भावमयी पूजा
श्री 1008 चौबीस तीर्थंकरों की भावमयी पूजा
ॐ नमः सिद्धेभ्यः! ॐ नमः सिद्धेभ्यः! ॐ नमः सिद्धेभ्यः!
कर लो जिनवर का गुणगान, आई शुभ की घड़ी। -2
आई शुभ की घड़ी, देखो मंगल घड़ी।। -2
बोलो चौबीसों भगवान की जय
चौबीसों भगवान को, धारूँ मैं निज ज्ञान।
आह्वानन उनका करूँ, पाऊँ सम्यक् ज्ञान।।
स्थापन उनके गुण करूँ, अपने हृदय में आज।
चिंतन, मनन, सुमिरन करूँ, शुद्धभाव से आज।। -2
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्।
आइए प्रभु! आपके आने से मेरी आत्मा, मेरी चेतना, मेरा मन, मेरे भाव सब निर्मल हो जाएं।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
आपके ज्ञान रूपी चरण-कमल मेरी आत्मा के प्रत्येक प्रदेश में, मेरी आत्मा का प्रत्येक प्रदेश आपके चरणों में स्थापित हो।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
हे प्रभु! आपका सान्निध्य पाकर आपके ज्ञान के प्रकाश से मेरी आत्मा पर आच्छादित मोह-मिथ्यात्व और अज्ञान का अंधकार उसी तरह दूर हो जाए, जैसे कभी आपका हुआ था।
इसी भाव से पूजा जी की स्थापना करते हैं।
क्षीरोदधि का नीर भरा कर, कनक झारी में लाऊँगा।
इसको तुम्हरे चरण चढ़ाकर, भवसागर तिर जाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
केसर चंदन शुद्ध भाव, मिश्रित करके मैं लाऊँगा।
क्रोध अग्नि अब शांत हो मेरी, निज में शीतलता पाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
तंदुल धवल अनुपम निर्मल, स्वर्ण थाल में लाऊँगा।
तुम्हरे चरणन पुंज चढ़ाकर मैं, अक्षय पद पा जाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अक्षय पद प्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
सुरतरुओं के सुमन हैं सुन्दर, निर्मल भाव बनाऊँगा।
वीतरागी के चरण चढ़ा कर, काम भाव विनशाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
षट् रस मिश्रित लाडू पेड़े, रत्नथाल भर लाऊँगा।
इनका त्याग करूँ अब स्वामी, आतम रस पी जाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अज्ञान भाव में फंसा रहा मैं, अब निज दीप जलाऊँगा।
ज्ञान भक्ति का दीप जलाकर, मोह को मैं विनशाऊँगा।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः मोह अंधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
जड़ कर्मों की धूप बनाकर, ध्यान अग्नि में जलाऊँगा।
राग द्वेष का नाश करूँ मैं, अष्ट कर्म विनशाऊँगा।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध भाव फल लेकर स्वामी, निज आतम उन्हें भराऊँगा।
वीतरागी सम गुण को पाकर, मोक्ष पुरी को जाऊँगा।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः मोक्ष फल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म तत्त्वों का सुन्दर, निर्मल अर्घ बनाऊँगा।
निज परिणति निर्मल हो मेरी, ऐसा अर्घ चढ़ाऊँगा।।
चौबीसों भगवान को पूजूँ, यही भावना भाऊँगा।
अंतर को लखकर मैं अपने, निज स्वभाव में आऊँगा।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
दोहा-शुद्ध भावों को अपनाकर, मैं पूजूँ जिनराज।
जयमाला मैं अब कहूँ, पाऊँ अक्ष समाज।।
जय ऋषभदेव तीर्थंकर, तुम आदि प्रभु हो स्वामी। तुम आतम ज्ञान जगाकर, संयम की राह दिखाई।।
जय अजित अजित पद कारी, तुम तो निज वैभवधारी। संभव जिन चरण पड़े हम, वो भव्यों को हितकारी।।
अभिनंदन जिन को वंदू, जो सम्यक् राह दिखाई। धन्य है सुमति जिनेश्वर, जो सुमति हम में जगाई।।
है नमन पद्म प्रभु तुमको, जीवन की शिल्पी बताई। जय जय सुपार्श्व स्वामी की, प्रज्ञा छैनी पकड़ाई।।
चंदा प्रभु नमन हमारा, चंदन सम शीतलदाई। जय सुविधिनाथ जिनवर की, हमको निज निधि बतलाई।।
जय जय शीतल स्वामी की, शीतलता अंतर कर दी। जय श्रेयांसनाथ प्रभुवर की, ज्ञान अग्नि जिन प्रगटाई।।
जय वासुपूज्य स्वामी की, वसु कर्मन नाश कराई। जय विमलनाथ प्रभुवर की, निर्मलता मन में बसाई।।
जय जय अनंत स्वामी की, जो अनंत गुणों के धारी। जय धर्मनाथ प्रभुवर की, जिन धर्म हमें सिखलाई।।
जय शांतिनाथ स्वामी की, निज में है शांति बताई। जय कुंथुनाथ प्रभुवर की, निज आतम ज्योति जगाई।।
जय अरहनाथ स्वामी की, जो दर्शन ज्ञान सिखाई। जय मल्लिनाथ प्रभुवर की, जो कर्म मल विनशाई।।
जय मुनिसुव्रत स्वामी की, व्रत की महिमा बतलाई। जय नमिनाथ प्रभुवर की, आतम में शक्ति जगाई।।
जय नेमिनाथ स्वामी की, करुणा के तुम हो धारी। जय पार्श्वनाथ स्वामी की, दृढ़ता तुमने दिखलाई।।
जय महावीर स्वामी की, जिन ज्ञान की सरिता बहाई। जिसमें गोते खा कर ही, हम आतम सुधि जगाई।।
दोहा-
शुद्ध निरंजन भाव से, मैं पूजूँ जिनराज।भेद ज्ञान करके प्रभु, पाऊँ निज पद आज।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः जयमाला पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा-
वीतराग गुण देख के, स्व चतुष्टय में आऊँ।त्याग करूँ पर्याय दृष्टि, द्रव्य दृष्टि प्रगटाऊँ।।
“इत्यादि आशीर्वाद”
।। पुष्पांजलिं क्षिपेत।।
“बोलो चौबीसों भगवान की जय!”
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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