छहढाला (15)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला (15)
(सुबोध टीका)

गृहीत मिथ्याचारित्र का लक्षण

जो ख्याति लाभ पूजा आदि चाह, धरि करन विविध विध देहदाह।

आत अनात्म के ज्ञानहीन, जे जे करनी तन करन छीन।।१४।।

अन्वयार्थः - (जो) जो (ख्याति) प्रसिद्धि (लाभ) लाभ तथा (पूजा आदि) मान्यता और आदर-सम्मान आदि की (चाह धरि) इच्छा करके (देहदाह) शरीर को कष्ट देने वाली (आतम अनात्म के) आत्मा और परपदार्थों के (ज्ञानहीन) भेदज्ञान से रहित (तन) शरीर को (छीन) क्षीण (करन) करने वाली (विविध विध) अनेक प्रकार की ( जे जे करनी ) जो-जो क्रियाएँ हैं, वे सब ( मिथ्याचारित्र ) मिथ्या चारित्र हैं ।

भावार्थः - शरीर और आत्मा का भेदविज्ञान न होने से जो यश, धन-सम्पत्ति, आदर-सत्कार आदि की इच्छा से मानादि कषाय के वशीभूत होकर शरीर को क्षीण करने वाली अनेक प्रकार की क्रियाएँ करता है, उसे “गृहीत मिथ्याचारित्र” कहते हैं।

मिथ्याचारित्र के त्याग का तथा आत्महित में लगने का उपदेश 

ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित पंथ लाग; 

जगजाल-भ्रमण को देहु त्याग, अब दौलत! निज आतम सुपाग । १५ ।

अनव्यार्थ :

(ते) उस (सब) समस्त (मिथ्याचारित्र) मिथ्याचारित्र को (त्याग) छोड़कर (अब) अब (आत्म के) आत्मा के (हित) कल्याण के (पंथ) मार्ग में (लाग) लग जाओ, (जगजाल) संसार रूपी जाल में (भ्रमण को) भटकना (देहु त्याग) छोड़ दो, (दौलत) हे दौलतराम! (निज आतम) अपने आत्मा में (अब) अब (सुपाग) भलीभांति लीन हो जाओ।

भावार्थ :

आत्महितैषी जीव को निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ग्रहण करके गृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र तथा अगृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र का त्याग करके आत्मकल्याण के मार्ग में लगना चाहिए। श्री पण्डित दौलतराम जी अपने आत्मा को सम्बोधन करके कहते हैं कि हे आत्मन्! पराश्रयरूप संसार अर्थात् पुण्य-पाप में भटकना छोड़कर सावधानी से आत्मस्वरूप में लीन हो।

 1- ख्याति-लाभ पूजा आदि की इच्छा से की जाने वाली सभी धार्मिक क्रियाएं क्या कहलाती हैं? (गृहीत मिथ्याचारित्र)

2 - सभी धार्मिक क्रियाएं क्या कहलाती हैं? (गृहीत मिथ्या चारित्र)

3 - शरीर को कष्ट देने और शरीर को क्षीण करने वाली सभी धार्मिक क्रियाएं क्या कहलाती हैं? (गृहीत मिथ्याचारित्र)

4- आत्महित के मार्ग पर चलने के लिए किस चारित्र का त्याग करना चाहिए? (गृहीत मिथ्याचारित्र का)

5- आत्महित किस के आश्रय से होता है? (स्वआत्मा के)

6- कौन-से दो प्रकार के मिथ्याभाव छोड़ने योग्य हैं? (गृहीतमिथ्याभाव और अगृहीतमिथ्याभाव)

7- कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्र का पोषण किस के भ्रमण का कारण है? (अनन्त संसार के भ्रमण का ) 

8- जीव अनादिकाल से किस चारित्र का पोषण कर रहा है? (मिथ्याचारित्र का)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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