चौथी ढाल का भेद-संग्रह
चौथी ढाल का भेद-संग्रह
कालः-निश्चयकाल और व्यवहारकाल; अथवा भूत, भविष्य और वर्तमान।
चारित्र:--मोह-क्षोभरहित आत्मा के शुद्ध परिणाम, भावलिंगी श्रावकपद तथा भावलिंगी मुनिपद।
ज्ञान के दोष:- संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय (अनिश्चितता)।
दिशा:- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैऋत्य, अग्निकोण, ऊर्ध्व और अधो-यह दस हैं।
पर्वचतुष्ट्य:-- प्रत्येक मास की दो अष्टमी तथा दो चतुर्दशी।
मुनि:-- समस्त व्यापार से विरक्त, चार प्रकार की आराधना में तल्लीन, निर्ग्रन्थ और निर्मोह-ऐसे सर्व साधु होते हैं। (नियमसार गाथा- १६)। वे निश्चयसम्यग्दर्शन सहित, विरागी होकर, समस्त परिग्रह का त्याग करके, शुद्धो- पयोगरूप मुनिधर्म अंगीकार करके अन्तरंगमें शुद्धोपयोग द्वारा अपने आत्मा का अनुभव करते हैं । परद्रव्य में अहंबुद्धि नहीं करते । ज्ञानादि स्वभाव को ही अपना मानते हैं; परभावों में ममत्व नहीं करते । किसी को इष्ट-अनिष्ट मानकर उसमें राग- द्वेष नहीं करते । हिंसादि अशुभ उपयोग का तो उनके अस्तित्व ही नहीं होता । अनेक बार सातवें गुणस्थान के निर्विकल्प आनन्द में लीन होते हैं । जब छठवें गुणस्थान में आते हैं, तब उन्हें अट्ठाईस मूलगुणों को अखण्डित रूप से पालन करने का शुभ विकल्प आता है । उन्हें तीन कषायों के अभावरूप निश्चय सम्यक्चारित्र होता है । भावलिंगी मुनि को सदा नग्न-दिगम्बर दशा होती है; उसमें कभी अपवाद नहीं होता । कभी भी वस्त्रादि सहित मुनि नहीं होते ।
विकथा: -- स्त्री, आहार, देश और राज्य - इन चार की अशुभ भावरूप कथा सो विकथा है ।
श्रावकव्रत: - पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ऐसे बारह व्रत हैं ।
रोगत्रय: - जन्म, जरा और मृत्यु ।
हिंसा: --(१) वास्तव में रागादि भावों का प्रगट न होना सो अहिंसा है और रागादि भावों की उत्पत्ति होना सो हिंसा है; ऐसा जैनशास्त्रों का संक्षिप्त रहस्य है । (२) संकल्पी, आरम्भी, उद्योगिनी और विरोधिनी यह चार अथवा द्रव्यहिंसा और भावहिंसा - यह दो हिंसा हैं |
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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