमुद्रा किंचित मुस्करा उठी। माता ने स्नेह से पूछा - बेटा वर्धमान! आज तुम इतने विचारमग्न क्यों हो?
तब वीर के मुख से गंभीर वाणी निकली - हे माता! आज प्रातःकाल जातिस्मरण में मैंने अपने पूर्वभव देखे; अब मेरा चित्त सर्वत्र से विरक्त हुआ है, इसलिए आज ही इस असार संसार को छोड़कर मैं मुनिदीक्षा अंगीकार करूँगा और शुद्धोपयोग द्वारा परमात्मा को साधूँगा।
अभी तो राजकुमार के मुख से दीक्षा लेने के उद्गार निकले ही थे कि उधर इन्द्रसभा में खलबली हुई; इन्द्र का इन्द्रासन डोल उठा; प्रभु के दीक्षाकल्याणक का अवसर जानकर देवगण वैशाली में आ पहुँचे। लौकान्तिक देवों ने आकर प्रभु की स्तुति की; वैराग्यभावना में निमग्न प्रभु ने दृष्टि उठाकर लौकान्तिक देवों की ओर देखा। उस समतारस झरते दृष्टिपात से देवगण अत्यन्त प्रमुदित हुए। एक ओर वैरागी तीर्थंकर तो दूसरी ओर वैरागी लौकान्तिक देव! अहा, वैराग्यवान उत्तम साधकों का वह मिलन चैतन्य की परम गंभीर शान्ति से युक्त था। उस मिलन से परस्पर दोनों के वैराग्य की पुष्टि हुई।
प्रजाजन यह सब बड़े आश्चर्य से देख रहे थे। देवेन्द्रों ने प्रभु का दीक्षाकल्याणक मनाने हेतु प्रथम उनका दैवी श्वेतवस्त्रों से शृंगार किया। प्रभु का वह वस्त्रधारण करना अब अंतिम था; अब वे पुनः कभी कोई वस्त्र धारण नहीं करेंगे। एक ओर देवों का शृंगाररस तो दूसरी ओर वैरागी प्रभु का शांतरस; उत्कृष्ट शृंगार एवं उत्कृष्ट वैराग्य में मानो प्रतियोगिता हो रही थी। अंत में शृंगाररस की पराजय और वैराग्यरस की विजय हुई। प्रभु तो रागमय वस्त्रादि शृंगार का परित्याग करने तथा वीतरागी शांतरस को अंगीकार करने हेतु वन में जाने को खड़े हो गये और उत्तम वैराग्यभावनाओं के चिन्तनपूर्वक ‘चन्द्रप्रभा’ नाम की शिविका में आरूढ़ हुए।
(यहाँ देवगति की अपेक्षा मनुष्यगति का तथा चारित्रदशा का महत्व बतलाने के लिये कोई कथाकार अलंकार से कहता है कि दीक्षा के अवसर पर प्रभु की पालकी उठाने हेतु देवों और मनुष्यों के बीच विवाद खड़ा हुआ कि पहले पालकी कौन उठाये?)
देव बोले - हम स्वर्ग से प्रभु का दीक्षाकल्याणक मनाने आये हैं, इसलिए पहले हम पालकी उठायेंगे। जिस प्रकार जन्म कल्याणक के लिये हम प्रभु को मेरुपर्वत पर ले गये थे, उसी प्रकार दीक्षा के लिये वन में भी हम ले जायेंगे।
तब मनुष्यों की ओर से राजाओं ने कहा - अरे देवों! हम मेरुपर्वत पर नहीं आ सके थे, किन्तु इस चरित्र के प्रसंग में तो हमारा ही अधिकार बनता है, क्योंकि प्रभु हमारे मनुष्यलोक के हैं, इसलिए प्रभु की चारित्रदशा के अवसर पर तो हम ही पालकी उठायेंगे। चारित्र में देवों का अधिकार नहीं है।
अन्त में इन्द्र ने झिझकते हुए प्रभु की ओर देखा कि इस विवाद में वे ही कोई मार्ग निकालें, ताकि देवों को भी कुछ अधिकार प्राप्त हो।
प्रभु बोले - चारित्र में जो मुझे साथ दे सके, जो मेरे साथ चारित्रदशा अंगीकार कर सके, वे पहले सात डग पालकी उठायें.... और फिर दूसरे....।
बस, हो गया निर्णय! यह बात सुनते ही इन्द्र निस्तेज हो गया; उसे अपना इन्द्र पद तुच्छ लगा और पुकार कर कहने लगा कि अरे! कोई मेरा यह स्वर्ग का साम्राज्य लेकर बदले में एक क्षणभर का चारित्र दे दो।
देखो, चारित्रदशा की महिमा! हे सौधर्मदेव! तेरे पास भले ही इन्द्र पद हो, परन्तु वह देकर भी एक क्षणभर का चारित्र तुझे नहीं मिल सकता। चारित्रदशा तो मनुष्यभव में ही प्राप्त होती है, उसकी महिमा इन्द्र पद से अधिक है।
इस अलंकार कथन द्वारा पुराणकार ऐसा प्रगट करते हैं कि देवलोक की दिव्यता की अपेक्षा मनुष्यलोक का संयम महान है, उस संयम के समक्ष इन्द्र को भी नतमस्तक होना पड़ता है।
तथा मनुष्यों में भी, विद्याधर-मनुष्यों में तीर्थंकर उत्पन्न नहीं होते; भूमिगोचरी मनुष्यों में ही तीर्थंकर पैदा होते हैं, इसलिए प्रभु की पालकी उठाने का प्रथम अधिकार भूमिगोचरी राजाओं का ही है।
इस प्रकार पहले राजा पालकी उठाकर सात डग भूमि पर चले, फिर सात डग तक विद्याधर राजा चले और तत्पश्चात देव पालकी उठाकर आकाशमार्ग से चलने लगे। हजारों-लाखों नर-नारी वैराग्य भावना पाते हुए प्रभु के साथ वन की ओर चले।
गंगा नदी के पश्चिमी तट पर (पटना शहर के सामने वाले किनारे) वैशाली-कुण्डग्राम के ‘नागखण्ड’ नामक उपवन में शिविका से उतरकर प्रभु महावीर एक स्फटिक शिला पर विराजे। उत्तरमुख विराजमान वर्धमान कुमार ने ‘नमः सिद्धेभ्यः’ कहकर प्रथम सिद्धों को नमस्कार किया। इस प्रकार देहातीत सिद्धों को निकट लाकर प्रभु ने देह के आभूषण उतारे, वस्त्र भी एक-एक करके उतार दिए और सर्वथा दिगम्बर दशा धारण की। वर्धमान कुमार जितने दैवी वस्त्रों में शोभते थे, उसकी अपेक्षा दिगम्बर दशा में मुनिराज महावीर अधिक सुशोभित होने लगे। रत्नत्रय द्वारा प्रभु सुशोभित हो उठे और प्रभु के आश्रय से रत्नत्रय से शोभायमान हो गये। अरे, किन्तु प्रभु और रत्नत्रय भिन्न कहाँ थे जो कि एक-दूसरे से सुशोभित होते? प्रभु स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित थे। भेदभाव का विलय हो... अभेद आत्मानुभूति में लीनता हो!
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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