छहढाला(तीसरी)(16)

ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(16)
(सुबोध टीका)

 तीसरी ढाल

नरेन्द्र छन्द ( जोगीरासा )

आत्महित, सच्चा सुख तथा दो प्रकार से मोक्षमार्ग का कथन

आतम को हित है सुख, सो सुख आकुलता बिन कहिये;

आकुलता शिवमांहि न तातैं, शिवमग लाग्यो चहिये ।

सम्यग्दर्शन ज्ञान चरन शिव, मग सो द्विविध विचारो;

जो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो ।। १ ।।

अन्यार्थः (आतम को) आत्मा का (हित) कल्याण (है) है (सुख) सुख की प्राप्ति, (सो सुख) वह सुख (आकुलता बिन ) आकुलता रहित (कहिए) कहा जाता है। (आकुलता) आकुलता (शिवमांहि) मोक्ष में (न) नहीं है (तातें) इसलिए (शिवमग) मोक्षमार्ग में (लाग्ये) लगना (चाहिये) चाहिये। (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरन) सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र इन तीनों की एकता वह (शिवमग) मोक्ष का मार्ग है। (सो) उस मोक्षमार्ग का (द्विविध) दो प्रकार से (विचारो) विचार करना चाहिये कि (जो) जो (सत्यारथरूप) वास्तविक स्वरूप है (सो) वह (निश्चय) निश्चय-मोक्षमार्ग है और (कारण) जो निश्चय-मोक्षमार्ग का निमित्तकारण है (सो) उसे (व्यवहारो) व्यवहार-मोक्षमार्ग कहते हैं।

भावार्थ - (१) सम्यक्चारित्र निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक ही होता है। जीव को निश्चयसम्यग्दर्शन के साथ ही सम्यक्‌भाव श्रुतज्ञान होता है और निश्चयनय तथा व्यवहारनय, ये दोनों सम्यक् श्रुतज्ञान के अवयव (अंग) हैं; इसलिए मिथ्यादृष्टि को निश्चय या व्यवहारनय हो ही नहीं सकते; इसलिए “व्यवहार प्रथम होता है और निश्चय बाद में प्रकट होता है” - ऐसा मानने वाले को नयों के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं है।
(२) तथा नय निरपेक्ष नहीं होते। निश्चयसम्यग्दर्शन प्रकट होने से पूर्व यदि व्यवहारनय हो तो निश्चयनय की अपेक्षा रहित निरपेक्षनय हुआ और यदि पहले अकेला व्यवहारनय हो तो अज्ञानदशा में सम्यग्नय मानना पड़ेगा; किन्तु “निरपेक्षनयाः मिथ्या सापेक्षावस्तु तेऽर्थकृत” (आत्ममीमांसा श्लोक - १०८) ऐसा आगम का वचन है; इसलिए अज्ञानदशा में किसी जीव कोव्यवहार नय नहीं हो सकता, किन्तु व्यवहाराभास अथवा निश्चया-भासरूप मिथ्यानय हो सकता है। (३) जीव निज ज्ञायकस्वभाव के आश्रय द्वारा निश्चय रत्नत्रय (मोक्षमार्ग) प्रगट करे तब सर्वज्ञ कथित नव तत्त्व, सच्चे देव-गुरु-शास्त्र की श्रद्धा सम्बन्धी रागमिश्रित विचार तथा मन्दकषायरूप शुभभाव-जो कि उस जीव को पूर्वकाल में था, उसे भूतर्नैगमनय से व्यवहारकारण कहा जाता है। (परमात्मप्रकाश, अ. २ गाथा १४ की टीका) । तथा उसी जीव को निश्चयसम्यग्दर्शन की भूमिका में शुभराग और निमित्त किस प्रकार के होते हैं, उनका सहचरपना बतलाने के लिये वर्तमान शुभराग को व्यवहार मोक्षमार्ग कहा है, ऐसा कहने का कारण यह है कि उससे भिन्न प्रकार के (विरूद्ध) निमित्त उस दशा में किसी को हो नहीं सकते इस प्रकार निमित्त-व्यवहार होता है तथापि वह यथार्थ कारण नहीं है। (४) आत्मा स्वयं ही सुखस्वरूप है, इसलिये आत्मा के आश्रय से ही सुख प्रगट हो सकता है, किन्तु किसी निमित्त या व्यवहार के आश्रय से सुख प्रगट नहीं हो सकता। (५) मोक्षमार्ग तो एक ही है, वह निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्र की एकतारूप है। (प्रवचनसार गाथा ८२-१९९ तथा मोक्ष-मार्ग प्रकाशक देहली, पृष्ठ ४६२) (६) अब, “मोक्षमार्ग तो कहीं दो नहीं हैं, किन्तु मोक्षमार्ग का निरूपण दो प्रकार से है। जहाँ मोक्षमार्ग के रूप में सच्चे मोक्ष-मार्ग की प्ररूपणा की है, वह निश्चयमोक्षमार्ग है; तथा जहाँ, जो मोक्षमार्ग तो नहीं है, किन्तु मोक्षमार्ग का निमित्त है अथवा सहचारी है, वहाँ उसे उपचार से मोक्षमार्ग कहें तो वह व्यवहारमोक्षमार्ग है; क्योंकि निश्चय-व्यवहार का सर्वत्र ऐसा ही लक्षण है, अर्थात् यथार्थ निरूपण वह निश्चय और उपचार निरूपण वह व्यवहारनय ।
इसलिए निरूपण की अपेक्षा से दो प्रकार का मोक्षमार्ग जानना। किन्तु एक निश्चय मोक्षमार्ग है और दूसरा व्यवहार मोक्षमार्ग है, इस प्रकार दो मोक्षमार्ग मानना मिथ्या है।
( मोक्षमार्ग प्रकाशक देहली पृष्ठ २६५-२६६ )

1- तीसरी ढाल में किस विषयवस्तु का वर्णन किया ग्या है? (सम्यग्दर्शन के स्वरूप व महिमा का) 2 - आत्मा का हित किस में है? (आकुलता रहित सुख की प्राप्ति में) 3 - आकुलता कहाँ नहीं होती? (मोक्ष में) 4 - हमें किस मार्ग में लगना चाहिए? (मोक्ष मार्ग में) 5- किसकी एकता का नाम मोक्षमार्ग है? (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकता का) 6 - मोक्षमार्ग का कथन कितनी प्रकार से किया गया है? (दो, निश्चय/ व्यवहार) 7 - मोक्षमार्ग का वास्तविक स्वरूप क्या है? (निश्चय मोक्षमार्ग) 8 - मोक्षमार्ग का निमित्त कारण क्या है? (व्यवहार मोक्षमार्ग)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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