तीसरी छहढाला(23)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(23)
(सुबोध टीका)

 आस्रव तत्त्व का उपदेश और बन्ध, संवर, निर्जरा का लक्षण

ये ही आतमको दुःख-कारण, तातैं इनको तजिये;

जीवप्रदेश बँधे विधि सों सो, बंधन कबहूँ न सजिये ।

शम-दम तैं जो कर्म न आवै, सो संवर आदरिये;

तप-बल तैं विधि-झरन निरजरा, ताहि सदा आचरिये ॥९॥

अन्वयार्थः (ये ही) ये मिथ्यात्वादि ही (आतमको) आत्मा को (दुःख-कारण) दुःख का कारण हैं, (तातैं) इसलिये (इनको) इन मिथ्यात्वादि को (तजिये) छोड़ देना चाहिये। (जीवप्रदेश) आत्मा के प्रदेशों का (विधि सों) कर्मों से (बँधे) बँधना वह (बंधन) बन्ध कहलाता है, (सो) वह बन्ध (कबहूँ) कभी भी (न सजिये) नहीं करना चाहिये। (शम) कषायों का अभाव और (दम तैं) इन्द्रियों तथा मन को जीतने से (कर्म ) कर्म (न आवें) नहीं आयें, वह (संवर) संवरतत्व हैः

(ताहि ) उस संवर को (आदरिये) ग्रहण करना चाहिये। (तपबल सें) तप की शक्तिसे (विधि ) कर्मों का (झरन) एकदेश खिर जाना, सो (निरजरा) निर्जरा है। (ताहि ) उस निर्जरा को (सदा) सदैव ( आचरिये ) प्राप्त करना चाहिये।

भावार्थः - यह मिथ्यात्वादि ही आत्मा को दुःख का कारण हैं, किन्तु पर पदार्थ दुःख का कारण नहीं हैं; इसलिये अपने दोषरूप मिथ्याभावों का अभाव करना चाहिये। स्पर्शों के साथ पुद्गलों का बन्ध, रागादि के साथ जीव का बन्ध और अन्योन्य अवगाह वह पुद्गलजीवात्मक बन्ध कहा है। (प्रसार गाथा १७७) रागपरिणाममात्र ऐसा जो भावबन्ध है, वह द्रव्यबन्ध का हेतु होने से वही निश्चयबन्ध है जो छोड़ने योग्य है ।

(२) मिथ्यात्व और क्रोधादि रूप भाव-उन सबको सामान्य रूप से कषाय कहा जाता है (मोक्षमार्ग प्रकाशक, देहली-पृष्ठ ४०) ऐसे कषाय के अभाव को शम कहते हैं और दम अर्थात् जो ज्ञेय - ज्ञायक, संकर दोष टालकर, इन्द्रियों को जीतकर, ज्ञानस्वभाव द्वारा अन्य द्रव्य से अधिक (पृथक परिपूर्ण) आत्मा को जानता है, उसे निश्चयनय में स्थित साधु वास्तव में - जितेन्द्रिय कहते हैं। (स. गा. ३१)

स्वभाव-परभाव के भेदज्ञान द्वारा द्रव्येन्द्रिय, भावेन्द्रिय तथा उनके विषयों से आत्मा का स्वरूप भिन्न है - ऐसा जानना उसे इन्द्रिय दमन कहते हैं। परन्तु आहारादि तथा पाँच इन्द्रियों के विषयरूप बाह्य वस्तुओं के त्यागरूप जो मन्दकषाय है, उससे वास्तव में इन्द्रिय दमन नहीं होता, क्योंकि वह तो शुभराग है, पुण्य है, इसलिये बन्ध का कारण है - ऐसा समझना ।

( ३ ) शुद्धात्माश्रित सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप शुद्धभाव ही संवर है। प्रथम निश्चयसम्यग्दर्शन होने पर स्वद्रव्य के आलम्बनानुसार संवर-निर्जरा प्रारम्भ होती है। क्रमशः जितने अंश में राग का अभाव हो, उतने अंश में संवर-निर्जरारूप धर्म होता है। स्वोन्मुखता के बल से शुभाशुभ इच्छा का निरोध सो तप है। उस तप से निर्जरा होती है।

( ४ ) संवरः- पुण्य-पापरूप अशुद्ध भाव (आस्त्रव) को आत्मा के शुद्धभाव द्वारा रोकना सो भावसंवर है और तदनुसार नवीन कर्मों का आना स्वयं-स्वतः रुक जाये, सो द्रव्यसंवर है।

( ५ ) निर्जराः--अखण्डानन्द निज शुद्धात्मा के लक्ष्य से  अंशतः शुद्धि की वृद्धि और अशुद्धि की अंशतः हानि करना, सो भावनिर्जरा है; और उस समय खिरने योग्य कर्मों का अंशतः छूट जाना, सो द्रव्य-निर्जरा है। ( लघु जैन सि. प्र. पृष्ठ ४५-४६ प्रश्न १२१)

( ६ ) जीव-अजीव को उनके स्वरूप सहित जानकर स्व तथा पर को यथावत् मानना, आस्रव को जानकर उसे हेयरूप, बन्ध को जानकर उसे अहितरूप, संवर को पहिचानकर उसे उपादेयरूप तथा निर्जरा को पहिचानकर उसे हित का कारण मानना चाहिये। ( मोक्ष-मार्ग प्र० अ० ९, पृष्ठ ४६९ )।

आस्रव आदि के दृष्टांतः--

( १ ) आस्रवः- जिस प्रकार किसी नौका में छिद्र हो जाने से उसमें पानी आने लगता है, उसी प्रकार मिथ्यात्वादि आस्रव के द्वार से आत्मा में कर्म आने लगते हैं।

( २ ) बंधः- जिस प्रकार छिद्र द्वारा पानी नौका में भर जाता है, उसी प्रकार कर्मपरमाणु आत्मा के प्रदेशों में पहुँचते हैं ( एक क्षेत्र में रहते हैं)। 

(३) संवरः जिस प्रकार छिद्र बन्द करने से नौका में पानी का आना रुक जाता है, उसी प्रकार शुद्धभावरूप गुप्ति आदि के द्वारा आत्मा में कर्मों का आना रुक जाता है।

(४) निर्जराः जिस प्रकार नौका में आये हुए पानी में से थोड़ा (किसी बरतन में भरकर) बाहर फेंक दिया जाता है, उसी प्रकार निर्जरा द्वारा थोड़े-से कर्म आत्मा से अलग हो जाते हैं।
(५) मोक्षः जिस प्रकार नौका में आया हुआ सारा पानी निकाल देने से नौका एकदम पानी रहित हो जाती है, उसी प्रकार आत्मा में से समस्त कर्म पृथक् हो जाने से आत्मा की परिपूर्ण शुद्धदशा (मोक्षदशा) प्रगट हो जाती है अर्थात् आत्मा मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥

1 - मिथ्यात्व आदि आस्रव आत्मा को क्या पहुँचाते हैं? (दुःख) 

2 -मिथ्यात्व आदि आस्रव किस योग्य हैं? (छोड़ने योग्य) 

3 - आत्मा के प्रदेशों का कर्मों से बंधना क्या कहलाता है? (बंध) 

4 - आत्मा के प्रदेशों का कर्मों से बंधना कैसा है? (बुरा) 

5 - कषायों के अभाव में कर्मों का आना बंद हो जाए, तो उसे क्या कहते हैं? (सँवर)

6 - सँवर तत्त्व किस योग्य है? (ग्रहण करने योग्य)

7 - तप की शक्ति से कर्मों का झर जाना क्या कहलाता है? (निर्जरा)

8 - निर्जरा किस योग्य है? (प्राप्त करने योग्य)

9 - आस्रव की तुलना किस से की जाती है? (नौका में छेद से)

10- बंध की तुलना किस से की जाती है? (नौका में पानी का ठहरना) 

11 - निर्जरा की तुलना किस से की जाती है? (नौका से पानी निकालना) 

 12 - सँवर की तुलना किस से की जाती है? (नौका के छेद को बंद करना) 

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)