कर्म रूपी मिट्टी ने
कर्म रूपी मिट्टी ने पारुल जैन, दिल्ली की लेखनी द्वारा रचित सुन्दर भजन Sung by- Parul Jain, Delhi कर्म रूपी मिट्टी ने प्रभु जी, चेतन को है ढाक दिया। दे दो प्रभु जी प्रज्ञा छेनी, जिससे उसको हटा दिया।। निर्मल शुद्ध है चेतन मेरा, ये मुझको है भान हुआ। लेकिन पाऊँ इसको कैसे, इसका प्रभु न ज्ञान हुआ।। मेरे अंतर के परिणामों, को तुम आज जगा देना। अंतर में शुद्ध चेतन है प्रभु, अनुभूति आज करा देना।। ‘हूँ’ का ज्ञान करूँ मैं कैसे, ’हूँ’ को कैसे पहचानूँ। चेतन राजा मिलेंगे कैसे, कैसे निज को पहचानूँ।। कैसे ज्ञान किया प्रभु तुमने, कैसे तुम समता पाई। पाप पुण्य सब नष्ट किये तुम, कैसे निज महिमा आई।। हे प्रभु मुझको भी वो बल दो, तुम जैसा मैं हो जाऊँ। विषय भोग इस लोक के प्रभु जी, भूल स्वयं में खो जाऊँ।। मैं शुद्ध स्वरूपी चेतन हूँ, मैं निर्मल ज्ञान स्वभावी हूँ। जिनवाणी सुन भान हुआ, मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी हूँ। अब छोड़ लोक के वैभव को, अंतर का रूप लखाऊँगा। अब भूल पराई माया को, निज के घर में अब आऊँगा। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्र...