छहढाला(13)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(13)

(सुबोध टीका)

 गृहीत मिथ्यादर्शन और कुगुरु के लक्षण

जो कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव;

अंतर रागादिक धरें जेह, बाहर धन अम्बर तें सनेह ॥९॥

गाथा १० (पूर्वाद्ध)

धारै कुलिंग लहि महत भाव, ते कुगुरु जन्मजल उपलनाव;

अन्वयार्थः- (जो) जो (कुगुरु) मिथ्या गुरु की (कुदेव) मिथ्या देव की और (कुधर्म) मिथ्या धर्म की (सेव) सेवा करता है, वह ( चिर ) अति दीर्घकाल तक ( दर्शनमोह ) मिथ्यादर्शन ( एव ) ही ( पोषें ) पोषता है । ( जेह ) जो (अंतर ) अंतर में ( रागादिक ) मिथ्यात्व-राग-द्वेष आदि ( धरैं ) धारणा करता है और ( बाहर ) बाह्य में ( धन अम्बर तें ) धन तथा वस्त्रादि से ( सनेह ) प्रेम रखता है, तथा ( महत भाव ) महात्मापने का भाव ( लहि ) ग्रहण करके ( कुलिंग ) मिथ्यावेषों को ( धारैं ) धारण करता है - वह ( कुगुरु ) कुगुरु कहलाता है और वह कुगुरु ( जन्मजल ) संसार-रूपी समुद्र में ( उपलनाव ) पत्थर की नौका समान है।

भावार्थः- कुगुरु, कुदेव और कुधर्म की सेवा करने से दीर्घकाल तक मिथ्यात्व का ही पोषण होता है अर्थात् कुगुरु, कुदेव और कुधर्म का सेवन ही गृहीत मिथ्यादर्शन कहलाता है । 

परिग्रह दो प्रकार का है; एक अंतरंग और दूसरा बहिरंग; मिथ्यात्व, राग-द्वेषादि अंतरंग परिग्रह है और वस्त्र, पात्र, धन, मकानादि बहिरंग परिग्रह हैं। वस्त्रादि सहित होने पर भी अपने को जिनलिंगाधारी मानते हैं, वे कुगुरु हैं। “जिनमार्ग में तीन लिंग तो श्रद्धापूर्वक हैं। एक तो जिनस्वरूप-निर्ग्रंथ दिगंबर मुनिलिंग, दूसरा उत्कृष्ट श्रावकरूप दसवीं - ग्यारहवीं प्रतिमाधारी श्रावकलिंग और तीसरा आार्यिकाओं का रूप- यह स्त्रियों का लिंग(चिह्न) है, - इन तीन के अतिरिक्त कोई चौथा लिंग सम्यग्दर्शनस्वरूप नहीं है; इसलिये इन तीन के अतिरिक्त अन्य लिंगों को जो मानता है उसे जिनमत की श्रद्धा नहीं है, अपितु वह मिथ्यादृष्टि है। ( दर्शनपाहुड गाथा १८) ”
इसलिये जो कुलिंग के धारक हैं, मिथ्यात्वादि अंतरंग तथा वस्त्रादि बहिरंग परिग्रह सहित हैं, अपने को मुनि मानते हैं, मनाते हैं, वे कुगुरु हैं। जिस प्रकार पत्थर की नौका डूब जाती है तथा उसमें बैठने वाले भी डूबते हैं; उसी प्रकार कुगुरु भी स्वयं संसार-समुद्र में डूबते हैं और उनकी वंदना तथा सेवा-भक्ति करनेवाले भी अनंत संसार में डूबते हैं अर्थात् कुगुरु की श्रद्धा, भक्ति, पूजा, विनय तथा अनुमोदन करने से गृहीत मिथ्यात्व का सेवन होता है और इससे जीव अनंतकाल तक भव-भ्रमण करता है ।। ९ ।।
गाथा १० ( उत्तरार्द्ध ) कुदेव ( मिथ्यादेव ) का स्वरूप जो राग-द्वेष मकरि मलीन, वनिता गदादिजुत चिह्न चीन ।।१० ऽ

गाथा ११ ( पूर्वार्ध ) ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव, शठ करत न तिन भवभ्रमण छेव; अन्वयार्थः ( जे ) जो ( राग-द्वेषमलकरि मलीन ) रागद्वेषरूपी मैल से मलिन हैं और (वनिता) स्त्री (गदादि जुत ) गदा आदि सहित ( चिह्न चीन ) चिन्हों से पहिचाने जाते हैं ( ते ) वे ( कुदेव ) झूठे देव हैं, ( तिनकी ) उन कुदेवों की ( जु ) जो ( शठ ) मूर्ख ( सेव करत ) सेवा करते हैं, ( तिन ) उनका ( भवभ्रमण ) संसार में भ्रमण करना ( न छेव ) नहीं मिटता । भावार्थः- जो राग और द्वेषरूपी मैल से मलिन ( रागी-द्वेषी) हैं और स्त्री, गदा, आभूषण आदि चिह्नों से जिनको पहिचाना जा सकता है वे ‘कुदेव’ कहे जाते हैं। जो अज्ञानी ऐसे कुदेवों की सेवा ( पूजा, भक्ति और विनय ) करते हैं, वे इस संसार का अन्त नहीं कर सकते अर्थात् अनन्तकाल तक उनका भवभ्रमण नहीं मिटता ।। १०।। सुदेव - अरिहंत परमेष्ठी;

देव- भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी और वैमानिक,

कुदेव - हरि, हर शीतलादि; अदेव - पीपल, तुलसी, लकड़बाबा आदि कल्पित देव,

जो कोई भी सरागी देव-देवी हैं वे वन्दन-पूजन के योग्य नहीं हैं।

1- जो अंतरंग में मिथ्यात्व, रागदि से युक्त है, वह कैसा गुरु कहलाता है? (कुगुरु) 2- कुगुरु के बाह्य लक्षण क्या हैं? (परिग्रह से युक्त, मिथ्या वेष धारण करने वाला) 3- कुगुरु कैसी नौका के समान हैं? (पत्थर की) 4-जो राग, द्वेष, स्त्री, गदा आदि हिंसक हथियारों आदि चिह्नों से पहिचाने जाते हैं, वे कैसे देव हैं? (कुदेव) 5- कुदेव की सेवा कौन करता है? (मूर्ख प्राणी) 6- क्या कुदेव की सेवा करके भव-भ्रमण मिटाया जा सकता है? (नहीं)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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