छहढाला(26)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(26)
सम्यक्त्व के आठ अंग (गुण) और शंकादि आठ दोषों का लक्षण
जिन बचमें शंका न धार वृष, भव-सुख-वांछा भानै ;
मुनि-तन मलिन न देख घिनावे, तत्त्व-कुतत्त्व पिछानै ।
निज गुण अरु पर औगुण ढांके, वा निजधर्म बढ़ावै ;
कामादिक कर वृषतौ चिगते, निज-परको सु दिढ़ावै ।। १२ ।।
छन्द १३ ( पूर्वाद्ध )
धर्मी सों गौ-वच्छ-प्रीति सम, कर जिनधर्म दिवावै ;
इन गुणतैं विपरीत दोष वसु, तिनको सतत खिपावै ।
(सुबोध टीका)
अन्वयार्थः १- (जिन वच में) सर्वज्ञदेव के कहे हुए तत्त्वों में (शंका) संशय-सन्देह (न धार) धारण नहीं करना (सो
निःशंकित अंग है);
२ - (वृष) धर्म को (धार) धारण करके (भव-सुख-वांछा) सांसारिक सुखों की इच्छा (भानै) न करे
(सो निःकांक्षित अंग है);
३-(मुनि-तन) मुनियों के शरीरादि (मलिन) मैले (देख) देखकर (न घिनवै) घृणा न करना
(सो निर्विचिकित्सा अंग है);
४-( तत्त्व-कुतत्त्व) सच्चे और झूठे तत्त्वों की (पिछानै) पहिचान रखे (सो अमूढ़ दृष्टि अंग है)
५-( निजगुण) अपने गुणों को (अरु) और (पर औगुण) दूसरे के अवगुणों को (ढाँके) छिपावे (वा) तथा (निजधर्म)
अपने आत्मधर्म को (बढ़ावै) बढ़ावे अर्थात् निर्मल बनाए (सो उपगूहन अंग है।
६-(कामादिक कर) काम-विकारादि के कारण(वृषतें) धर्म से (चिगते) च्युत होते हुए (निज-परको) अपने को तथा पर को ( सु बिठावै ) उस में पुनः दृढ़ करे, सो स्थितिकरण अंग है।
७-(धर्मी सों) अपने साधर्मीजनों से (गौ-वच्छ-प्रीति सम) बछड़े पर गाय की प्रीति समान (कर) प्रेम रखना, (सो वात्सल्य अंग है।) और (जिनधर्म) जैनधर्म की (दीपावैं) शोभा में वृद्धि करना, सो प्रभावना अंग है। (इन गुणतैं) इन आठ गुणों से (विपरीत) उल्टे (वसु) आठ (दोष) दोष हैं, (तिनको) उन्हें (सतत) हमेशा (खिपावैं) दूर करना चाहिये।
भावार्थः - (१) तत्त्व यही है, ऐसा ही है, अन्य नहीं है तथा अन्य प्रकार से नहीं है - इस प्रकार यथार्थ तत्त्वों में अचल श्रद्धा होना, सो निःशंकित अंग कहलाता है।
टिप्पणी : अव्रती सम्यग्दृष्टि जीव भोगों को कभी भी आदरणीय नहीं मानते; किन्तु जिस प्रकार कोई बन्दी कारागृह में (इच्छा न होने पर भी) दुःख सहन करता है, उसी प्रकार वे अपने पुरुषार्थ की निर्बलता से गृहस्थ दशा में रहते हैं, किन्तु रुचिपूर्वक भोगों की इच्छा नहीं करते; इसलिये उन्हें निःशंकित और निःकांक्षित अंग होने में कोई बाधा नहीं आती।
(२) धर्म सेवन करके उसके बदले में सांसारिक सुखों की इच्छा न करना, उसे निःकांक्षित अंग कहते हैं।
(३) मुनिराज अथवा अन्य किसी धर्मात्मा के शरीर को मैला देख कर घृणा न करना, उसे निर्विचिकित्सा अंग कहते हैं।
(४) सच्चे और झूठे तत्त्वों की परीक्षा करके मूढ़ताओं तथा अनायतनों में न फँसना, वह अमूढ़ दृष्टि अंग है।
(५) अपनी प्रशंसा कराने वाले गुणों को तथा दूसरे की निंदा कराने वाले दोषों को ढँकना और आत्म धर्म को बढ़ाना (निर्मल रखना), सो उपगूहन अंग है।
टिप्पणीः उपगूहन का दूसरा नाम “उपबृंहण” भी जिनागम में आता है, जिससे आत्मधर्म में वृद्धि करने को भी उपगूहन कहा जाता है। श्री अमृतचन्द्रसूरि ने अपने पुरुषार्थसिद्ध्युपाय के २७ वें श्लोक में भी यही कहा हैः
धर्मोऽभिवर्द्धनीयः सदात्मनो मार्दवादिभावनया।
परदोषनिगूहनमपि विधेयमुपबृंहगुणार्थम्॥ २७॥
(६) काम, क्रोध, लोभ आदि किसी भी कारण से (सम्यक्त्व और चारित्र से) भ्रष्ट होते हुए अपने को तथा पर को पुनः उसमें स्थिर करना स्थितिकरण अंग है।
(७) अपने साधर्मी जन पर बछड़े से प्यार रखने वाली गाय की भांति निरपेक्ष प्रेम रखना, सो वात्सल्य अंग है।
(८) अज्ञान-अन्धकार को दूर करके विद्या-बल-बुद्धि आदि के द्वारा शास्त्र में कही हुई योग्य रीति से अपने सामर्थ्यानुसार जैन-धर्म का प्रभाव प्रगट करना - वह प्रभावना अंग है।
इन अंगों (गुणों) से विपरीत १-शंका, २-कांक्षा, ३-विचिकित्सा, ४-मूढ़दृष्टि, ५-अनुपगूहन, ६-अस्थितिकरण, ७-अवात्सल्य और ८-अप्रभावना - ये सम्यक्त्व के आठ दोष हैं, इन्हें सदा दूर करना चाहिये।
1. मद कितने प्रकार के होते हैं? (आठ)
2. मूढ़ता कितने प्रकार की होती है? (तीन)
3. अनायतन कितने प्रकार के होते हैं? (6)
4. दोष कितने प्रकार के होते हैं? (आठ)
5. सम्यक्त्व के कितने दोष हैं? (25)
6. सर्वज्ञदेव के कहे गए तत्त्वों में संशय न करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (निशंकित अंग)
7. धर्म को धारण करके सांसारिक सुखों की इच्छा न करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (निःकांक्षित अंग)
8. मुनियों के मलिन तन को देख कर घृणा न करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (निविर्चिकित्सा अंग)
9. सच्चे और झूठे तत्त्वों की पहिचान रखना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (अमूढ़ दृष्टि अंग)
10. अपने गुणों को छिपाना और दूसरे के अवगुणों को छिपाना सम्यग्दर्शन का ---- अंग है। (उपगूहन अंग)
11. कामादिक विकारों से च्युत होते हुए स्वयं व पर को पुनः धर्म में दृढ़ करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (स्थितिकरणअंग)
12. साधर्मीजनों से गाय-बछड़े के समान प्रीति करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (वात्सल्य अंग)
13. अपने धर्म की शोभा में वृद्धि करना सम्यग्दर्शन का कौन-सा अंग है? (प्रभावना अंग)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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