भगवान महावीर स्वामी (46)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (46)
भगवान महावीर : मुनिदशा में आत्मसाधना
मुनि होकर आत्मा की निर्विकल्प आनन्द दशा में झूलते-झूलते भगवान ने साढ़े बारह वर्ष तक मौन रहकर आत्मसाधना की। मात्र अपने एक स्वभाव में ही अग्र तथा अन्य समस्त द्रव्यों से अत्यन्त निरपेक्ष - ऐसी आत्मसाधना करते-करते महावीर प्रभु मोक्षमार्ग में विचर रहे हैं, और बोले बिना भी वीतराग मोक्षमार्ग का अर्थबोध करा रहे हैं। दीक्षा के पश्चात् दो दिन के उपवास हुए और तीसरे दिन कुलपाक नगरी के राजा ने भक्ति पूर्वक आहारदान देकर वीरनाथ मुनिराज को पारणा कराया। आहारदान के प्रभाव से वहाँ देवों ने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये।
अहा! तीर्थंकर की आत्मा जैसा सर्वोत्तम आश्चर्य जहाँ विद्यमान हो, वहाँ जगत के अन्य छोटे-मोटे आश्चर्य आयें, वह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतः मोक्ष की साधना में ही जिनका चित्त लगा है, ऐसे उन महात्मा को वे पाँच आश्चर्यकारी घटनाएँ किंचित आश्चर्यचकित नहीं कर सकीं।
अहा! आश्चर्यकारी चैतन्यतत्त्व की साधना में लीन मुमुक्षु को जगत की कौन-सी वस्तु आश्चर्य में डाल सकेगी; उन मोक्षसाधक महात्मा का कितना वर्णन करें।
हे भव्यजन! संक्षेप में समझ लो कि मोक्षसाधना हेतु जितने भी गुण आवश्यक हैं, उन सर्वगुणों का वहाँ संग्रह था और मोक्षसाधना में जो विघ्न करने वाले जितने भी दोष हैं, उन समस्त दोषों को प्रभु ने छोड़ दिया था।
धन्य है प्रभु की मोक्ष साधना! उनकी साधना ऐसी उत्तम थी मानो वे स्वयं ही मोक्षतत्त्व थे।
उज्जयिनी में रुद्र का उपसर्ग और ‘अतिवीर’ नाम द्वारा स्तुति
अहा! अनेक लब्धियाँ प्रगट होने पर भी, प्रतिक्षण आत्मानुभूति द्वारा अनन्त आत्मलब्धियों का साक्षात्कार करते हुए, उन वीतरागी साधक का अन्य किन्हीं लब्धियों के प्रति लक्ष्य ही नहीं था। विचरते-विचरते वे योगिराज उज्जयिनी नगरी में पधारे और क्षिप्रावती नदी के किनारे ‘अतिमुक्तक’ नाम के भयानक श्मशान में ध्यान लगाकर खड़े हो गये। परमशान्त... अडोल... अहा! जीवंत वीतराग-प्रतिमा! वे प्रभु श्मशान में नहीं खड़े थे, किन्तु आत्म-उद्यान में क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय इन्द्रसभा में धीर-वीर प्रभु की प्रशंसा होने से ‘भव’ नाम का एक इन्द्र-यक्ष उनकी परीक्षा करने आया। (‘भव’ नामक यक्ष अथवा ‘स्थाणु’ नामक रुद्र- ऐसे दोनों नाम पुराण में आते हैं।)
ध्यानस्थ प्रभु के सर्व प्रदेशों में ऐसी परमशान्ति व्याप्त हो गई है कि वन के पशु भी वहीं शान्त होकर बैठ गये। अद्भुत है उनकी धीरता... और अद्वितीय है उनकी वीरता! वहाँ यक्ष ने आकर भयंकर रौद्ररूप धारण किया; सिंह, अजगर आदि की विकृतियाँ धारण कर प्रभु को ध्यान से डिगाने का प्रयत्न किया; पत्थर बरसाये, अग्नि के गोले फेंके; परन्तु वे सब प्रभु से दूर ही रहे। तीर्थंकरों का ऐसा ही अतिशय है कि उनके शरीर पर सीधा उपद्रव नहीं होता। उन्हें काँटे नहीं लगते, सर्प नहीं डस पाते, कोई प्रहार नहीं कर सकता। अहा! जिनकी चेतना अन्तर्मुख है ऐसे वीर मुनिराज को बाह्य उपद्रव कैसे?
वीतरागी आराधना में प्रवृत्त हुए मुनि भगवन्तों पर उपद्रव करने या उन्हें आराधना से विचलित करने का सामर्थ्य विश्व में किसी का नहीं है। अरे, हे पामर यक्ष! हे दुष्ट रुद्र! तू इन वीतरागी मुनि पर क्या उपसर्ग करेगा! तेरे अपने ही ऊपर भयंकर क्रोध का उपसर्ग हो रहा है और उससे तू महा दुःखी है। भव-दुःख से छूटने के लिये तू प्रभु की शरण में आ... और अपनी आत्मा पर होते हुए भयंकर उपद्रव को शान्त कर।
दुष्ट यक्ष अनेक उपसर्गों की चेष्टाएँ करके थक गया, परन्तु महावीर अपनी वीरता से विचलित नहीं हुए। अरे, शान्ति के वेदन में थकावट कैसी! थकावट तो कषाय में है। ‘शान्ति’ कभी परास्त नहीं होगी, ‘क्रोध’ क्षण में परास्त हो जायेगा। अन्त में वह भव-रुद्र मोक्ष के साधक पर उपसर्ग कर-करके थक गया... हार गया। ‘वि-भव’ ऐसे भगवान के समक्ष ‘भव’ कैसे टिक पाता? भवरहित ऐसे मोक्ष के साधक महावीर के सामने ‘भव’ हार गया। शान्तभाव के समक्ष रुद्रभाव नहीं टिक सका। अन्त में थककर उसने अपनी विचारधारा बदली कि अरे, इतना सब करने पर भी यह वीर मुनिराज तो ध्यान से किंचित चलायमान नहीं हुए और मेरे प्रति किंचित भी क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ... मानो कुछ भी नहीं हुआ हो, इस प्रकार वे अपनी शान्ति में ही लीन हैं। वाह प्रभो! धन्य है तुम्हारी वीरता! सचमुच तुम मात्र ‘वीर’ नहीं, अपितु ‘अतिवीर’ हो। इस प्रकार ‘अतिवीर’ सम्बोधन पूर्वक वह यक्ष प्रभु के चरणों में झुक गया।
“धन्य धन्य अतिवीर! मोक्ष के सच्चे साधक!”
“महावीर पर आया हुआ उपसर्ग दूर हो गया?” नहीं, उन पर तो उपसर्ग था ही नहीं। उपसर्ग तो यक्ष पर था, जो दूर हो गया; महान क्रोध और पाप के उपसर्ग से छूटकर वह यक्ष शान्ति को प्राप्त हुआ। अहा! शान्ति के अमोघ शस्त्र के सामने भगवान के विरोधी भी स्वयं वश में होकर झुक जाते थे। वास्तव में ‘शान्ति’ ही मुमुक्षु के विजय के लिये परम अहिंसक और सर्वोत्तम शस्त्र है, जो कदापि निष्फल नहीं जाता।
यक्षदेव अथवा भव-रुद्र द्वारा ‘अतिवीर’ इस मंगल नामकरण द्वारा प्रभु का सम्मान करने से परमेष्ठी पद में विराजमान प्रभु पाँच मंगल नामधारी हुए - ‘वीर’ नाम जन्माभिषेक के समय इन्द्र ने दिया; ‘वर्द्धमान’ नाम माता-पिता ने दिया; ‘सन्मतिनाथ’ नाम मुनिवरों ने दिया; ‘महावीर’ नाम संगमदेव ने दिया, और ‘अतिवीर’ नाम रुद्र ने दिया। प्रभु के सान्निध्य में रुद्र अपनी रुद्रता छोड़कर पुनः धर्म में स्थित हुआ और क्षमायाचनापूर्वक स्तुति की-
“श्री वीर महा अतिवीर सन्मतिनायक हो।
जय वर्धमान गुणधीर, सन्मति-दायक हो॥”
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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