छहढाला (3)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृतछहढाला (3)(सुबोध टीका)
इस ग्रन्थ की प्रामाणिकता और निगोद का दुःख
तास भ्रमन की है बहु कथा, पै कछु कहूँ कही मुनि यथा;
काल अनन्त निगोद मँझार, वीत्यो एकेन्द्री तन धार ॥ ४ ॥
अन्वयार्थः (तास) उस संसार में (भ्रमन की) भटकने की (कथा) कथा (बहु) बड़ी (है) है, (पै) तथापि (यथा) जैसी (मुनि) पूर्वाचार्यों ने (कही) कही है, तदनुसार मैं भी (कछु) थोड़ी-सी (कहूँ) कहता हूँ कि इस जीव का (निगोद मंझार) निगोद में (एकेन्द्री) एकेन्द्रिय जीव के (तन) शरीर को (धार) धारण करके (अनंत) अनंत (काल) काल (वीत्यो) व्यतीत हुआ है।
भावार्थः संसार में जन्म-मरण धारण करने की कथा बहुत बड़ी है। तथापि जिस प्रकार पूर्वाचार्यों ने अपने अन्य ग्रन्थों में कही है, तदनुसार मैं (दौलतराम) भी इस ग्रन्थ में थोड़ी-सी कहता हूँ। इस जीव ने नरक से भी निकृष्ट निगोद में एकेन्द्रिय जीव के शरीर धारण किये अर्थात् साधारण वनस्पतिकाय में उत्पन्न होकर वहाँ अनंतकाल व्यतीत किया है ।। ४ ।।
निगोद का दुःख और वहाँ से निकलकर प्राप्त की हुई पर्यायें
एक स्वास में अठदस बार, जन्म्यो मरयो भरयो दुखभार;
निकसि भूमि जल पावक भयो, पवन प्रत्येक वनस्पति थयो ॥ ५ ॥
अन्वयार्थः निगोद में यह जीव ( एक श्वास में ) एक साँस में ( अठदस बार ) अठारह बार ( जन्म्यो ) जन्मा और ( मरयो ) मरा तथा ( दुखभार ) दुःखों के समूह (भरयो) सहन किये और वहाँ से (निकसि ) निकलकर ( भूमि ) पृथ्वीकायिक जीव, ( जल ) जलकायिक जीव, ( पावक ) अग्निकायिक जीव ( भयो ) हुआ, तथा ( पवन ) वायुकायिक जीव और ( प्रत्येक वनस्पति ) प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव (थयो) हुआ।
भावार्थः निगोद ( साधारण वनस्पति ) में इस जीव ने एक श्वासमात्र जितने समय में अठारह बार जन्म अर्थात् नया शरीर धारण किया और मरण अर्थात् वर्तमान शरीर को त्याग कर भयंकर दुःख सहन किये हैं और वहाँ से निकलकर पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक तथा प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव के रूप में उत्पन्न हुआ। ५ ।
तिर्यंच गति में त्रस पर्याय की दुर्लभता और उसका दुःख
दुर्लभ लहि ज्यों चिंतामणि, त्यों पर्याय लही त्रसतणी;
लट पिपील अलि आदि शरीर, धर धर मरयो सही बहु पीर ।। ६ ।।
अन्वयार्थः (ज्यों) जिस प्रकार (चितांमणि) चिन्तामणि रत्न (दुर्लभ) कठिनाई से (लहि) प्राप्त होता है (त्यों) उसी प्रकार (त्रसतणी) त्रस की (पर्याय) पर्याय भी बड़ी कठिनाई से (लही) प्राप्त हुई। वहाँ भी (लट) इल्ली (पिपील) चींटी (अलि) भौंरा (आदि) इत्यादि के (शरीर) शरीर (धर धर) बारम्बार धारण करके (मरयो) मरण को प्राप्त हुआ (और) (बहु पीर) अत्यन्त पीड़ा (सही) सहन की।
भावार्थः जिस प्रकार चिन्तामणि रत्न बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है, उसी प्रकार इस जीव ने त्रसतणी पर्याय बड़ी कठिनाई से प्राप्त की। उस त्रसतणी पर्याय में भी लट (इल्ली) आदि दो इन्द्रिय जीव, चींटी आदि तीन इन्द्रिय जीव और भौंरा आदि चार इन्द्रिय जीवों के शरीर धारण करके मरा और अनेक दुःख सहन किये।
तिर्यंचगति में असंज्ञी तथा संज्ञी के दुःख
कबहूं पंचेन्द्रिय पशु भयो, मन बिन निपट अज्ञानी थयो;
सिंहादिक सैनी ह्वै क्रूर, निबल पशु हति खाये भूर ॥7॥
अन्वयार्थ : यह जीव (कबहूँ) कभी (पंचेन्द्रिय) पंचेन्द्रिय (पशु) तिर्यंच (भयो) हुआ, तो (मन बिन) मन के बिना (निपट) अत्यन्त (अज्ञानी) मूर्ख (थयो) हुआ और (सैनी) संज्ञी भी (ह्वै) हुआ तो (सिंहादिक) सिंह आदि (क्रूर) क्रूर जीव (ह्वै) होकर (निबल) अपने से निर्बल, (भूर) बहुत (पशु) तिर्यंच (हति) मार-मारकर (खाये) खाये।
भावार्थ : यह जीव कभी पंचेन्द्रिय असंज्ञी (मन रहित) पशु भी हुआ तो मन रहित होने से अत्यन्त अज्ञानी रहा; और कभी संज्ञी (मन सहित) हुआ, तो सिंह आदि क्रूर-निर्दय होकर अनेक निर्बल जीवों को मार-मारकर खाया तथा घोर अज्ञानी हुआ।
तिर्यंच गति में निर्बलता तथा दुःख
कबहूं आप भयो बलहीन, सबलनि करि खायो अतिदीन;
छेदन भेदन भूख पियास, भार-वहन, हिम, आतप त्रास ॥८॥
अन्वयार्थ : यह जीव तिर्यंच गति में (कबहूँ) कभी (आप) स्वयं (बलहीन) निर्बल (भयो) हुआ, तो (अतिदीन) असमर्थ होने से (सबलनि करि) अपने से बलवान प्राणियों द्वारा (खायो) खाया गया और (छेदन) छेदा जाना, (भेदन) भेदा जाना, (भूख) भूख, (पियास) प्यास, (भार-वहन) बोझ ढोना, (हिम) ठण्ड, (आतप) गर्मी आदि के (त्रास) दुःख सहन किये।
भावार्थः जब यह जीव तिर्यंच गति में किसी समय निर्बल पशु हुआ तो स्वयं असमर्थ होने के कारण अपने से बलवान प्राणियों द्वारा खाया गया; तथा उस तिर्यंचगति में छेदा जाना, मारा जाना, भूख, प्यास, बोझ ढोना, ठण्ड, गर्मी आदि के दुःख भी सहन किये।
1 - संसारी जीव अनन्त काल से कहाँ भटक रहा है? (निगोद में)
2 - एक सांस में 18 बार जन्म-मरण करने वाले जीव की कितनी इन्द्रियां होती हैं? (एक)
3- पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीव की कितनी इन्द्रियां होती हैं? (एक)
4- क्या सभी निगोदिया जीव एक सांस में 18 बार जन्म-मरण करने वाले होते हैं? (नहीं)
5- कौन-से निगोदिया जीव एक सांस में 18 बार जन्म-मरण करने वाले होते हैं? (लब्ध अपर्याप्तक शरीर धारण करने वाले जीव)
6 - त्रस पर्याय प्राप्त करना किस रत्न के समान है? (चिन्तामणि रत्न)
7. त्रस पर्याय में कितनी इन्द्रियां प्राप्त होती हैं? (2 से 5 इन्द्रियों तक)
8- पंचेन्द्रिय प्राणी कितने प्रकार के होते हैं? (दो - संज्ञी और असंज्ञी)
9 - तिर्यंच गति में निर्बल प्राणी का किसके द्वारा भक्षण किया जाता है? (अपने से बलवान प्राणी द्वारा)
10 - तिर्यंच गति में निर्बल प्राणी को कौन-से दुःख होते हैं? (क्षुधा-तृषा, वध-बंधन, संक्लेश परिणाम आदि)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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