तीसरी छहढाला(24)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(24)
(सुबोध टीका)
मोह का लक्षण, व्यवहारसम्यक्त्व का लक्षण तथा कारण
सकल कर्मतैं रहित अवस्था, सो शिव थिर सुखकारी;
इहि बिध जो सरधा तत्त्वनकी, सो समकित व्यवहारी।
देव जिनेन्द्र, गुरु परिग्रह बिन, धर्म दयाजुत सारो;
येहु मान समकितका कारण, अष्ट-अंग-जुत धारो ॥ १० ॥
अन्वयार्थः (सकल कर्मतैं) समस्त कर्मों से (रहित) रहित (थिर) स्थिर-अटल (सुखकारी) अनन्त सुखदायक (अवस्था) दशा-पर्याय सो (शिव) मोक्ष कहलाता है। (इहि बिध) इस प्रकार (जो) जो (तत्त्वनकी) सात तत्त्वों के भेदसहित (सरधा) श्रद्धा करना, सो (व्यवहारी) व्यवहार (समकित) सम्यग्दर्शन है।
(जिनेन्द्र ) वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी (देव) सच्चे देव (परिग्रह बिन) चौबीस परिग्रह से रहित (गुरु) वीतराग गुरु तथा ( सारो) सारभूत (दयाजुत) अहिंसामय (धर्म) जैनधर्म (येहु) इन सबको (समकितको) सम्यग्दर्शन का (कारण) निमित्त कारण (भान) जानना चाहिये। सम्यग्दर्शन को उसके (अष्ट) आठ (अंगजुत) अंगों सहित (धारो) धारण करना चाहिये।
भावार्थः-- मोक्ष का स्वरूप जानकर उसे अपना परमहित मानना चाहिये। आठ कर्मों के सर्वथा नाश पूर्वक आत्मा की जो सम्पूर्ण शुद्ध दशा (पर्याय) प्रगट होती है, उसे मोक्ष कहते हैं। वह दशा अविनाशी तथा अनन्त सुखमय है;--इस प्रकार सामान्य और विशेषरूप से सात तत्त्वों की अचल श्रद्धा करना उसे व्यवहार-सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन ) कहते हैं। जिनेन्द्रदेव, वीतरागी (दिगम्बर जैन) गुरु, तथा जिनेन्द्रप्रणीत अहिंसामय धर्म भी उस व्यवहार सम्यग्दर्शन के कारण हैं अर्थात् इन तीनों का यथार्थ श्रद्धान भी व्यवहार सम्यग्दर्शन कहलाता है। उसे निम्नोक्त आठ अंगों सहित धारण करना चाहिये। व्यवहार सम्यक्त्व का स्वरूप पहले, दूसरे तथा तीसरे छंद के भावार्थ में समझाया है। निश्चयसम्यक्त्व के बिना मात्र व्यवहार को व्यवहारसम्यक्त्व नहीं कहा जाता।। १० ।।
1 - मोक्ष क्या कहलाता है? (ऐसी पर्याय या दशा, जो समस्त कर्मों से रहित, स्थिर-अटल, अनन्त सुखदायक है, वह मोक्ष कहलाता है)
2 - सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं? (दो, निश्चय सम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्दर्शन)
3 - मोक्ष की दशा कैसी है? (अविनाशी और अनन्त सुखमय)
4 - व्यवहार सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं? (सामान्य और विशेष रूप से सात तत्त्वों में अचल श्रद्धा करना) 5 - व्यवहार सम्यग्दर्शन का दूसरा लक्षण क्या है? (जिनेन्द्रदेव, वीतरागी गुरु और जिनेन्द्रप्रणीत अहिंसामय धर्म का यर्थाथ श्रद्धान करना)
6 - सम्यग्दर्शन के कितने अंग हैं? (आठ)
7 - किसके बिना मात्र व्यवहार को व्यवहारसम्यक्त्व नहीं कहा जाता? (निश्चयसम्यक्त्व के बिना )
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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