भगवान महावीर स्वामी (40)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (40)

राजसभा में युवराज महावीर की धर्मचर्चा

(वीर की अपूर्व महिमा का वर्णन)

भगवान वीर कुँवर तीस वर्ष के हो गए थे। युवा होने पर भी आध्यात्म रस के रसिक वे राजकुमार राजयोगी के समान जीवन जीते थे। कभी-कभी वे चैतन्य की धुन में लीन हो जाते और कभी तो अर्धरात्रि के समय राजभवन से बाहर निकलकर उद्यान में खड़े-खड़े ध्यान धरते थे। मानो कोई मुनिराज खड़े हों। ऐसा होने पर भी दिनभर शून्यमनस्क या उदास नहीं रहते थे। वे सबके साथ हिलते-मिलते और प्रजाजनों के सुख-दुःख की बातें सुनते थे। यद्यपि राज्य का कार्यभार संभालने में उनकी रुचि नहीं थी, फिर भी वे कई बार राजसभा में जाते और पिता सिद्धार्थ के समीप बैठते थे। उनके आगमन से राजसभा सुशोभित हो उठती थी, सभाजन उनके दर्शन से आनंदित होते और उनकी मधुर वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे।

एक बार सभाजनों ने महाराजा सिद्धार्थ से प्रार्थना की - “हे देव! आज की राजसभा अद्भुत लग रही है। वीर कुंवर को देखकर मानो अंतर में रत्नत्रय का उद्यान खिल उठा हो, ऐसी प्रसन्नता हो रही है। उनके श्रीमुख से हम सब आत्मतत्त्व की अचिन्त्य महिमा सुनना चाहते हैं।”

महाराजा ने भी प्रसन्नता से उनके प्रस्ताव का समर्थन किया कि वाह! धर्म चर्चा से उत्तम और क्या होगा! इतना कहकर उन्होंने वीर कुंवर की ओर दृष्टि डाली और उन्हें बोलने का संकेत किया।

तब अत्यन्त मधुर धीर-गंभीर वाणी द्वारा वीर कुंवर ने चैतन्यतत्त्व की परम अचिन्त्य महिमा समझायी। प्रभु ने क्या कहा, वह हम भी सुनें।

अहो! चैतन्यतत्त्व स्वयं आनन्द स्वरूप है; पुद्गलपिण्ड शरीर से चैतन्य आत्मा भिन्न है; वह इन्द्रियों से परे चेतनारूप है और चेतना द्वारा ही उसका स्वसंवेदन होता है; किसी बाह्य चिन्हों से अथवा इन्द्रिय ज्ञान द्वारा उसका ग्रहण (अनुभवन) नहीं हो सकता, इसलिए वह ‘अलिंगग्रहण’ है।

है चेतना अद्भुत अहो, निज स्वरूप में वह व्यापती,

इन्द्रियों से पार हो निज आत्मा को वह देखती।

स्वानुभूतिवन्त जीव में सुन्दरपने वह शोभती,

आनन्द करती मस्त हो निज मोक्ष को वह साधती॥

राजयोगी वर्द्धमान ने स्वानुभूतिगम्य आत्मतत्त्व की ज्ञान चेतना का अद्भुत वीतरागी स्वरूप समझाते हुए कहा - यह ज्ञान चेतना स्वरूप आत्मा, उस चेतना में रागादि विभावों का मिश्रण नहीं है। एक परमाणु जितने राग का भी, यदि ज्ञानचेतना में मिश्रण करोगे, तो ज्ञान के परमार्थ स्वाद का अनुभव नहीं होगा; राग में ज्ञान का रस नहीं है। इसलिए हे जीवों! यह वीतराग उपदेश प्राप्त करके तुम सर्वतः राग से भिन्न ऐसे शुद्धज्ञान का आस्वादन करो। परम आनन्द स्वाद से भरपूर वह शुद्ध ज्ञान ही आत्मा का निजपद है। अहो, यह ज्ञानस्वरूप आत्मा सत्य है, उसकी प्रीति करो, तन्मयता से उसका अनुभव करो; उसका अनुभव ही परमगति एवं सन्तोष है। वही कल्याण है, और वही मोक्षसुख है। आत्मा अनन्तशक्ति का स्वामी है, वह जब स्वयं जागृत होता है, तब सहज-प्रयत्न से अपना कल्याण कर लेता है।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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