तीसरी छहढाला(19)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(19)
(सुबोध टीका)
तीसरी
जीवके भेद-उपभेद मध्यम और जघन्य अन्तरात्मा तथा सकल परमात्मा मध्यम अन्तर-आतम हैं जे देशव्रती अनगारी; जघन कहे अविरत-समद्दष्टि, तीनों शिव-मग चारी । सकल निकल परमातम द्वैविधि तिनमें घाति निवारी;
श्री अरिहंत सकल परमातम लोकालोक निहारी ।। ५ ।।
अन्वयार्थः (अनगारी) छठवें गुणस्थान के समय अन्तरंग और बहिरंग परिग्रह रहित यथाजातरूप धर - भावलिंगी मुनि मध्यम अन्तरात्मा हैं तथा (देशव्रती) दो कषाय के अभाव सहित ऐसे पंचमगुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि श्रावक (मध्यम) मध्यम (अन्तर-आतम) अन्तरात्मा (हैं) हैं और (अविरत) व्रतरहित (समदृष्टि) सम्यग्द्दष्टि जीव (जघन) जघन्य अन्तरात्मा (कहे) कहलाते हैं;( तीनों ) यह तीनों ( शिव मगचारी ) मोक्षमार्ग पर चलनेवाले हैं। ( सकल निकल ) सकल और निकल के भेद से ( परमातम ) परमात्मा ( द्वै विध ) दो प्रकार के हैं; ( तिनमें ) उनमें ( घाति ) चार घाति-कर्मों को ( निवारी ) नाश करनेवाले ( लोकालोक ) लोक तथा अलोक को ( निहारी ) जानने-देखनेवाले ( श्री अरिहन्त ) अरहन्त परमेष्ठी ( सकल ) शरीरसहित ( परमातम ) परमात्मा हैं ।
भावार्थः (१) जो निश्चयसम्यग्दर्शनादि सहित हैं; तीन कषाय रहित, शुद्धोपयोगरूप मुनिधर्म को अंगीकार करके अंतरंग में उस शुद्धोपयोग रूप द्वारा स्वयं अपना अनुभव करते हैं, किसी को इष्ट-अनिष्ट मानकर राग-द्वेष नहीं करते, हिंसादिरूप अशुभोपयोग का तो अस्तित्व ही जिनके नहीं रहा है - ऐसी अन्तरंगदशा सहित बाह्य में दिगम्बर सौम्यमुद्राधारी हुए हैं और छठवें प्रमत्तसंयत गुणस्थान के समय अट्ठाईस मूलगुणों का अखण्डरूप से पालन करते हैं वे, तथा जो अनन्तानुबन्धी एवं अप्रत्याख्यानीय ऐसे दो कषाय के अभाव सहित सम्यग्दृष्टि श्रावक हैं, वे मध्यम अन्तरात्मा हैं; अर्थात् छठवें और पाँचवें गुणस्थानवर्ती जीव मध्यम अन्तरात्मा है । ’श्रावक के गुणों से युक्त और प्रमत्तविरत मुनि मध्यम अन्तरात्मा हैं । ( स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा-१९६)
( २ ) सम्यग्दर्शन के बिना कभी धर्म का प्रारम्भ नहीं होता; जिसे निश्चयसम्यग्दर्शन नहीं है, वह जीव बहिरात्मा है।
( ३ ) परमात्मा के दो प्रकार हैं - सकल और निकल ।
(१) श्री अरिहंत परमात्मा - वे ‘सकल (शरीरसहित) परमात्मा हैं। स = सहित, कल = शरीर, सकल अर्थात् शरीर सहित।
(२) सिद्ध.परमात्मा - वे निकल परमात्मा हैं। नि = रहित, कल = शरीर, निकल अर्थात् शरीर रहित।
वे दोनों सर्वज्ञ होने से लोक और अलोक सहित सर्व पदार्थों का त्रिकालवर्ती सम्पूर्ण स्वरूप एक समय में युगपत् (एक साथ) जानने देखने वाले, सबके ज्ञाता-द्रष्टा हैं,
इससे निश्चित होता है कि - जिस प्रकार सर्वज्ञ का ज्ञान व्यवस्थित है, उसी प्रकार उनके ज्ञान के ज्ञेय सर्वद्रव्य छद्मों द्रव्यों की त्रैकालिक क्रमबद्ध पर्यायें निश्चित व्यवस्थित हैं, कोई पर्याय उलटी-सीधी अथवा अन्यव्यवस्थित नहीं होती, ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव मानता है। जिसकी ऐसी मान्यता (निर्णय) नहीं होती, उसे स्व-पर पदार्थों का निश्चय न होने से शुभाशुभ विकार और परद्रव्य के साथ कर्ताबुद्धि एकता बुद्धि होती ही है । इसलिये वह जीव बहिरात्मा है।
1 - मध्यम अन्तरात्मा के लक्षण क्या हैं? (गृहरहित, दोनों प्रकार के परिग्रह से रहित, भावलिंगी मुनि, पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक)
2 - जघन्य अन्तरात्मा के लक्षण बताओ। (अविरती, सम्यग्दृष्टि जीव)
3 -परमात्मा के कितने प्रकार हैं? (2)
4 - परमात्मा के दो प्रकारों के नाम बताओ। (सकल और निकल)
5 - सकल से क्या तात्पर्य है? (जो शरीर सहित होते हैं)
6 - निकल से क्या तात्पर्य है? (जो शरीर रहित होते हैं)
7 - सकल परमात्मा के लक्षण क्या है? (जो परमात्मा चार घातिया कर्मों का नाश करने वाले, लोकालोक को जानने-देखने वाले, अरिहन्त परमेष्ठी व शरीर सहित होते हैं)
8 - निकल परमात्मा के प्रमुख लक्षण क्या है? (जो परमात्मा चार घातिया कर्मों व चार अघातिया कर्मों अर्थात् अष्ट कर्मों का नाश करने वाले, लोकालोक को जानने-देखने वाले, सिद्ध परमेष्ठी व शरीर रहित होते हैं)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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