दूसरी ढाल का भेद-संग्रह

 दूसरी ढाल का भेद-संग्रह

दूसरी ढाल का भेद-संग्रह

इन्द्रियविषय -स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द।

तत्त्व - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष।

द्रव्य - जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

मिथ्यादर्शन - गृहीत, अगृहीत।

मिथ्याज्ञान - गृहीत (बाह्यकारणप्राप्त), अगृहीत (निसर्गज-स्वयं पूर्वजन्म से प्राप्त)।

मिथ्याचारित्र - गृहीत और अगृहीत।

महादुःख - स्वरूप सम्बन्धी अज्ञान; मिथ्यात्व।

विमानवासी - कल्पोपपन्न और कल्पातीत।

दूसरी ढाल का लक्षण-संग्रह

अनेकान्तवाद - प्रत्येक वस्तु में वस्तुपने को प्रमाणित-निश्चित करनेवाली। 

अस्तित्व-नास्तित्व आदि परस्पर-विरुद्ध दो शक्तियों का एक साथ प्रकाशित होना। (आत्मा सदैव स्व-रूप से है और पर-रूप से नहीं है, ऐसी जो दृष्टि है, वह अनेकान्तदृष्टि है)।

अमूर्तिकः - रुप, रस, गंध और स्पर्श रहित वस्तु ।

आत्माः - जानने-देखने अथवा ज्ञान-दर्शन शक्ति वाली वस्तु को आत्मा कहा जाता है। जो सदा जाने और जानने रूप परिणमित हो, उसे जीव अथवा आत्मा कहते हैं।

उपयोगः  जीव की ज्ञान-दर्शन अथवा जानने-देखने को शक्ति का व्यापार।

एकान्तवादः  अनेक धर्मों की सत्ता की अपेक्षा न रखकर वस्तु का एक ही रूप से निरुपण करना।

दर्शनमोहः  आत्मा के स्वरूप की विपरीत श्रद्धा।

द्रव्यहिंसाः  त्रस और स्थावर प्राणियों का घात करना ।

भावहिंसाः  मिथ्यात्व तथा राग-द्वेषादि विकारों की उत्पत्ति।

मिथ्यादर्शनः  जीवादि तत्त्वों की विपरीत श्रद्धा। 

मूर्तिकः - रूप, रस, गन्ध और स्पर्शसहित वस्तु ।

अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति। 

तेषामेवोत्पत्तिहिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः ॥ ४४ ॥ (पुरुषार्थसिद्धयुपाय)

अर्थः-वास्तव में रागादि भावों का प्रगट न होना सो अहिंसा है, और रागादि भावों की उत्पत्ति होना सो हिंसा है-ऐसा जैन शास्त्र का संक्षिप्त रहस्य है। 

अन्तर-प्रदर्शन

(१) आत्मा और जीव में कोई अन्तर नहीं है, पर्यायवाची शब्द हैं ।

(२) अगृहीत (निसर्गज) तो उपदेशादि के निमित्त बिना होता

है, परन्तु गृहीत में उपदेशादि निमित्त होते हैं ।

(३) मिथ्यात्व और मिथ्यादर्शन में कोई अन्तर नहीं है; मात्र दोनों पर्यायवाचक शब्द हैं ।

४ ) सुगुरु में मिथ्यात्वादि दोष नहीं होते, किन्तु कुगुरु में होते हैं। विद्या देने वाले गुरु तो सुगुरु और कुगुरु से भिन्न व्यक्ति हैं । मोक्ष-मार्ग के प्रसंग में तो मोक्षमार्ग के दर्शक सुगुरु से ही तात्पर्य है ।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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