छहढाला(33)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(33)

 

तीसरी ढालका लक्षण-संग्रह

अनायतनः- कुगुरु, कुदेव, कुधर्म और इन तीनों के सेवक ये

छहों अधर्म के स्थानक ।

अनायतनदोषः- सम्यक्त्व का नाश करने वाले कुदेवादि की प्रशंसा करना ।

अनुकम्पाः- प्राणी मात्र पर दया का भाव ।

अरिहन्तः- चार घातिकर्मों से रहित, अनन्तचतुष्टयसहित, वीतराग और केवलज्ञानी परमात्मा ।

अलोकः- जहाँ आकाश के अतिरिक्त अन्य द्रव्य नहीं है, वह स्थान ।

अविरतिः- पापों में प्रवृत्ति, अर्थात् १-निर्विकार स्वसंवेदन से विपरीत अव्रत परिणाम, २-छह काय (-पांचों स्थावर तथा एक त्रसकाय) जीवों की हिंसा के त्यागरूप भाव न होना तथा पाँच इन्द्रिय और मन के विषयों में प्रवृत्ति करना, ऐसे बारह प्रकार अविरति है।

अविरति सम्यग्दृष्टिः सम्यग्दर्शन सहित, किन्तु व्रतरहित ऐसे चौथे गुणस्थानवर्ती जीव।

आस्तिक्यः जीवादि छह द्रव्य, पुण्य और पाप, संवर, निर्जरा, मोक्ष तथा परमात्मा के प्रति विश्वास, सो आस्तिक्य कहलाता है ।

कषायः जो आत्मा को दुःख दे, गुणों के विकास को रोके तथा परतंत्र करे वह, यानी मिथ्यात्व तथा क्रोध, मान, माया और लोभ, वह कषाय भाव हैं ।

गुणस्थानः मोह और योग के सद्भाव या अभाव से आत्मा के गुणों (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) की हीनाधिकतानुसार होनेवाली अवस्थाओं को गुणस्थान कहते हैं । (वरांगचरित्र पृ० ३६२)

घातियाः  अनन्त चतुष्टय को रोकने में निमित्तरूप कर्म को घातिया कहते हैं ।

चारित्रमोहः आत्मा के चारित्र को रोकने में निमित्त सो मोहनीय कर्म।

जिनेन्द्रः चार घातिया कर्मों को जीतकर केवलज्ञानादि अनन्त-चतुष्टय प्रगट करने वाले १८ दोषरहित परमात्मा ।

देवमूढताः भय, आशा, स्नेह, लोभवश रागी-द्वेषी देवों की सेवा करना अथवा वंदन-नमस्कार करना।

देशव्रतीः-- श्रावक के व्रतों को धारण करने वाले सम्यग्दृष्टि, पांचवें गुणस्थान में वर्तने वाले जीव।

निमित्तकारणः-- जो स्वयं कार्यरुप न हो, किन्तु कार्य की उत्पत्ति के समय उपस्थित रहे, वह कारण।

नोकर्मः-- औदारिकादि पांच शरीर तथा छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गल परमाणु नोकर्म कहलाते हैं।

पाखंडी मूढताः-- रागी-द्वेषी और वस्त्रादि परिग्रहधारी, झूठे तथा कुलिंगी साधुओं की सेवा करना अथवा वदन-नमस्कार करना।

पुद्गलः-- जो पूर्ण हो और गले। परमाणु बन्धस्वभावी होने से मिलते हैं तथा पृथक् होते हैं, इसलिये वे पुद्गल कहलाते हैं अथवा जिसमें रूप, रस, गन्ध और स्पर्श हो, वह पुद्गल।

प्रमादः-- स्वरूप में असावधानीपूर्वक प्रवृत्ति अथवा धार्मिक कार्यों में अनुत्साह।

प्रशमः-- अनन्तानुबन्धी कषाय के अन्तपूर्वक शेष कषायों का अंशतः मन्द होना सो । ( पंचाध्यायी भाग २. गाथा ४२८ )

मदः-- अहंकार, घमण्ड, अभिमान।

भावकर्मः-- मिथ्यात्व, राग-द्वेषादि जीव के मलिन भाव।

मिथ्यादृष्टिः-- तत्त्वों की विपरीत श्रद्धा करने वाले।

लोक मूढताः-- धर्म (समझकर जलाशयों में स्नान करना तथा रेत, पत्थर आदि का ढेर बनाना-आदि कार्य।

विशेष धर्मः-- जो धर्म अमुक विशिष्ट द्रव्य में रहे उसे विशेष धर्म कहते हैं।

शुद्धोपयोगः- शुभ और अशुभ राग-द्वेष की परिणति से रहित सम्यग्दर्शन-ज्ञान सहित चारित्र की स्थिरता।

सामान्य गुणः - सर्व द्रव्यों में समानता से विद्यमान गुणों को सामान्य कहते हैं।

सामान्यः- प्रत्येक वस्तु में त्रैकालिक द्रव्य-गुणरूप, अभेद एकरूप भाव को सामान्य कहते हैं।

सिद्धः- आठ गुणों सहित तथा आठ कर्मों एवं शरीररहित परमेष्ठी। (व्यवहारसे मुख्य आठ गुण और निश्चय से अनन्त गुण प्रत्येक सिद्ध परमात्मा में हैं।

संवेगः-- संसार से भय होना और धर्म तथा धर्म के फल में परम उत्साह होना। साधर्मी और पंचपरमेष्ठी में प्रीति को भी संवेग कहते हैं।

निर्वेदः- संसार, शरीर और भोगों में सम्यक् प्रकार से उदासीनता अर्थात् वैराग्य।

अन्तर-प्रदर्शन

(१) जीव के मोह-राग-द्वेषरूप परिणाम वह भाव-आस्रव है और उस परिणाम में स्निग्धता वह भावबन्ध है।

(२) अनायतन में तो कुदेवादि की प्रशंसा की जाती है, किन्तु मूढ़ता में तो उनकी सेवा, पूजा और विनय करते हैं।

(३) माता के वंश को जाति और पिता के वंश को कुल कहा जाता है।

(४) धर्मद्रव्य तो छह द्रव्यों में से एक द्रव्य है, और धर्म वह वस्तु का स्वभाव अथवा गुण है।

(५) निश्चयनय वस्तु के यथार्थ स्वरूप को बतलाता है। व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्य का अथवा उनके भावों का अथवा कारण-कार्यादिक का किसी को किसी में मिलाकर निरूपण करता है , ऐसे ही श्रद्धान से मिथ्यात्व है। इसलिये उसका त्याग करना चाहिये। (मोक्षमार्ग प्रकाशक अ० ७) 

(६) निकल (शरीर रहित) परमात्मा आठों कर्मों से रहित हैं और सकल (शरीर सहित) परमात्मा को चार अघातिकर्म होते हैं ।

(७) सामान्य धर्म अथवा गुण तो अनेक वस्तुओं में रहता है किन्तु विशेष धर्म या विशेष गुण तो अमुक खास वस्तु में

ही होता है ।

(८) सम्यग्दर्शन अंगी है और निःशंकित अंग उसका एक अंग है।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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