भगवान महावीर स्वामी (45)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (45)

कोई जीव जिस वस्तु का त्याग करे, उस से ऊँची वस्तु का ग्रहण करना यदि उसे आता हो, तभी वह उसका सच्चा त्याग कर सकता है। पुण्यराग का सच्चा त्याग वही कर सकता है जिसे वीतरागभाव ग्रहण करना आता हो।

त्याग लाभदायक होना चाहिए, हानिकारक नहीं।

जीव जो त्यागे उसकी अपेक्षा उच्च वस्तु, उच्च भाव प्राप्त करे, तभी उसका वह त्याग लाभदायी कहा जाएगा। भगवान महावीर का त्याग ऐसा था कि उन्होंने जिन हेयतत्त्वों को छोड़ा, उनसे विशेष उपादेय तत्वों को ग्रहण किया। उनकी शुद्धता की श्रेणी का क्या कहना, जब वे निर्विकल्पता के महान् आनन्द में डूबते थे, तब उनके शुद्धोपयोग की प्रचण्डता देखकर बेचारी शेष चार संज्वलन कषाय भी इस प्रकार चुपचाप होकर छिप जाती थीं, कि कषाय जीवित है या मृत- यह जानना भी कठिन लगता था, क्योंकि उस समय उनकी कोई प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती थी।

इस प्रकार एक ओर प्रभु महावीर कषायों को जीत रहे थे, तब दूसरी ओर त्रिशला माता भी वीर के वीतराग चारित्र का अनुमोदन करके अपने मोहबन्धन को ढीला कर रही थीं। 

‘अरे रे! राजभवन में जिसका लालन-पालन हुआ है, ऐसा मेरा पुत्र वन-जंगल में कैसे रहेगा और शीत-उष्णता कैसे सहन करेगा?’ - ऐसी शंका वे नहीं करती थीं। वे जानती थीं कि आत्मसाधना में उनका पुत्र कैसा वीर है, और यह भी अनुभव था कि चैतन्य के आनन्द की लीनता में बाहर का लक्ष्य ही नहीं रहता। जहाँ शरीर का ममत्व नहीं रहता वहाँ शीत-उष्णता के उपसर्ग कैसे? अस्पर्शी चैतन्य के वेदन में जड़ के स्पर्श का प्रभाव कैसा?

अहा! ऐसे अतिन्द्रिय चैतन्यतत्त्व को जानने वाली माता क्या आत्मसाधना में आगे बढ़ते हुए पुत्र को देखकर मूर्छित होंगी? नहीं, कदापि नहीं। अपने लाड़ले पुत्र को मोहपाश तोड़कर मुनिदशा में मग्न देखकर वे आनन्दित हुईं और जब उसे केवलज्ञानी-अरिहन्त-परमात्मारूप में देखेंगी, तब तो अति आनन्दित होंगी। 

धन्य माता! तुम तो परमात्मा की माता हो!

बिना वर्द्धमान के वैशाली के राजप्रासाद सूने हो गये थे। बाह्य वैभव ज्यों के त्यों होने पर भी सुख रहित, बिल्कुल निस्तेज लगते थे। मानो वे पुद्गल पिण्ड जगत से कह रहे थे कि देखो, हममें सुख नहीं है; इसीलिए तो वीर कुमार हमें छोड़कर तपोवन में चले गये और वैराग्य में लीन हो गये। परम वैराग्य जिसका प्रवेशद्वार है, ऐसा चैतन्य का आनन्द-उद्यान सज्जन-सन्तों को अत्यन्त प्रिय है;धर्मात्मा उसमें क्रीड़ा करते हैं; पंच परमेष्ठियों का वहाँ निवास है। शुद्धोपयोग का अमोघ चक्र लेकर वीरनाथ ने ज्यों ही ऐसे तपोवन में प्रवेश किया, त्यों ही मोह लुटेरा भयभीत होकर भाग गया। निजवैभव की सेना सहित वीर योद्धा के आगमन से तपोवन सुशोभित हो उठा; सर्व गुणरूपी वृक्ष अपने-अपने मिष्ट फलों से भर गये; अत्यन्त सुन्दर एवं परम शांत उस चैतन्य-नन्दनवन के एकान्त स्थान में (एकत्व चैतन्यधाम में) प्रभु महा आनन्द अनुभवते थे - 

ऐसा अद्भुत था वीर प्रभु का वनवास!

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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