छहढाला(14)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृतछहढाला(14)
(सुबोध टीका)
रागादि भावहिंसा समेत, दर्वित त्रस थावर मरण खेत ॥ ११ ॥
जे क्रिया तिन्हें जानहु कुधर्म, तिन सरधै जीव लहै अशर्म।
याकूं गृहीत मिथ्यात्व जान, अब सुन गृहीत जो है अज्ञान ।।१२।।
अन्वयार्थः - ( रागादि भावहिंसा ) राग-द्वेष आदि भावहिंसा ( समेत ) सहित तथा ( त्रस-स्थावर ) त्रस और स्थावर ( मरण खेत ) मरण का स्थान ( दर्बित ) द्रव्यहिंसा ( समेत ) सहित ( जे ) जो ( क्रिया ) क्रियाएँ ( हैं ), ( तिन्हें ) उन्हें ( कुधर्म ) मिथ्याधर्म ( जानहु ) जानना चाहिये। ( तिन ) उनकी ( सरधै ) श्रद्धा करने से ( जीव ) आत्मा-प्राणी ( लहै अशर्म ) दुःख पाते हैं। ( याकूँ ) इस कुगुरु, कुदेव और कुधर्म का श्रद्धान करने को ( गृहीत मिथ्यात्व ) गृहीत मिथ्यादर्शन जानना, ( अब गृहीत) अब गृहीत ( अज्ञान ) मिथ्याज्ञान ( जो है ) जिसे कहा जाता है, उसका वर्णन ( सुन ) सुनो ।
भावार्थः - जिस धर्म में मिथ्यात्व तथा रागादि रूप भावहिंसा और त्रस तथा स्थावर जीवों के घातरूप द्रव्यहिंसा को धर्म माना जाता है, उसे कुधर्म कहते हैं। जो जीव उस कुधर्म की श्रद्धा करता है, वह दुःख प्राप्त करता है। ऐसे मिथ्या गुरु, देव और धर्म की श्रद्धा करना उसे “गृहीत मिथ्यादर्शन” कहते हैं। वह परोपदेश आदि बाह्य कारण के आश्रय से ग्रहण किया जाता है इसलिये “ गृहीत” कहलाता है।
अब गृहीत मिथ्याज्ञान का वर्णन किया जाता है।
गृहीत मिथ्याज्ञान का लक्षण
एकान्तवाद - दूषित समस्त, विषयादिक पोषक अप्रशस्त ;
रागी कुमतनिकृत श्रुताभ्यास, सो है कुबोध बहु देन त्रास।। १३ ।।
अन्वयार्थ : ( एकान्तवाद ) एकान्त रूप कथन से ( दूषित ) मिथ्या ( और ) ( विषयादिक ) पाँच इन्द्रियों के विषय आदि की ( पोषक ) पुष्टि करनेवाले ( रागीकुमतनिकृत ) रागी कुमति आदि के रचे हुए ( अप्रशस्त ) मिथ्या ( समस्त ) समस्त ( श्रुताभ्यास ) शास्त्रों को ( अभ्यास ) पढ़ना-पढ़ाना , सुनना और सुनाना ( सो ) वह ( कुबोध ) मिथ्याज्ञान ( है ; वह ) ( बहु ) बहुत ( त्रास ) दुःख को ( देन ) देनेवाला है।
भावार्थ :
( १ ) वस्तु अनेक धर्मात्मक है ; उसमें से किसी भी एक ही धर्म को पूर्ण वस्तु कहने के कारण से दूषित ( मिथ्या ) तथा विषय-कषायादिक की पुष्टि करनेवाले कुगुरुओं के रचे हुए सर्व प्रकार के मिथ्या शास्त्रों को धर्मबुद्धि से लिखना-लिखाना, पढ़ना-पढ़ाना, सुनना और सुनाना उसे गृहीत मिथ्याज्ञान कहते हैं।
(2) जो शास्त्र जगत में सर्वथा नित्य, एक, अद्वैत और सर्वव्यापक ब्रह्ममात्र वस्तु है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है - ऐसा वर्णन करता है, वह शास्त्र एकान्तवाद से दूषित होने के कारण कुशास्त्र है।
(3) वस्तुओं को सर्वथा क्षणिक-अनित्य बतलायें, अथवा
(4) गुण-गुणी सर्वथा भिन्न हैं, किसी गुण के संयोग से वस्तु है- ऐसा कथन, अथवा
(5) जगत का कोई कर्ता-हर्ता तथा नियंता है -ऐसा वर्णन करें, अथवा
(6) दया, दान, महाव्रत आदि शुभ राग - जो कि पुण्यास्रव हैं, पराश्रय है उससे, तथा साधुओं को आहार देने के शुभभाव से संसार परित (अल्प, मर्यादित) होना बतलायें तथा उपदेश देने के शुभभाव से परमार्थ रूप धर्म होता है - इत्यादि अन्य धर्मियों के ग्रंथों में जो विपरीत कथन हैं, वे एकान्त और अप्रशस्त होने के कारण कुशास्त्र हैं; क्योंकि उनमें प्रयोजनभूत सात तत्त्वों की यथार्थता नहीं है।
जहाँ एक तत्त्व की भूल हो, वहाँ सातों तत्त्वों की भूल होती है -ऐसा समझना चाहिए।
1. जिस धर्म में द्रव्यहिंसा व भावहिंसा सहित क्रियाएं होती हैं, वह कैसा धर्म है? (कुधर्म)
2- कुगुरु, कुदेव, कुधर्म पर श्रद्धा रखना कैसा है? (गृहीत मिथ्यादर्शन)
3 - एकान्तवाद कथन कैसा है? (दूषित)
4- एकान्तवाद कथन किस का पोषक है। (इन्द्रियों के विषय आदि का)
5 - रागियों व अज्ञानियों द्वारा रचित मिथ्या शास्त्रों से मिलने वाला ज्ञान कैसा है? (मिथ्याज्ञान)
6- मिथ्याज्ञान हमें क्या देता है? (दुःख)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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