तीसरी छहढाला(17)

ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(17)
(सुबोध 
टीका)

तीसरी 

निश्चय सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का स्वरूप

परद्रव्य ते भिन्न आप में रुचि सम्यकत्तव भला है।
आप रूप को जानपनो, सो सम्यक् ज्ञान कला है।
आप रूप में लीन रहे थिर, सम्यक् चारित सोई।
अब व्यवहार मोक्षमग सुनिये, हेतु नियत को होई ॥२॥
अन्वयार्थ- (आपमें) आत्मा में (परद्रव्यन ते) परवस्तुओं से (भिन्न) भिन्नपने की (रुचि) श्रद्धा करना सो (भला) निश्चय (सम्यक्त्त्व) सम्यग्दर्शन है। (आप रूप को) आत्मा के स्वरूप को (परद्रव्यन ते भिन्न) परद्रव्यों से भिन्न (जानपनो) जानना (सो) वह (सम्यक् ज्ञान) निश्चय सम्यग्ज्ञान (कला) प्रकाश (है) है। (परद्रव्यन ते भिन्न) परद्रव्यों से भिन्न ऐसे (आप रूप में) आत्मस्वरूप में (थिर) स्थिरतापूर्वक (लीन रहे) लीन होना, सो (सम्यक् चारित) निश्चय सम्यग्चारित्र (सोई) है। (अब) अब (व्यवहार मोक्षमग) व्यवहार-मोक्षमार्ग (सुनिये) सुनो कि जो व्यवहारमोक्षमार्ग (नियतको) निश्चय-मोक्षमार्ग का (हेतु) निमित्त-कारण (होई) है। भावार्थः-- पर पदार्थों से त्रिकाल भिन्न ऐसे निज-आत्मा में अटल विश्वास करना उसे निश्चयसम्यग्दर्शन कहते हैं। आत्मा परवस्तुओं से भिन्न जानना (ज्ञान करना) उसे निश्चयसम्यग्ज्ञान जाता है। तथा परद्रव्यों का आलम्बन छोड़कर आत्मस्वरूप में एकाग्रता से मग्न होना वह निश्चय सम्यक्चारित्र (यथार्थ आचरण ) कहलाता है। अब आगे व्यवहार-मोक्षमार्ग का कथन करते है। क्योंकि जब निश्चय-मोक्षमार्ग हो तब व्यवहार-मोक्षमार्ग निमित्तरूप में कैसा होता है वह जानना चाहिये।
व्यवहार सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन) का स्वरूप
जीव अजीव तत्त्व अरु आस्रव, बन्ध रू संवर जानो;
निर्जर मोक्ष कहे जिन तिनको, ज्यों का त्यों सरधानो ।
है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप बखानो ;
तिनको सुन सामान्य विशेषै, दिढ़ प्रतीत उर आनो ॥ ३
अन्वयार्थ :--(
जिन) जिनेन्द्रदेव ने (जीव) जीव, (अजीव)ः अजीव, (आस्रव) आस्रव, (बन्ध) बन्ध, (संवर) संवर, (निर्जरा) निर्जरा, (अरु) और (मोक्ष) मोक्ष, (तत्त्व) यह सात तत्त्व (कहे) कहे हैं; (तिनको) उन सबकी (जैसा क्यों) यथार्थ-रूप से (सरधानो) श्रद्धा करो। (सोई) इस प्रकार श्रद्धा करना सो (समकित व्यवहारि) व्यवहार से सम्यग्दर्शन है। अब (इन रूप) इन सात तत्त्वों के रूप का (बखानो) वर्णन करते हैं; (तिनको) उन्हें (सामान्य विशेषैं) संक्षेप से तथा विस्तार से (सुन) सुनकर (उर) मन में (बुद्धि) अटल (प्रतीत) श्रद्धा (आनो) करो।
भावार्थः
(१) निश्चय सम्यग्दर्शन के साथ व्यवहार सम्यग्दर्शन कैसे होता है, उसका यहाँ वर्णन है। जिसे निश्चय सम्यग्दर्शन न हो उसे व्यवहार सम्यग्दर्शन भी नहीं हो सकता। निश्चयश्रद्धा सहित सात तत्त्वों की विकल्प-रागसहित श्रद्धा को व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा जाता है।
(२) तत्त्वार्थसूत्र में “तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्” कहा है, वह निश्चयसम्यग्दर्शन है। (देखो, मोक्षमार्ग प्रकाशक अ० ९ पृ० 477 तथा पुरुषार्थसिद्ध्युपाय गाथा 22)
यहाँ जो सात तत्त्वों की श्रद्धा कही है वह भेदरूप है -राग-सहित है इसलिए वह व्यवहारसम्यग्दर्शन है। निश्चय मोक्षमार्ग में कैसा निमित्त होता है, वह बतलाने के लिये यहाँ तीसरी गाथा कही है; किन्तु उसका ऐसा अर्थ नहीं है कि -निश्चयसम्यक्त्व बिना व्यवहारसम्यक्त्व हो सकता है।
1 - अपनी आत्मा को ‘पर पदार्थों’ से भिन्न समझना कौन-सा सम्यग्दर्शन है? (निश्चय सम्यग्दर्शन) 2 - अपनी आत्मा को ‘पर पदार्थों’ से भिन्न जानना कौन-सा सम्यग्ज्ञान है? (निश्चय सम्यग्ज्ञान) 3 - ‘पर पदार्थों’ का आलम्बन छोड़ कर आत्मस्वरूप में एकाग्रता से मग्न होना कौन-सा मार्ग है? (निश्चय सम्यग्चारित्र)
4 - जिनेन्द्र देव ने कौन से सात तत्त्व बताए हैं? (जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा,मोक्ष)
5 - हमें सात तत्त्वों में कैसी श्रद्धा करनी चाहिए? (ज्यों की त्यों) 6 - सात तत्त्वों में कैसी श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है? (व्यवहार से) 7 - हमें सात तत्त्वों में कैसी प्रतीति करनी चाहिए? (अटल प्रतीति)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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