दूसरी ढाल का सारांश
दूसरी ढाल का सारांश
(१) यह जीव मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र के वश में होकर चार गतियों में परिभ्रमण करके प्रतिसमय अनन्त दुःख भोग रहा है। जब तक देहादि से भिन्न अपने आत्मा की सच्ची प्रतीति तथा रागादि का अभाव न करे, तब तक सुख-शान्ति और आत्मा का उद्धार नहीं हो सकता।
(२) आत्महित के लिये (सुखी होने के लिये) प्रथम (१) सच्चे देव, गुरु और धर्म की यथार्थ प्रतीति, (२) जीव आदि सात तत्त्वों की यथार्थ प्रतीति, (३) स्व-पर के स्वरूप की श्रद्धा, (४) निज शुद्धात्मा केप्रतिभासरूप आत्मा की श्रद्धा - इन चार लक्षणों के अविनाभाव सहित सत्य श्रद्धा (निश्चय सम्यग्दर्शन) जब तक जीव प्रगट न करे, तब तक जीव (आत्मा) का उद्धार नहीं हो सकता अर्थात् धर्म का प्रारम्भ भी नहीं हो सकता; और तब तक आत्मा को अंशमात्र भी सुख प्राप्त नहीं होता।
(३) सात तत्त्वों की मिथ्या श्रद्धा करना - उसे मिथ्यादर्शन कहते हैं। अपने स्वतंत्र स्वरूप की भूल का कारण आत्मस्वरूप में विपरीत श्रद्धा होने से ज्ञानावरणी आदि द्रव्यकर्म, शरीरादि नौकर्म तथा पुण्य-पाप आदि मलिनभावों में एकत्वबुद्धि-कर्तृत्वबुद्धि है; और इसलिए शुभराग तथा पुण्य हितकर है, शरीरादि परपदार्थों की अवस्था (क्रिया) मैं कर सकता हूँ, ‘पर’ मुझे लाभ-हानि कर सकता है, तथा मैं भी ‘पर’ का कुछ कर सकता हूँ - ऐसी मान्यता के कारण उसे सत्-असत् का विवेक होता ही नहीं। सच्चा सुख तथा हितरूप श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र अपने आत्मा के ही आश्रय से होते हैं - इस बात की भी उसे खबर नहीं होती।
(४) पुनश्च कुदेव-कुगुरु-कुशास्त्र और कुधर्म की श्रद्धा, पूजा, सेवा तथा विनय करने की जो-जो प्रवृत्ति है, वह अपने मिथ्यात्व आदि महान दोषों को पोषण देनेवाली होने से दुःखदायक है, अनन्त संसार-भ्रमण का कारण है। जो जीव उसका सेवन करता है, उसे कर्तव्य समझता है, वह दुर्लभ मनुष्य-जीवन को नष्ट करता है।
(५) अगृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र जीव को अनादिकाल से होते हैं, फिर वह मनुष्य होने पर भी कुशास्त्र का अभ्यासकरके अथवा कुगुरु का उपदेश स्वीकार करके गृहीत मिथ्याज्ञान-मिथ्याश्रद्धा धारण करता है तथा कुमत का अनुसरण करके मिथ्या क्रिया करता है। यह गृहीत मिथ्याचारित्र है। इसलिए जीव को भलीभाँति सावधान होकर गृहीत तथा अगृहीत - दोनों प्रकार के मिथ्यात्व छोड़ने योग्य हैं; तथा उनका यथार्थ निर्णय करके निश्चय सम्यग्दर्शन प्रकट करना चाहिए। मिथ्याभावों का सेवन कर-कर के, संसार में भटक कर, अनन्त जन्म धारण करके अनन्त काल गँवा दिया; इसलिए अब सावधान होकर आत्मोद्धार करना चाहिए।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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